भारत के वर्तमान माहौल में जहां पैसा, पद और प्रभाव जीवन का उच्चतम आदर्श बन चुका है, शिक्षा से लेकर समाज के सभी अंग इसे ही सफलता का मापदंड मान चु के हैं, उसमें स्वयं लोकपाल संस्था ही कल भ्रष्ट नहीं हो जाएगी, इसकी गारंटी कौन दे सकता है। फिर दुनिया के अन्य देशों की भ्रष्टाचार के सम्बंध में जो अवधारणा है हू-ब-हू वही हमारे यहां नहीं होनी चाहिए
शीर्ष स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार के नाश के लिए जिस लोकपाल के गठन की मांग हो रही है उसकी कल्पना हमें उसी तरह विश्व के प्रमुख देशों से मिली है जैसे हमने वर्तमान संसदीय लोकतंत्र की अवधारणा उनसे ग्रहण की है। इन्हें सामान्यत: ओम्बड्समैन कहा जाता है। लेकिन ओम्बड्समैन केवल भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है। ओम्बड्समैन की सामान्य व्याख्या यही है कि यह किसी नागरिक द्वारा की गई शिकायत की जांच कर जनता के हितों की रक्षा करता है।
नागरिक अधिकार और हित का भी ध्यान
वास्तव में यह महत्त्वपूर्ण तथ्य ध्यान रखना आवश्यक है कि अनेक देशों में केवल भ्रष्टाचार नहीं, राज्य के किसी अंग द्वारा आम नागरिकों के अधिकारों और हितों को हानि पहुंचाने की शिकायतों पर ध्यान देने वाली वैधानिक अधिकार सम्पन्न संस्था के रूप में अलग-अलग नामों से ओम्बड्समैन या लोकपाल का गठन किया गया है। अलग-अलग देशों में इसके स्वरूप, अधिकार एवं भूमिका में भी भिन्नता है।
अन्य देशों से तुलना
प्रश्न है कि क्या जिन देशों ने ऐसी संस्था का गठन कर लिया है उनके यहां भ्रष्टाचार का नाश या नियंतण्रहुआ है? इसके मूल्यांकन के लिए हमारे पास इस समय सबसे मान्य आधार ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल द्वारा हर वर्ष जारी किए जाने वाला भ्रष्टाचार धारणा सूचकांक (करप्शन पर्सेप्शन इंडेक्स) है। वर्ष 2010 के सूचकांक में 178 देशों में से तीन चौथाई का माप 5 के नीचे आया है। 10 अंक का अर्थ पूर्णतया भ्रष्टाचार रहित स्वच्छ देश है। एक तथ्य यह है कि डेनमार्क, न्यूजीलैंड एवं सिंगापुर 9.3 अंक के साथ सबसे ऊपर हैं। फिनलैंड एवं स्वीडन 9.2 अंक के साथ उसके बाद हैं। इन देशों में ओम्बड्समैन या उसके समरूप संस्थाएं काम कर रहीं हैं। प्रमुख देशों में अमेरिका 7.1 अंकों के साथ 23 वें स्थान पर है। ऑस्ट्रेलिया में कॉमनवेल्थ ओम्बड्समैन 1976 से काम कर रहा है और 8.7 अंक के साथ इसे आठवां स्थान मिला है। ब्रिटेन 7.6 अंक के साथ 20वें स्थान पर, कनाडा 8.9 अंक के साथ छठें स्थान पर, नीदरलैंड 8.8 अंक के साथ सातवें स्थान पर, नाव्रे 8.6 अंक के साथ 10वें स्थान पर है। इसे हम संतोषजनक कह सकते हैं।
बड़े देशों में ज्यादा चुनौतियां
दूसरी ओर फ्रांस में 1973 से ही 'मीडियाट्यूर डे ला रिपब्लिके'
नाम से ओम्बड्समैन कार्यरत है लेकिन इसे 6.8 अंक के साथ 25वां स्थान मिला है। जर्मनी को 7.9 अंक एवं 16वां स्थान, आयरलैंड को 8 अंक एवं 14वां स्थान, जापान को 7.8 अंक एवं 17वां स्थान, स्पेन को 6.1 अंक एवं 30वां स्थान, पुर्तगाल को 6 अंक एवं 32वां स्थान दिया गया है। इन प्रमुख देशों के सूचकांकों के आधार पर पहला निष्कर्ष यही आएगा कि ओम्बड्समैन ने वहां भ्रष्टाचार को नियंत्रित तो रखा है लेकिन अंत नहीं किया है। जिन देशों के 9 से ज्यादा अंक आए हैं वे छोटे देश हैं। बड़े देशों की स्थिति उतनी संतोषजनक नहीं है। फिर यह ओम्बड्समैन के कारण ही हुआ है, ऐसा निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता।
नव संसदीय लोकतंत्रों में हालात
पूर्व कम्युनिस्ट देशों में पोलैंड को 5 से ज्यादा- 5.3 अंक मिला है और वह 41वें स्थान पर है। किंतु रोमानिया 3.7 अंक के साथ 69वें स्थान पर, यूक्रेन 2.4 अंक के साथ 134वें स्थान पर एवं पुन: महाशक्ति की आकांक्षा पालने वाला रूस तो 2.1 अंक के साथ 154 वें स्थान पर है। इसके आधार पर यही न कहा जाएगा कि इन पूर्व कम्युनिस्ट देशों के संसदीय लोकतंत्र में रूपांतरित होने एवं वहां ओम्बड्समैन बनाने के बावजूद भ्रष्टाचार चरम पर बना हुआ है। हालांकि लातविया जैसा देश भी है जिसने 2007 में रायट्य डिफेंडर नाम से ओम्बड्समैन का गठन किया और उसे 4.3 अंक तथा 59वां स्थान मिला है। यह संतोषजनक नहीं है, लेकिन रूस आदि से तो बेहतर है।
यूरोपीय देशों में स्थिति बेहतर
दूसरी तरफ ओम्बड्समैन को आवश्यक साबित करने के लिए यूरोप के प्रमुख देश इटली का उदाहरण दिया जा सकता है जहां राष्ट्रीय स्तर पर कोई ओम्बड्समैन नहीं है फिर भी ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल ने उसे 3.9 अंक के साथ 67वें स्थान पर रखा है। यानी वहां यदि राष्ट्रीय स्तर पर ओम्बड्समैन होता तो उसकी स्थिति भी अन्य प्रमुख यूरोपीय देशों के आसपास होती। आइसलैंड में 'अम्बूड्समडूर अलबिजीस' नामक संस्था का गठन 1987 में हुआ था और आज इसे 8.7 अंक के साथ 11वां सम्मानजनक स्थान मिला हुआ है। हांगकांग में 1994 में कमीशन फॉर एडमिनिस्ट्रेटिव कम्प्लेंट्स नाम से ओम्बड्समैन का अस्तित्व उभरा और वह 8.4 अंक के साथ 13वें स्थान पर है।माल्टा जैसा देश भी ओम्बड्समैन की सफलता प्रमाणित करता है। उसने 1995 में ओम्बड्समैन का गठन किया और भ्रष्टाचार सूचकांक में 5.6 अंक के साथ 37वें स्थान पर है।
लोकपाल का गठन काफी नहीं
वास्तव में ओम्बड्समैन अपने आप यदि भ्रष्टाचार के अंत का सूचक होता तो ग्रीस में सिटिजन एडवोकेट्स ऑफ ग्रीस नामक संस्था का 1998 में गठन हो गया, पर उसे 3.5 अंक एवं 78वां स्थान मिला है। कोसोवो में पहला ओम्बड्समैन पर्सन सन् 2000 में नियुक्त हुआ और वहां का ओम्बड्समैन काफी सक्रिय माना जाता है, पर उसे 2.8 अंक एवं इसे स्थान मिला है, 110वां। जमैका में ऑफिस ऑफ द पब्लिक डिफेंडर का गठन 2000 में हो गया, लेकिन उसे 3.3 अंक एवं 87वां स्थान दिया गया है। पाकिस्तान में भी वफाकी माहतसिब नाम से ओम्बड्समैन के सदृश संस्था का गठन 1983 में ही हुआ और यह वहां के संविधान का भाग है। लेकिन पाकिस्तान की क्या हालत है यह बताने की आवश्यकता नहीं। वह 2.3 अंक के साथ 143वें स्थान पर है। फिलीपींस 2.4 के साथ 134वें स्थान पर, उज्बेकिस्तान 1.6 अंक के साथ 172वें स्थान पर है। पेरू और थाईलैंड 3.5 अंक के साथ 78वें स्थान पर, श्रीलंका 3.2 अंक के साथ 91वें स्थान पर है।
समकक्ष देशों के हालात-ए-हकीकत
इस समय भारत के समकक्ष माने जाने वाले देशों की तस्वीर भी संतोषजनक नहीं है। जैसे दक्षिण अफ्रीका 4.5 अंक के साथ 54वें स्थान पर, ब्राजील 3.7 अंक के साथ 69वें स्थान पर है। चीन में भी कंट्रोल यूआन नामक संस्था को ओम्बड्समैन जैसा माना जाता है लेकिन विश्व भ्रष्टाचार सूचकांक में उसे 78वां स्थान दिया गया है और उसे केवल 3.5 अंक मिले हैं।
कामयाबी के जरूरी घटक
साफ है कि ओम्बड्समैन की सफलता उन देशों की राजनीतिक, प्रशासनिक प्रतिबद्धता के साथ सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक दशा पर निर्भर है। भारत में लोकपाल का झंडा उठाए एवं उसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध रामबाण साबित करने वालों को विश्व के दूसरे देशों में ओम्बड्समैन की सफलता-विफलता का भी अध्ययन करना चाहिए। जैसा देश का सामाजिक मनोविज्ञान, भ्रष्टाचार के संदर्भ में जैसी आम धारणा, भ्रष्टाचारियों के साथ आम समाज का जैसा आचरण, जीवन शैली की जैसी प्रेरणा, रोजगार के जैसे साधन, शिक्षा का जैसा स्वरूप व विषय वस्तु, राजनीति में बहुमत का जैसा चरित्र वैसी ही वहां ओम्बड्समैन की भूमिका रही है। राजनीति और समाज के चरित्र के अनुरूप ही लोकपाल का स्वरूप भी बना है। मसलन, सभी देशों में इसे शिकायत के आधार पर कानूनी कार्रवाई आरम्भ करने या मुकदमा चलाने का अधिकार नहीं है। प्रश्न है कि क्या हमारे देश की राजनीति और समाज का चरित्र ऐसा है जिसमें लोकपाल की संतोषजनक सफलता की उम्मीद पैदा हो? भारत के वर्तमान माहौल में जहां पैसा, पद, प्रभाव जीवन का उच्चतम आदर्श बन चुका है, शिक्षा से लेकर समाज के सभी अंग इसे ही सफलता का मापदंड मान चुके हैं, उसमें स्वयं लोकपाल संस्था ही कल भ्रष्ट नहीं हो जाएगी इसकी गारंटी कौन दे सकता है?
व्यवस्था बदलाव की दिशा में हो काम
फिर दुनिया के अन्य देशों की भ्रष्टाचार के सम्बंध में जो अवधारणा है हू-ब-हू वही हमारे यहां नहीं होना चाहिए। वकील, सिनेमा के कलाकार, खिलाड़ी, डॉक्टर.. आदि और इनकी तरह के दूसरे प्रोफेशनल जिस तरह मनमाना पारिश्रमिक लेकर पूंजीशाह की श्रेणी में आ रहे हैं, सामान निर्माता एवं विक्रेता मनमाना कीमत ले रहे हैं, उन्हें सदाचारी माना जाए या भ्रष्टाचारी? कौन ओम्बड्समैन या लोकपाल इन पर अंकुश लगाएगा? जाहिर है, भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए लोकपाल या ओम्बड्समैन जैसी प्रतीकात्मक एवं वर्तमान व्यवस्था को मान्यता देनेवाली संस्थाओं से अलग व्यवस्था बदलाव की दिशा में काम करने की आवश्यकता है।

No comments:
Post a Comment