Friday, April 22, 2011

भ्रष्टाचार और गरीबी के खेल


सचाई चाहे कितनी ही कड़वी क्यों न हो, इसे स्वीकार करना ही पड़ता है। देश के विकास का नक्शा खींचने वाले योजना आयोग ने भी मान लिया है कि भ्रष्टाचार का घुन सरकारी तंत्र में इतनी गहराई तक घुस गया है कि लोग आजिज आ गए हैं और मान बैठे हैं कि विकास की चाहे जो भी योजना बने, उसमें भ्रष्टाचार के कीड़े अपने आप पनपने लगेंगे। आश्र्चय की बात है कि देश का बच्चा-बच्चा जिस कड़वी हकीकत को लंबे अरसे से जान रहा था उसकी समझ योजना आयोग को आज आई है। इससे भी आश्र्चय की बात यह है कि आयोग की समझ के पीछे फेसबुक और इंटरनेट पर मिली प्रतिक्रियाएं हैं जो बताती हैं कि सरकारी तंत्र आज भी गरीबी में कुलबुलाते देश की अधिसंख्य आबादी की भयावह वास्तविकता से सीधा नहीं जुड़ पाया है। इसलिए अगर योजना आयोग इस बात पर अपनी पीठ थपथपा रहा है कि पांच साल में सात करोड़ गरीब घट गए तो इस बात पर कौन यकीन करेगा! प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह बार- बार कह रहे हैं कि डेंजर लाइन को पार कर रहे भ्रष्टाचार का असल खामियाजा तो गरीबों को ही भुगतना पड़ता है। ऐसे में गरीबों की संख्या घटी है या इसमें और इजाफा हो गया है इसके वास्तविक आंकड़े देश को कहां से मिलेंगे! योजना आयोग मान रहा है कि सरकार के डिलीवरी सिस्टम की धार भ्रष्टाचार ने कुंद कर दी है। इस सिस्टम के असल जरूरतमंद तो ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में बसने वाले करोड़ों गरीब ही हैं तब इस कुंद धार के शिकार कौन हैं क्या यह जानने के लिए किसी को योजना आयोग के आंकड़ों की जरूरत है! आज कल देश को दो तस्वीरों- भारत और इंडिया में बांटने का फैशन चल निकला है। भूख और अभाव से कुलबुलाते करोड़ों को भारत बताया जा रहा है जबकि अधिकता से अघाई मुट्ठीभर आबादी इंडिया का झंडा फहरा रही है। अब भले सुप्रीमकोर्ट लताड़ लगाते रहे कि देश को इस प्रकार बांटना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता पर उसकी सुन कौन रहा है! एक तरफ खुशखबरी सुनाई जा रही है कि फसलों के रिकार्ड उत्पादन से हमारे खाद्य भंडार लबालब हैं तो दूसरी तरफ दबी जुबान से कुपोषण और भुखमरी की बात भी मान ली जा रही है। गरीब कौन, इसकी सीमारेखा राजधानियों के वातानुकूलित दफ्तरों में तय हो रही है। शहरों में बीस रुपए और गांवों में ग्यारह रुपए रोज की आमदनी की सीमारेखा गरीबी के लिए तय हो रही है। इस आमदनी से परिवार की तो छोड़िए एक इंसान क्या दो वक्त पेट भर सकता है! लेकिन, सरकार को तो सीमारेखा चाहिए ताकि आंकड़ों की बाजीगरी खेली जा सके। इसलिए घोषणा हो जाती है कि देश की बत्तीस फीसद आबादी ही अब गरीबी रेखा के नीचे बची है। फीसद के आधार पर घोषणा कर हम यह कहने से बच जाते हैं कि अब देश में केवल चालीस करोड़ लोग बचे हैं जो आज भी भूख से बेहाली की नियति झेलने को मजबूर हैं। अफसोस, इन गरीबों की पहचान हम सिर्फ उनके पेट भरने की सामथ्र्य से करते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मानक जो इंसान को जानवर से अलग करते हैं आज भी बहस के मुद्दे हैं कि क्या इन्हें भी गरीबी के संदर्भ से जोड़ा जा सकता है। भ्रष्टाचार और गरीबी के बीच का यह चोली-दामन वाला खेल कब तक चलता है, बस देखते जाइए।

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