हाल ही में नवरात्र के दौरान कुट्टू के आटे से बनी पूडि़यां खाने के कारण राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाकों में पांच सौ ज्यादा लोग बीमार पड़ गए। इनमें दिल्ली में तो एक व्यक्ति की मौत भी हो गई। बीमार पड़ने वालों में दो सौ से अधिक लोग तो अकेले दिल्ली शहर के ही हैं। इसके अलावा उत्तर प्रदेश और हरियाणा के भी दिल्ली के निकटवर्ती जिलों में भारी संख्या में लोग इसके चलते बीमार पड़े हैं। देश में खाद्य पदार्थो की स्वास्थ्य गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार निगरानी तंत्र की सक्रियता की स्थिति का अंदाजा लगाने के लिए यह एक घटना ही काफी है। हालांकि घटना के तुरंत बाद ही यह तंत्र सक्रिय हो गया है और कई जगहों से सैंपल भरे गए हैं। कुछ गिरफ्तारियां भी इस सिलसिले में की गई हैं। इसके बावजूद इस बारे में पुख्ता जानकारी अभी तक नहीं हो सकी है कि यह जानलेवा घटना क्यों हुई है। कोई भी यह बता पाने की स्थिति में नहीं है कि आखिर उस आटे में ऐसा क्या था, जिसके चलते इतनी बड़ी संख्या में लोग बीमार पड़े। सरकारी तंत्र इतने गंभीर मामले में भी अपनी गति से ही चल रहा है। खाद्य अपमिश्रण केवल इस क्षेत्र ही नहीं, पूरे देश की गंभीर समस्या है। त्योहारों के समय यह हर साल कई बार अपने विकराल रूप में सामने आ जाती है। दीवाली और होली जैसे त्योहारों के मौके पर मिठाइयों और मावे में सिंथेटिक पदार्थो की मिलावट, घी और वनस्पति तेलों में पशुओं की चर्बी की मिलावट, मसालों और विभिन्न अनाजों में भी तरह-तरह की चीजों की मिलावट अब आम बात हो गई है। शायद ही कोई ऐसा त्योहार होता हो जब स्वास्थ्य विभाग दुकानों पर छापेमारी न करता हो। मिलावट के धंधे में लिप्त लोग पकड़े भी जाते हैं। हैरत की बात यह है कि इतनी कार्रवाइयों के बावजूद न तो इनका दुस्साहस कम होता है और न ही इसमें कोई कमी आती है। अगर इस सिलसिले में हर साल होने वाली धरपकड़ के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो शायद यह पाया जाए कि यह प्रवृत्ति लगातार बढ़ती ही जा रही है। मिलावट और जमाखोरी के नए-नए तरीके ईजाद कर लिए जा रहे हैं। आए दिन लोग इनके शिकार होकर असमय कालकवलित हो रहे हैं और देश भर में लाखों परिवार हर साल बर्बाद हो रहे हैं। अब सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? वह कौन सी वजह है जिसके चलते इन पर प्रभावी तौर पर रोक नहीं लगाई जा पा रही है? इसमें कोई दो राय नहीं है कि हमारे पास खाद्य अपमिश्रण पर रोक लगाने और इसमें संलिप्त लोगों पर कार्रवाई के लिए पुख्ता कानून है। इस पर अमल करने के लिए सरकारी तंत्र भी है। सरसरी तौर देखा जाए तो वह अपनी जिम्मेदारियां निभाता यानी कार्रवाई करते हुए दिखता भी है। छापेमारी होती है और धरपकड़ भी। इसके बावजूद लोगों के जीवन से खिलवाड़ की यह प्रक्रिया रुकती नहीं है, बल्कि और बढ़ती ही जा रही है। यह स्थिति इसके लिए जिम्मेदार पूरी व्यवस्था पर ही सवालिया निशान लगाती है। अगर रोकथाम के लिए मौजूद मजबूत तंत्र के बावजूद कोई अपराध न रोका जा सके तो इसका क्या अर्थ निकाला जाना चाहिए? जाहिर है, जिम्मेदार तंत्र अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभा रहा है। वह जिम्मेदारी निभाने के नाम पर सिर्फ खानापूरी कर रहा है। खाद्य पदार्थो की सैंप्लिंग और उनका सही तरीके से परीक्षण उसकी कार्य प्रक्रिया का नियमित हिस्सा नहीं रह गया है। यह काम वह केवल तभी करता है, जब उस पर कहीं से कोई दबाव होता है। यह दबाव कभी ऊपर से आए आदेशों का होता है और कभी ऐसी ही दुर्भाग्यपूर्ण घटनाओं के चलते बन जाता है। खुद स्वत:स्फूर्त ढंग से जिम्मेदार विभागों के अफसरों-कर्मचारियों की ओर से सामान्यतया कोई कार्रवाई होती दिखाई नहीं देती है। यह बात इस घटना से ही जाहिर हो जाती है। यह सोचने की बात है कि अगर नियमित रूप से संबंधित सरकारी अमला इस मामले में सतर्क रहता तो क्या ऐसी नौबत आती। वह भी केवल एक जगह नहीं, कुल तीन राज्यों में। दिल्ली के पूरे यमुना पार इलाके में इसके चलते करीब 200 लोग बीमार पड़े। जबकि उत्तर प्रदेश के नोएडा और गाजियाबाद के अलावा बुलंदशहर, मुजफ्फरनगर व मेरठ तथा हरियाणा के सोनीपत, अंबाला, रोहतक, हांसी और यमुनानगर में भी लोग इसके शिकार हुए हैं। इससे एक बात तो साफ तौर पर सामने आई है कि इन जगहों में से कहीं भी इस बात की कोई जांच-पड़ताल नहीं हुई कि जो चीजें लोग दाम चुका कर खाने के लिए ले जा रहे हैं, उनका उनके स्वास्थ्य पर क्या असर हो रहा है। जो चीजें लोग अपने खून-पसीने की कमाई से खरीदकर अपने जीवन को गति देने के लिए ले जा रहे हैं, वह मौत का कारण बन रही हैं। इस बात की कहीं कोई पड़ताल ही नहीं हो रही है कि जो सामान दुकानों पर बिक रहे हैं, उनकी गुणवत्ता की स्थिति क्या है। कायदे से यह काम नियमित रूप से होना चाहिए। क्योंकि खाद्य पदार्थो का मामला केवल अपमिश्रण तक ही सीमित नहीं है। कई बार लोग इसलिए भी बीमार पड़ जाते हैं कि जो चीजें वे खरीद कर ले जाते हैं और खाते हैं, वे बेहद पुरानी होती हैं। दुकानों में उनके भंडारण की व्यवस्था भी ऐसी नहीं होती है कि उन्हें सड़ने, गलने, खराब होने या नुकसानदेह जीवाणुओं से बचाया जा सके। दुकानदार उन्हें अपना पैसा निकालने के फेर में थोड़े कम दाम पर बेच देते हैं और महंगाई के चलते पहले से तंगहाल आम जन पैसा बचाने के फेर में ऐसी चीजें खरीद भी लेते हैं। कानून के मुताबिक ऐसी चीजें दुकानों पर होनी ही नहीं चाहिए। इस नजरिये से देखें तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? क्या यह संबंधित विभागों की जिम्मेदारी नहीं है कि वे निरंतर इस बात की तसदीक करते रहें कि दुकानों पर ऐसी चीजें न बिकने पाएं? लेकिन ऐसा होता नहीं है, यह सभी जानते हैं। सच तो यह है कि सरकार और व्यवस्था के लोककल्याणकारी होने की बात अब केवल किताबों तक ही सीमित होकर रह गई है। सामाजिक जिम्मेदारियों के निर्वाह के नाम पर भी इन दिनों केवल खानापूरी की जा रही है और निर्धारित बजट सधाया जा रहा है। आम जनता, उसकी सेहत और शिक्षा की चिंता न तो आज के अधिकतर राजनेताओं की चिंता का विषय है और न ही नौकरशाहों के लिए। यह सब उनकी प्राथमिकता सूची के अंतिम विषय हैं। अगर सरकारी तंत्र वास्तव में इस मसले पर गंभीर है तो उसे यहीं ठहर नहीं जाना चाहिए। खाद्य पदार्थो की गुणवत्ता की जांच के लिए नियमित व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए। साथ ही, इसका सही तरीके से अनुपालन भी हर हाल में कराया जाना चाहिए। आम आदमी इस संबंध में जागरूक हो, इसके लिए भी अभियान चलाया जाना चाहिए। अगर सरकार वास्तव में इस मसले पर गंभीर हो जाए तो इसमें कोई दो राय नहीं है कि खाद्य अपमिश्रण और खराब सामान बेचने पर रोक लगाने में बहुत समय नहीं लगेगा। (लेखक दैनिक जागरण हरियाणा, हिमाचल प्रदेश व पंजाब के स्थानीय संपादक हैं)
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