Tuesday, April 5, 2011

शासन तंत्र की ईमानदारी


देश का नागरिक आज पशोपेश में है। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत ईमानदारी निर्विवादित है, परंतु उनके नेतृत्व में चल रही संप्रग सरकार में भ्रष्टाचार का शीर्ष पर होना भी उतना ही निर्विवादित है। इस अंतर्विरोध को कैसे समझा जाए? विषय ईमानदारी को पारिभाषित करने का है। सामान्य तौर पर ईमानदारी को व्यक्तिगत सच्चाई के तौर पर समझा जाता है। जैसे कोई व्यक्ति कहे कि मैं तुम्हें दस रुपये दूंगा और वह रुपये दे दे अर्थात यदि व्यक्ति अपने कथन के अनुरूप आचरण करे तो उसे ईमानदार कहा जाता है, परंतु चोर यदि कहे कि मैं चोरी करने जा रहा हूं तो उसे ईमानदार नहीं कहा जाता है यद्यपि वह अपने कथन के अनुरूप आचरण कर रहा है। दरअसल, ईमानदारी के दो पहलू होते हैं-व्यक्तिगत एवं सामाजिक। ईमानदार उसी को कहा जाना चाहिए जो अपने विचारों के प्रति सच्चा होने के साथ-साथ समाज के प्रति भी सच्चा हो। स्टेनफोर्ड यूनिवर्सिटी द्वारा प्रकाशित दर्शनशास्त्र के विश्वकोष में इस संदर्भ में रोचक उदाहरण दिए गए हैं। यदि व्यक्ति कहे कि वह विलासिता के सिद्धांत के अनुसार व्यवहार करता है तो उसे ईमानदार कहा जाएगा? अथवा व्यक्ति कहे कि धन संचय करने के लिए वह न्याय, मित्रता अथवा सत्य को बाधा नहीं बनने देता है तो उसे ईमानदार कहा जाएगा? या फिर नाजी समर्थक यदि ईमानदारी से यहूदियों का सफाया करे तो उसे ईमानदार कहा जाएगा? तात्पर्य यह कि ईमानदार कहलाने के लिए सामाजिक ईमानदारी जरूरी है। इसी प्रकार प्रधानमंत्री की ईमानदारी कैबिनेट की ईमानदारी में दिखनी चाहिए। ईमानदार व्यक्ति के आचरण का परिणाम भी ईमानदार होना चाहिए। जैसे चोर ईमानदारी से चोरी करे तो उसका सामाजिक परिणाम झूठा हो जाता है इसलिए चोर को ईमानदार नहीं कहा जाता है। ईमानदार व्यक्ति की समाज के प्रति जवाबदेही भी होती है। जैसे ईमानदार व्यक्ति को बताना होगा कि उसके पास संचित धन का श्चोत क्या था? इसी प्रकार कैबिनेट के मुखिया प्रधानमंत्री को कैबिनेट मंत्रियों द्वारा संचित धन के श्चोतों के प्रति जवाबदेह होना चाहिए। समस्या तब विकट हो जाती है जब नेता दो में से केवल एक मानदंड पर खरा उतरता है। तब हमें चयन करना पड़ता है कि व्यक्तिगत ईमानदारी को ज्यादा महत्व दिया जाए अथवा नीतिगत ईमानदारी को? मुझे मनमोहन सिंह की नीतियां ईमानदार नहीं लगती हैं। उनकी सरकार ने सर्वत्र बड़ी-बड़ी कंपनियों को छूट दे रखी है। ये कंपनियां आम आदमी को मनमोहन सिंह की छतरी तले कुचल रही हैं और मनमोहन सिंह के कानों पर जूं भी नहीं रेंग रही है। पॉस्को स्टील प्लांट एवं जैतापुर परमाणु संयंत्र को जनता के घोर विरोध के बावजूद स्वीकृति दे दी गई है। देश के हितों को किनारे करते हुए अमेरिकी दबाव में ईरान से तेल की पाइपलाइन की योजना को ढीला छोड़ दिया गया है। प्रधानमंत्री के लिए देश हित से ज्यादा महत्वपूर्ण गांधी परिवार है। जनता को राहत पहुंचाने के नाम पर प्रधानमंत्री सरकारी कर्मचारियों की भ्रष्ट एवं स्वार्थी फौज खड़ी कर रहे हैं। मनरेगा के अंतर्गत जनता में ठाले बैठे रहकर आय अर्जित करने की प्रवृत्ति घर कर रही है। खाद्यान्न के घरेलू दाम ऊंचे होने पर इसका आयात करके किसान को लाभ कमाने से वंचित किया जा रहा है। गरीब द्वारा खरीदे गए पंखे और अमीर द्वारा खरीदे गए एयर कंडीशनर पर एक ही दर से टैक्स लगाया जा रहा है। संपूर्ण पहाड़ी गंगा पर बांध बनाकर मृतकों की अस्थियों को सड़े हुए पानी में विसर्जित करने को बाध्य करने की योजना है। देश के आदिवासी क्षेत्रों में वनकर्मियों एवं ठेकेदारों के माफिया से त्रस्त जनता को राहत देने के स्थान पर सेना से कुचलवाने की मुहिम चलाई जा रही है। हमारे ईमानदार प्रधानमंत्री द्वारा ऐसी नीतियां लागू की जा रही हैं जो देश के ऊपरी और मध्यम वर्ग-मुख्यत: सरकारी कर्मियों-के लिए लाभप्रद हैं, जबकि आम आदमी के लिए हानिप्रद। मेरी समझ से मनमोहन सिंह द्वारा प्रमुख जनहितकारी कार्यो में सूचना का अधिकार लागू करना है। ऋण माफी, रोजगार गारंटी, शिक्षा का अधिकार आदि केवल दिखावटी रूप से जनहितकारी है। जिन कारणों से किसान ऋणों से दबे हैं, श्रमिक रोजगार से वंचित हैं और गरीब शिक्षा हासिल नहीं कर पा रहे हैं उन कारणों को दूर करने का कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। हां, इतना जरूर है कि वह आर्थिक विकास दर बढ़ाने के लिए घरेलू बड़ी कंपनियों को छूट देने को आतुर हैं। मनमोहन सिंह की इस नीति का अंतिम आकलन परिणाम से किया जाना चाहिए। इस समय देश में माओवादी, आरक्षण, भूमिपुत्र आदि आंदोलन पैठ कर रहे हैं। भ्रष्टाचार एवं असंतोष का वातावरण बन रहा है। अत: मुझे मेरे द्वारा किया गया आकलन ठीक लगता है। फिर भी हर कोई ईमानदारी के मूल विषय पर अपने ढंग से विचार करने के लिए स्वतंत्र है। क्या कारण है कि व्यक्तिगत रूप से ईमानदार मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सामाजिक झूठ पनप रहा है? व्यक्तिगत और नीतिगत ईमानदारी के भेद को एक प्रसंग से समझा जा सकता है। किसी समय इंद्र और वृत्तासुर के बीच युद्ध हुआ था। इंद्र यज्ञ करते थे। यहां यज्ञ का अर्थ निवेश से लिया जाना चाहिए। इंद्र ने पहाड़ों को समतल करके खेती करने योग्य बनाया। उनके साथी मरुद् गणों ने व्यापार किया। इंद्र की नीतियां विकासोन्मुख और समाज के लिए हितकारी थीं। इसके विपरीत वृत्तासुर यज्ञ नहीं करता था यानी निवेश नहीं करता था। संभवत: वह समाज की यथास्थिति बनाए रखता था, जैसा सामंतवादी जमींदारों द्वारा किया जाता है। अत: नीतिगत स्तर पर वृत्तासुर पीछे था, परंतु व्यक्तिगत स्तर पर परिस्थिति बिल्कुल विपरीत थी। वाल्मीकि रामायण के उत्तरकांड में कहा गया है कि वृत्तासुर तीनों लोकों को आत्मीय समझ कर प्यार करता था। वह स्थिर प्रज्ञ था। लोक में उसका बड़ा आदर था। अर्थात व्यक्तिगत स्तर पर वृत्तासुर ईमानदार था। व्यक्तिगत स्तर पर इंद्र चंचल थे। उन्होंने तपस्या में लीन वृत्तासुर का छल-कपट से वध किया। वृत्तासुर व्यक्तिगत स्तर पर ईमानदार और सामाजिक स्तर पर जड़ था। इंद्र व्यक्तिगत स्तर पर चंचल, किंतु सामाजिक स्तर पर सकारात्मक थे। हमारी परंपरा में इंद्र को पूजा जाता है, न कि वृत्तासुर को। निष्कर्ष निकलता है कि सामाजिक नीतियां प्रमुख होती हैं और व्यक्तिगत ईमानदारी का दर्जा नीचे है। यही मनमोहन सिंह की समस्या है। वह नुकसानदेह सामाजिक नीतियां लागू कर रहे हैं अत: उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी का महत्व नहीं रह जाता है। (लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं)

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