जन लोकपाल बिल का कानून बनना बहुत जरूरी है। इस कानून के जरिए निश्चित तौर पर भ्रष्ट लोगों में एक डर व्याप्त होगा। इसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान होगा लेकिन इसके अलावा इसमें सबसे खास बात यह है कि इसमें दोषियों को एक समय सीमा के भीतर ही सजा मिल जाएगी। हालांकि जन लोकपाल विधेयक कामयाब हो, इसके लिए समाज में आम लोगों में जागरूकता का बढ़ना जरूरी है
अन्ना हजारे के अनशन में कितने लोग शामिल हुए, इसे देखने और समझने की जरूरत है। केवल जंतर मंतर पर पहुंचे लोगों को देखने से बात नहीं बनेगी, मुम्बई में अन्ना के समर्थन में 8 हजार से ज्यादा लोग जमा हुए थे। देश में अलग-अलग जगहों पर हजारों लोग उनकी मांग से सहमत थे। जंतर मंतर पर मैं खुद ऐसे लोगों से मिली जो सतना, रीवा, उत्तराखंड और अन्य जगहों से आए थे। ये लोग किसी भीड़ में शामिल होने नहीं आए थे। उसमें समाज के कॉरपोरेट जगत में काम करने वाले प्रोफेशनल भी शामिल थे, स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले छात्र भी।
देश के लिए शुभ संकेत
आंदोलन के नजरिये से देखें तो इसमें एकदम नये लोग शामिल हुए जो समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार से त्रस्त हैं। वे भ्रष्टाचार से छुटकारा पाना चाहते हैं। वे इसके लिए सड़कों पर संघर्ष करने को तैयार हैं। यह आधुनिक भारत के लिए एक शुभ संकेत हैं। युवा पीढ़ी ने इस आंदोलन को विस्तार देने के लिए फेसबुक, ट्विटर जैसी आधुनिक संचार तकनीकों का सहारा लिया और कु ल मिलाकर दबाव इतना बढ़ा कि सरकार को आखिरकार झुकना पड़ा।
लम्बी लड़ाई की शुरुआत
भ्रष्टाचार को खत्म करने की दिशा में यह लम्बी लड़ाई की शुरु आत भर है लेकिन यह अन्ना हजारे के साथ-साथ आम लोगों की जीत है। सरकार ने लोकपाल बिल की ड्राफ्टिंग में जन सरोकार से जुड़े लोगों को शामिल कर लिया। यद्यपि इस समिति के सिविल सोसायटी की ओर से शामिल किए गये पांच सदस्यों पर सवाल उठने लगे हैं। कोई कह रहा है कि इन पांच लोगों में कोई महिला क्यों नहीं है? तो कोई कह रहा है कि इसमें मुस्लिम समाज की भागीदारी क्यों नहीं है, कोई कह रहा है कि इसमें एक साथ पिता-पुत्र क्यों शामिल हैं? ऐसे सवाल अनंत हो सकते हैं। हकीकत यही है कि सोच-विचार कर ही कमेटी में लोगों को शामिल किया गया है। हम लोगों ने इस कमेटी में उन लोगों को शामिल किया है जो कानूनी दांव-पेच को जानते-समझते हैं और सरकार के लोगों के सामने जन लोकपाल बिल की बात ज्यादा महत्वपूर्ण ढंग से रख पाएंगे। दरअसल, कानून के मसौदे पर बात करने के लिए चुने गये लोगों से यह अंदाजा लगाना कि उसमें हर वर्ग के लोगों का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं है, सही नहीं है। वैसे भी अलग-अलग प्रतिनिधि वर्ग के लोग इस लड़ाई में शामिल हैं, वे कानून बनाने वाली ड्राफ्टिंग कमेटी भले नहीं हों लेकिन इस पूरी प्रक्रिया से जुड़े हुए हैं।
बिल की ड्राफ्टिंग बड़ी चुनौती
बहरहाल, कानून की ड्राफ्टिंग के दौरान बड़ी चुनौती बनी रहेगी। कमेटी के लोगों को सरकार के सामने हर एक बिंदु पर लड़ना होगा क्योंकि सरकार वहां भी अड़ंगे लगाने से नहीं चुकेगी। कानून का ड्राफ्ट बनने के बाद असली चुनौती सामने आएगी। संसद में इसे पास कराने में मुश्किल आ सकती है लेकिन हम लोगों का संघर्ष तब तक जारी रहेगा जब तक लोकपाल कानून नहीं बन जाता है। बहरहाल, ऐसा भी नहीं है कि इस कानून के बनते ही सारी मुश्किलें दूर हो जाएंगी। देश में बहुत से कानून पहले से ही काम कर रहे हैं। हमने यह भी देखा है कि कानूनों का इस्तेमाल समाज के गरीब लोगों के खिलाफ ज्यादा होता है। जंगल संरक्षण के कानून की मार कॉरपोरेट को नहीं बल्कि आम आदमी को झेलनी पड़ रही है। न्यूनतम वेतन कानून हो या विस्थापन के बाद पुनर्वास के लिए बनाए गए कानून हों, इन सबका इस्तेमाल गरीब लोगों के खिलाफ ही होता है। मध्य प्रदेश में लोकायुक्त है, उसकी वेबसाइट पर 500 निर्णय भी पड़े हुए हैं लेकिन राज्य सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगती। नर्मदा के 500 करोड़ रु पये के भ्रष्टाचार को भी दबाने की कोशिश होती है।
भ्रष्ट लोगों में व्याप्त होगा भय
बहरहाल, जन लोकपाल कानून बनना बहुत जरूरी है। इस कानून के जरिये निश्चित तौर पर भ्रष्ट लोगों में एक डर व्याप्त होगा। इसमें भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी सजा का प्रावधान होगा। इसके अलावा इसमें सबसे खास बात यह है कि इसमें दोषियों को एक समय सीमा के भीतर ही सजा मिल जाएगी। जन लोकपाल विधेयक कामयाब हो, इसके लिए समाज में आम लोगों में जागरूकता का बढ़ना जरूरी है। हमें अब इस कानून के बनने का इंतजार नहीं करना चाहिए और अपने आसपास भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की हरसम्भव कोशिश करनी चाहिए। हम यह सब अहिंसक तरीके से कर सकते हैं, अन्ना हजारे ने हमें यही सिखाया है।
महज धन तक सीमित नहीं है भ्रष्टाचार
दरअसल, यह वक्त है व्यापक सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सुधार का। भ्रष्टाचार संघर्ष का एक हिस्सा जरूर है जो समाज के हर एक वर्ग को पीड़ित करता है। मगर भ्रष्टाचार केवल पैसे और संसाधनों का ही नहीं है, हमारे समाज में भ्रष्टाचार सोच, नीति और व्यवस्था का भी है। हमें हर प्रकार के, हर एक तबके के भ्रष्टाचार और अत्याचार के खिलाफ संगठित और संघर्षरत होना पड़ेगा। शासकीय अनियमितताओं, निजी कम्पनियों और ठेकेदारों की लूटपाट तथा साम्प्रदायिक ताकतों की साजिशें, इन सबको चुनौती देना देश की जनता का कर्त्तव्य है। अन्ना हजारे ने इन सबके लिए एक बेहतरीन रास्ता दिखाया है लेकिन हमें लम्बे संघर्ष के लिए तैयार रहना होगा। (प्रदीप कुमार की मेधा पाटकर से बातचीत पर आधारित)

No comments:
Post a Comment