Wednesday, April 6, 2011

शुंगलू समिति की रिपोर्ट और देश के गुनाहगार


शुंगलू समिति की अंतिम रिपोर्ट निराशा पैदा करने वाली है। अचरज लगता है कि यह समिति कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए कई सौ करोड़ की लूट के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान तक नहीं कर पाई है और निष्कर्ष के तौर पर यह मान बैठी है कि इस महाघोटाले में संलिप्तता उन सबकी रही है, जो प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप में खेल से जुड़े हुए थे। देखा जाए तो समिति का यह निष्कर्ष भ्रष्टाचारियों के लिए औषधि का काम कर गया है, लेकिन देश के उन करोड़ों लोगों के हाथ जरूर निराशा लगी है, जो यह उम्मीद लगाए थे कि समिति अपनी जांच में दूध का दूध और पानी का पानी कर देगी। गौरतलब है कि कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए हजारों करोड़ रुपये आवंटित किया गया था और उसे सफल बनाने का उत्तरदायित्व आयोजन समिति, खेल मंत्रालय, मंत्रियों का समूह और सचिवों के समूह के कंधे पर था। निर्माण कार्य के दौरान सारे नियम-कानूनों को ताक पर रखकर इन समूहों द्वारा जमकर जनता की गाढ़ी कमाई को लूटा गया, लेकिन शुंगलू समिति की रिपोर्ट आने के बाद महालूट के लिए इनमें से किसी को भी सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है। होना तो यह चाहिए था कि अगर कॉमनवेल्थ गेम्स की सफलता का श्रेय इन्हें जाता है तो इसमें मची लूट और अंधेरगर्दी के लिए भी यही लोग जिम्मेदार ठहराए जाते, लेकिन शुंगलू समिति की रिपोर्ट ने सच्चाई पर ग्रहण लगा दिया है। सीधे तौर पर किसी को भी जिम्मेदार न ठहराकर सरकार को एक बार फिर उसके आस्तीन में छिपे भ्रष्टाचारियों को बचाने का मौका उपलब्ध करा दिया है। निष्कर्ष के तौर पर शुंगलू समिति की रिपोर्ट में हैरानी जताई गई है कि इतना बड़ा खेल आयोजन एक गैर सरकारी संगठन को कैसे सौंप दिया गया है। साथ ही यह भी आशंका जाहिर की गई है कि कुछ मामलों में प्रधानमंत्री कार्यालय ने हस्तक्षेप तो जरूर किया, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों पर ठोस कार्रवाई नहीं की। समिति की रिपोर्ट में नया क्या शुंगलू समिति ने अपनी रिपोर्ट में वही बातें कही हैं, जो विपक्षी दलों द्वारा कही जाती रही हैं। भ्रष्टाचार के मसले पर प्रधानमंत्री कार्यालय की चुप्पी शुरू से ही हैरान करने वाली रही है। रिपोर्ट के अंत में कहा गया है कि भविष्य में कॉमनवेल्थ जैसे आयोजन प्रधानमंत्री की निगरानी में होने चाहिए, लेकिन देखा जाए तो समिति का यह खुलासा बिल्कुल हैरानी पैदा करने वाला नहीं है। जब कॉमनवेल्थ गेम्स में व्याप्त भ्रष्टाचार को लेकर विपक्षी दलों द्वारा सरकार को घेरा जा रहा था तो सरकार अंत तक यही तोतारट लगाती रही कि सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है, लेकिन जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा और भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाने वाले लुटेरे उतराने लगे, तब जाकर सरकार हरकत में आई और खेल समाप्ति के बाद जांच कराने की बात कहकर विपक्षी दलों को शांत किया। गनीमत रही कि कोई दुर्घटना बगैर आयोजन सफल रहा, लेकिन खेल संपन्न होने के बाद जब एक बार फिर सरकार पर हमला तेज हुआ तो सरकार सीबीआइ के माध्यम से लूट के महाखेल में शामिल कुछ छोटी मछलियों को फांसने लगी और फजीहत से बचने के लिए जांच समिति का गठन कर डाला। लेकिन अब जब जांच समिति की रिपोर्ट आ गई है तो भी नहीं लगता है कि सरकार कानून का डंडा दोषियों पर चला पाएगी। सरकार भी कम कसूरवार नहीं प्रत्यक्ष रूप से भले ही शुंगलू समिति द्वारा सीधे तौर पर किसी एक को भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया है, लेकिन परोक्ष रूप से देखा जाए तो इसके लिए सबसे ज्यादा सरकार ही जिम्मेदार है, क्योंकि उसी के निगरानी तंत्र में सब घालमेल संपन्न हुआ है। शुंगलू जांच समिति ने भी स्पष्ट तौर पर कहा है कि पैसों की कमी नहीं की धारणा ने भ्रष्टाचार को चरम पर पहुंचा दिया। क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि खेल आयोजकों से वह पूछे कि निर्धारित बजट के बावजूद अधिक पैसा खर्च क्यों किया जा रहा है? लेकिन सरकार पूछने के बजाए आंख बंद कर भ्रष्टाचारियों पर जनता की गाढ़ी कमाई लुटाती रही। रिपोर्ट में बताया गया है कि कई ऐसे कार्यो पर धन पानी की तरह बहाया गया, जहां इसकी जरूरत ही नहीं थी। बानगी के तौर पर जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में भूतल पार्किग पर 27 करोड़ और मेजर ध्यानचंद की पार्किग पर 20 करोड़ खर्च किया गया, जिसका कोई औचित्य ही नहीं था। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह कि किसी भी कार्य को समय से पूरा करने के बजाए जान-बूझकर उसमें देरी की गई। सिर्फ इसलिए कि बजट को बढ़ाया जा सके। रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर समय पर कार्य पूरा किया गया होता तो कई सौ करोड़ रुपये की बचत की जा सकती थी, लेकिन सरकार द्वारा इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया गया। मगर जब भ्रष्टाचार के आरोप में भ्रष्टाचारियों की गर्दन फंसने लगी तो सत्ता मे बैठे हुए लोगों ने खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को ही निशाने पर लेना शुरू कर दिया। इसमें कोई शक नहीं कि महालूट के इस खेल में कलमाड़ी की भूमिका सबसे रोचक और रहस्यात्मक रही है। सच यह भी है कि कलमाड़ी की मनमानी के आगे किसी का जोर नहीं चला, लेकिन सवाल यह उठता है कि सरकार में अगर कोई भी कलमाड़ी की मनमानियों पर रोक लगाने में सक्षम नहीं था तो आखिर इसकी वजह क्या थी? क्या कलमाड़ी के ऊपर किसी और का हाथ था? क्या कलमाड़ी सीधे तौर पर प्रधानमंत्री कार्यालय से नियंत्रित हो रहे थे? शुंगलू समिति की रिपोर्ट तो कुछ ऐसा ही बयां कर रही है। शीला से लेकर पीएमओ तक कॉमनवेल्थ खेल घोटाले की जांच के जो आधिकारिक और गोपनीय निष्कर्ष सरकार के सामने आया है, उसके मुताबिक प्रधानमंत्री कार्यालय, दिल्ली का मुख्यमंत्री कार्यालय, दिल्ली का उपराज्यपाल कार्यालय और खेल मंत्रालय की भूमिकाएं भी संदेहों के घेरे में है। रिपोर्ट में आधारभूत ढांचे से जुड़े प्रोजेक्ट के कार्यान्वयन में दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और दिल्ली के उपराज्यपाल तेजिंदर खन्ना की भूमिका पर उंगली उठाते हुए पीडब्लूडी, सीपीडब्लूडी, एमसीडी और डीडीए के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की गई है। शुंगलू समिति की रिपोर्ट पर विश्वास किया जाए तो दिल्ली में फ्लाई ओवर, पुल, बाईपास आदि बनवाने के खेल में खूब धन बनाया गया है। कंपनियों के चयन में मनमानी, अपारदर्शी टेंडरिंग और बढ़ा-चढ़ाकर भुगतान भी किया गया है। परियोजना के कुल बजट का 80 फीसदी हिस्सा अपने चहेते तीन ठेकेदारों को ही अलॉट कर दिया गया। अगर प्रधानमंत्री कार्यालय हस्तक्षेप करने के बजाए जान-बूझकार इस पर चुप्पी साधे रहा तो इसका मतलब तो यही निकलता है कि इस महालूट की स्वीकृति सरकार से मिली हुई थी। ऐसे में सरकार की मंशा और नीयत पर सवाल उठना तो स्वाभाविक ही है। मजे वाली बात तो यह है कि राष्ट्रमंडल खेल में अहम भूमिका निभाने वाले खेल मंत्रालय के अधिकारियों के कारनामों पर शुंगलू समिति ने चुप्पी साध रखी है। सिर्फ कलमाड़ी ही नहीं हैं खिलाड़ी खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष रहे सुरेश कलमाड़ी शुरू से गला फाड़ रहे हैं कि कॉमनवेल्थ गेम्स में हुए भ्रष्टाचार के लिए सिर्फ वे ही जिम्मेदार नहीं हैं। उन्हें तो सिर्फ बलि का बकरा बनाया जा रहा है। देखा जाए तो कलमाड़ी की बातों में सच्चाई है। अगर आज तक सीबीआइ कलमाड़ी को गिरफ्तार नहीं कर पाई है तो मानकर चलना चाहिए कि यह संयोग मात्र नहीं है। सच तो यह है कि अगर कलमाड़ी गिरफ्तार किए जाते तो वे उन रहस्यों को उगलने में देर नहीं लगाते, जो अभी तक अपने सीने में दफन हैं। शायद सरकार चलाने वालों को भी यह बात अच्छी तरह मालूम है। मजे वाली बात तो यह है कि अभी तक खेल आयोजन समिति के जिन अधिकारियों को सीबीआइ द्वारा गिरफ्तार किया गया है, उनके खिलाफ आज तक चार्जशीट तक दाखिल नहीं की गई है। और अब तो उन्हें हिरासत से छोड़ा भी जा रहा है। ऐसे में यह अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि केंद्र की संप्रग सरकार शुंगलू समिति की रिपोर्ट पर कुछ कार्रवाई करने नहीं जा रही है। दरअसल, देखा जाए तो महालूट के इस खेल का सबसे बड़ा खिलाड़ी तो सरकार ही है। भला उसे क्या आन पड़ी है कि कानून का डंडा अपनी ही पीठ पर चलाए। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).

No comments:

Post a Comment