वर्ष 2007 में खेल मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर ने राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी की मनमानी को लेकर प्रधानमंत्री को शिकायती पत्र भेजने के पहले तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम को भी चिट्ठी लिखी थी, लेकिन वह भी बेअसर रही। यह चिट्ठी बताती है कि कलमाड़ी का रसूख सरकार के नियम-कानूनों पर भारी था। वह सरकार को हिसाब किताब दिए बगैर सीधे वित्त मंत्रालय से खर्च का आदेश जारी करा लेते थे और खेल मंत्रालय को पैसा आवंटित करना पड़ता था। चिट्ठी में अय्यर ने यह अनुरोध किया था कि आयोजन समिति को पैसा आवंटित करने की प्रक्रिया से खेल मंत्रालय को अलग कर दिया जाए। तत्कालीन वित्तमंत्री चिदंबरम को संबोधित यह पत्र 5 दिसंबर 2007 का है। जो सरकार में कलमाड़ी के रसूख का एक बिल्कुल नया चेहरा सामने लाता है। वित्त मंत्रालय ने 2007 में खेल मंत्रालय को आदेश दिया था कि आयोजन समिति को पांच महीने के खर्च के लिए 70.21 करोड़ रुपये आवंटित किए जाएं। बकौल अय्यर, उस आवंटन के औचित्य का कोई ब्योरा खेल मंत्रालय के पास नहीं था। वित्त मंत्रालय का आदेश भी यह नहीं बताता कि आवंटन किस खर्च के लिए किया जाए। गौरलतब है कि आयोजन समिति को खर्च के लिए सरकार से कर्ज मिला था जिसकी किश्तें जारी करने के लिए खेल मंत्रालय अधिकृत था। खेल मंत्रालय को किनारे किए जाने को लेकर अय्यर ने पत्र में लिखा था, बेहतर होगा कि वित्त मंत्रालय आयोजन समिति को सीधे धन का आवंटन करे। आवंटन प्रक्रिया से खेल मंत्रालय को अलग करना ही उचित होगा। वित्त मंत्रालयवित्तीय नियमों के पालन को बेहतर ढंग से जांच सकता है। पत्र बताता है कि आयोजन समिति में अपारदर्शिता का मामला 2007 में मंत्रिसमूह की बैठकों में भी उठा था और हिसाब किताब ठीक करने के लिए एक उप समिति भी बनाई गई, लेकिन कलमाड़ी के सामने वह भी कुछ नहीं कर सकी। दो पेज के पत्र में अय्यर ने लिखा है कि आयोजन समिति आवंटित धन के इस्तेमाल की रिपोर्ट नहंी देती और न ही आय व खर्च की जानकारी दी जाती है। अय्यर लिखते हैं कि आयोजन समिति खेल मंत्रालय को पैसा देने वाली एजेंसी मानती है। कलमाड़ी चाहते हैं कि उन्हें पैसा दे दिया जाए और कोई सवाल न पूछा जाए। शायद सवाल न पूछने का ही यह नतीजा था कि पूरा आयोजन एक बड़े घोटाले पर जाकर खत्म हुआ है|
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