Friday, April 8, 2011

.खानापूर्ति के लिए हैं राज्यों के विजिलेंस विभाग


भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में आम जनता अन्ना हजारे के पीछे यूं ही नहीं खड़ी हो गई। सच्चाई यही है कि आजादी के बाद से आज तक पिछले 64 सालों में देश में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने की मशीनरी खड़ी ही नहीं हो पाई है। भ्रष्टाचार से त्रस्त आम जनता के सब्र का पैमाना छलकने लगा था। ऐसे में अन्ना ने आवाज दी और कारवां बनता गया। आम आदमी सबसे अधिक त्रस्त जोरमर्रा के जीवन में फैले भ्रष्टाचार से है। बिजली, सड़क, पानी, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा जैसी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिए आम आदमी को हर दिन भ्रष्टाचार के दानव का सामना करना पड़ता है, लेकिन इस दानव से लड़ने का अस्त्र ही नदारद है। दरअसल ये सारी सेवाएं राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आती हैं और इन्हें भ्रष्टाचार मुक्त करने की जिम्मेदारी राज्य विजिलेंस विभाग की है, लेकिन भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सबसे अहम यह विभाग राज्यों में सबसे उपेक्षित है। इसमें न तो पर्याप्त स्टाफ है और न ही काम करने की स्वायत्तता। जाहिर है आम जनता भले ही भ्रष्टाचार से त्राहि माम कर रही हो, लेकिन राज्य सरकारों को इससे कोई लेना-देना नहीं है। केंद्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार से निपटने के लिए सीबीआइ और सीवीसी के रूप में ढांचा जरूर है। लेकिन इसके भी हाथ बांध दिए गए हैं। संयुक्त सचिव और उससे उच्च स्तर के अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का इन्हें अधिकार नहीं है। यहां तक कि इन अधिकारियों के खिलाफ किसी भी तरह की जांच शुरू करने के पहले एजेंसी को सरकार से पूर्व अनुमति लेनी पड़ती है। विनीत नारायण मामले के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने संयुक्त सचिव व उससे ऊपर के अधिकारियों के खिलाफ जांच पर लगे प्रतिबंध को हटा लिया था, लेकिन केंद्र सरकार ने संसद में कानून बनाकर फिर से एजेंसियों के हाथ बांध दिए। देश में भ्रष्टाचार निरोधक कार्रवाई के लिए बनी संस्था सीवीसी को भी कोई अधिकार है ही नहीं। वह भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश भर कर सकती है। हर साल हजारों मामलों में संबंधित विभाग सीवीसी की सिफारिश को कूड़ेदान में डाल कर आरोपी अधिकारियों को अभयदान देते रहते हैं। वहीं भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए बनी सीबीआइ राजनीतिक दुरुपयोग के लिए लंबे समय से बदनाम रही है|

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