Sunday, April 17, 2011

शोर ज्यादा, उपाय कम


जब से हमारे देश में यूरोपीय ढंग का शासन शुरू हुआ और यूरोपीय ढंग के विकास का सिलसिला शुरू हुआ, तभी से भ्रष्टाचार के नए-नए अवसर पैदा होने लगे। जिस ढंग का विकास हो रहा है, उसने भ्रष्टाचार के नए-नए रूपों को जन्म दिया है। इसलिए लोगों को नैतिक होने की सीख देना काफी नहीं है। भ्रष्टाचार के अवसरों को कम करने के तरीके भी खोजने होंगे
भ्रष्टाचार के सवाल पर चीख-पुकार ज्यादा हुई है, उसे रोकने के उपायों के बारे में र्चचा कम। या कहिए, नहीं के बराबर। राजनीतिक दलों से तो इसकी उम्मीद ही नहीं की जा सकती क्योंकि उनकी रु चि भ्रष्टाचार को बढ़ाने में ज्यादा रहती है। जन लोकपाल विधेयक के रूप में एक हथियार जरूर सामने आया है पर उसका जोर भ्रष्टाचार के स्रेतों को बंद करने के बजाय भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के विरु द्ध कार्रवाई करने पर ज्यादा है। यह सही है कि तेजी से और कठोर कार्रवाई होने से भी भ्रष्ट लोगों के मन में डर बैठता है और वे ऐसे कामों से बचने की कोशिश करते हैं जिनके लिए उन्हें दंडित किया जा सकता है। लेकिन यह डर बहुत ज्यादा असरकारी नहीं हो पाता। बड़े-बड़े भ्रष्टाचारों के सबूत मिलना लगभग असम्भव होता है क्योंकि वे बहुत होशियारी से किए जाते हैं। दीवारों के भी कान होते होंगे, पर काली कमाई की खनक उन तक नहीं पहुंच पाती। यहां मैं उन सामान्य भ्रष्टाचारों की र्चचा करना चाहता हूं जिनसे नागरिक जीवन सीधे प्रभावित होता है। ऐसा नहीं है कि भ्रष्टाचार के बड़े- बड़े मामलों का नागरिक जीवन पर प्रभाव नहीं पड़ता पर अकसर यह प्रभाव अप्रत्यक्ष होता है। टेलीकॉम घोटाले से हम-आप सीधे प्रभावित नहीं हुए पर इससे सरकारी खजाने को जो क्षति पहुंची, उस रकम से पता नहीं कितने स्कू ल और अस्पताल खुल सकते थे। अकसर हम ऐसे घोटालों और उनकी भारी-भारी रकमों के बारे में सोचते हैं पर उसका नुकसान समाज को किन रूपों में उठाना पड़ रहा है, यह बात हमारे दिमाग में नहीं आती। इसका कारण यह है कि घोटाला हो या नहीं, हम जानते हैं कि सरकार जनसाधारण के लिए नहीं, खास-खास लोगों और वगरे के हित में काम करती है। बहरहाल, साधारण आदमी के लिए फिलहाल इतना भी कम नहीं होगा कि उसके दैनिक जीवन से भ्रष्टाचार विदा हो जाए। जायज कामों के लिए भी उसे अपनी जेब न खाली करनी पड़े। इस सिलसिले में एक बुनियादी बात यह है कि भ्रष्टाचार का सम्बन्ध व्यक्ति की निजी बेईमानी से उतना नहीं, जितना व्यवस्था की बेईमानी से है। कृषि सभ्यता में भ्रष्टाचार कम था क्योंकि भ्रष्ट होने के अवसर बहुत कम थे। ज्यादातर बेईमानी राजाओं और सामंतों के इर्दगिर्द तक सीमित रहती थी। जब से हमारे देश में यूरोपीय ढंग का शासन शुरू हुआ और यूरोपीय ढंग के विकास का सिलसिला शुरू हुआ तभी से भ्रष्टाचार के नए अवसर पैदा होने लगे। जिस ढंग का विकास हो रहा है, उसने भ्रष्टाचार के नए-नए रूपों को जन्म दिया है। इसलिए भ्रष्टाचार के अवसरों को कम करने के तरीके भी खोजने होंगे। उदाहरण के लिए, जिन सेवाओं के क्षेत्र में ज्यादा भ्रष्टाचार है, उनका विस्तार बहुत कम हुआ है। अधिकांश शहरों के अच्छे स्कू लों में बच्चों को प्रवेश दिलाने के लिए पैसा देना पड़ता है क्योंकि अच्छे स्कूलों की संख्या उससे बहुत कम है जितने की जरूरत है। यदि अच्छे स्कूलों की संख्या आबादी की जरूरत के अनुपात में बढ़ा दी जाए तो भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा। यही बात अस्पतालों, बिजली और पानी के कनेक्शनों, नगरपालिका के लाइसेंसों आदि पर भी लागू होती है। दिल्ली में ऑटोिरक्शा चलाने के लिए नए लाइसेंस कई दशकों से नहीं दिए जा रहे हैं। इसके लिए तीन से चार लाख रु पए रिश्वत के रूप में देने पड़ते हैं। इसकी क्षतिपूर्ति के लिए ऑटो-रिक्शा चलाने वाले यात्रियों से मनमाना किराया वसूलना चाहते हैं। यदि इन वाहनों के लाइसेंस आवेदन करते ही मिलने लगें, तो ड्राइवर और ऑटो-रिक्शा मालिक भी खुश रहेंगे और यात्री भी। दूसरी बात है, सरकारी विभागों में समय से काम न होना। चूंकि हर फाइल अनिश्चित अवधि तक लटकती रहती है, इसलिए जिनका काम रुका हुआ है, वे रिश्वत देने के लिए बाध्य हो जाते हैं। यहां तक कि पेंशन पाने के लिए भी क्लकरे को पैसा खिलाना पड़ता है। अधिकांश विभागों में तय है कि भुगतान पाने के लिए प्राप्य रकम का कु छ प्रतिशत दक्षिणा में देना होगा। इसका निदान यह है कि प्रशासन की ओर से हर कार्यवाही की अवधि निश्चित कर दी जाए। यदि इस निश्चित अवधि में काम नहीं नहीं हो पाता है, तो सम्बद्ध विभाग के अधिकारी की ओर से आवेदक को चिट्ठी भेजनी होगी कि अमुक-अमुक कारणों से काम पूरा होने में विलम्ब हो सकता है तथा अमुक तारीख तक यह काम सम्पन्न हो जाएगा। जो अधिकारी इस नियम का पालन नहीं करेगा, उसका तत्काल निलम्बन अनिवार्य होना चाहिए। सूचना का अधिकार कानून में जवाब देने की अवधि निश्चित कर दी गई है। इसलिए गलत हो या सही, पर्याप्त हो या अपर्याप्त, निश्चित समय में उत्तर आ ही जाता है। क्या ऐसा ही नियम अन्य क्षेत्रों में नहीं बनाया जा सकता? जाहिर है, इस प्रकार के नियम वही राजनेता बना सकते हैं जो पाक-साफ हों। उनके चुने जाने में सबसे बड़ी बाधा है हिमालयी चुनाव खर्च। इसका इंतजाम करने के लिए राजनीतिक दलों-उम्मीदवारों को बहुत धन जुटाना पड़ता है, जिसकी मात्रा इतनी ज्यादा होती है कि वह काला धन ही हो सकता है। चुनाव जीतने पर इस खर्च को वसूलने के लिए नेता को भ्रष्ट होना ही पड़ता है। चुनाव खर्च की सीमा बांधने से कोई फायदा नहीं हुआ है। इस भ्रष्टाचरण को रोकने का एक मात्र उपाय है चुनाव खर्च का सरकारीकरण। इससे ईमानदार उम्मीदवारों के चुने जाने की सम्भावना बढ़ जाएगी। इस तरह के बहुत-से तरीके हैं, जिन्हें अपना कर सामान्य जीवन में भ्रष्टाचार पर अंकु श लगाया जा सकता है। असली सवाल यह है कि यह सब होगा कै से? तरीका वही है जो अन्ना हजारे के अनशन के समय दिखाई दिया था। प्रबुद्ध नागरिकों का समूह इस दिशा में पहल कर सकता है। लोकपाल विधेयक से कम महत्त्वपूर्ण काम नहीं है यह।



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