समाजसेवी अन्ना हजारे के साथ सूबे के लाखों लोगों का जुड़ जाना अनायास नहीं है। यह व्यवस्था से हताश आम लोगों में भ्रष्टाचार के प्रति पनपा आक्रोश है। आम जनमानस यह मानने लगा है कि भ्रष्टाचारियों से निपटने में वर्तमान व्यवस्था प्रभावी नहीं हो पा रही है। राज्य के लोकायुक्त प्रशासन की रिपोटर्ें इसका ज्वलंत प्रमाण है जिन पर सरकार कुंडली मारकर बैठी है। कार्रवाई का अधिकार न होने से लोकायुक्त प्रशासन भी सिवाय जांच रिपोर्ट भेजने के कुछ करने की स्थिति में नहीं है। वर्ष 1977 में लोकायुक्त प्रशासन की स्थापना के पीछे जो उद्देश्य था वह कहीं पीछे छूट गया है। लोकायुक्त की नियुक्ति के पीछे असल ध्येय मंत्री, विधायक, निकाय अध्यक्ष आदि लोक सेवकों के कुप्रशासन, भ्रष्टाचार व पद के दुरुपयोग आदि के मामलों में कार्रवाई कर आम जनता को राहत देना था, लेकिन ज्यादातर मामलों में ऐसा हो न सका। कारण लोकायुक्त का दंत विहीन होना है। वर्तमान में लोकायुक्त विभिन्न शिकायतों की जांच कर मुख्य सचिव से लेकर मुख्यमंत्री तक प्रतिवेदन (रिपोर्ट) व राज्यपाल को विशेष प्रतिवेदन भेज कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश ही कर सकते हैं। उन्हें सजा नहीं दे सकते। सूबे के लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा कहते हैं कि उनके पांच वर्ष के कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार व कुप्रशासन संबंधित जिन प्रमुख मामलों की जांच कर कार्रवाई के लिए सरकार से सिफारिश की है, उनमें नौ मामले मंत्री-विधायकों के, जबकि 14 निकाय अध्यक्षों से संबंधित हैं। इनमें से मात्र एक मामले में मंत्री के खिलाफ त्वरित कार्रवाई करने के सिवाय अन्य में सरकार ने कुछ खास नहीं किया। वह कहते हैं कि मौजूदा प्रारूप बहुत प्रभावी नहीं। वर्तमान कानून से भ्रष्टाचार व कुप्रशासन पर प्रभावी अंकुश नहीं लग सकता है। मेहरोत्रा कहते हैं कि केंद्रीय विधि मंत्री वीरप्पा मोइली को सौंपा जा चुका प्रस्तावित विधेयक लागू होने पर ही राज्य में भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई की अपेक्षा की जा सकती है। लोकायुक्त का कहना है कि यदि विधेयक के प्रारूप को जस का तस लागू किया जाता है, तो लोकायुक्त के दायरे में मुख्यमंत्री, विवि के कुलपति, मुख्य सचिव, कुलसचिव, स्थानीय निकायों के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सदस्य, ग्राम प्रधान आदि भी होंगे। लोकायुक्त भ्रष्टाचार की मौखिक सूचना या जानकारी का स्वत: संज्ञान ले सकेंगे। प्रस्तावित विधेयक में किसी भ्रष्टाचार के मामले में आरोपी की संपत्ति, आवास या कार्यालय में तलाशी को तलाशी वारंट जारी करने, अंतरिम प्रतिवेदन भेजने, जांच में राज्य या केंद्र की किसी अन्वेषण एजेंसी की सहायता लेने, जिला सतर्कता समिति गठित करने, जांच के दौरान निरीक्षण भी करने, किसी आरोपी के विरुद्ध अभियोजन की स्वीकृति की आवश्यकता न होने, जांच एजेंसी के कार्य का पर्यवेक्षण आदि करने का अधिकार भी लोकायुक्त को देने की व्यवस्था की गई है|
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