भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के अनशन को जनता की आवाज मान रहे हैं लेखक
कालचक्र क्षमा नहीं करता। लोक और तंत्र भिड़ गए हैं। अन्ना हजारे अनशन के जरिए लोकमन की आवाज उठा रहे हैं, प्रधानमंत्री बचाव के रास्ते की तलाश में हैं। सत्ता समय का आ ान नहीं सुनती। सो समूचे राष्ट्र में उबाल है। भ्रष्टाचार सर्वोपरि राष्ट्रीय समस्या है। भारतीय सत्ताधीशों ने भ्रष्टाचार किया, पाला-पोसा, परवान चढ़ाया। चेहरे बदलते गए, सत्ता आती-जाती रही, भ्रष्टाचार बढ़ता रहा, राष्ट्र की नस-नस में फैल गया। भ्रष्टाचार केंद्र की वर्तमान सत्ता का न्यूनतम साझा कार्यक्रम है। प्रधानमंत्री भी भ्रष्टाचार के संरक्षक दिखाई पड़ रहे हैं, भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली संवैधानिक संस्था के प्रमुख-मुख्य सतर्कता आयुक्त भी दागी निकले। ढेर सारे केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और वरिष्ठ अधिकारी भी आरोपों के लपेटे में हैं। सुप्रीम कोर्ट को भी कहना पड़ा कि सरकार हरेक काम की रिश्वत का रेट क्यों नहीं तय करती? विदेशी बैंकों में जमा धन भ्रष्टाचार की कमाई है। चुनावों में काले धन की बड़ी राशि का इस्तेमाल हो रहा है। देश का हरेक व्यक्ति भ्रष्टाचार से पीडि़त है। बावजूद इसके केंद्र बहुप्रतीक्षित लोकपाल विधेयक का निहायत बेकार मसौदा लाया है। अन्ना हजारे की मुहिम को व्यापक जनसमर्थन मिल रहा है। सत्तापक्ष ने अन्ना पर घटिया आरोप लगाए हैं कि अन्ना कुछ लोगों के उकसावे पर अनशन पर बैठे हैं और अनशन का फैसला जल्दबाजी में उठाया गया कदम है। भ्रष्टाचार की हरेक घटना पर आंख मूंदने वाली दृष्टि अपनाने वाले प्रधानमंत्री की सरकार इस मुहिम को जल्दबाजी क्यों मान रही है? राष्ट्र प्रश्नाकुल है। संसद ने सशक्त लोकपाल बनाने में 43 बरस क्यों गवाएं? प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी 1967 में इसकी सिफारिश की थी। लोकसभा ने 1968 में यह प्रस्ताव पारित किया, राज्यसभा गया तब तक लोकसभा भंग हो गई। कांग्रेस की ही सत्ता में 1971 में नया विधेयक आया, बेकार गया। जेपी की मांग पर 1977 में जनता सरकार नया विधेयक लाई, लेकिन लोकसभा भंग हो गई। राजीव गांधी सरकार में 1985 में फिर नया विधेयक आया, आगे नए विधेयक का वादा हुआ। 1996 में देवगौड़ा सरकार नया विधेयक लाई, लोकसभा भंग हो गई। वाजपेयी सरकार भी 1998-99 में नया विधेयक लाई, लोकसभा भंग हो गई। अब 2011 के सरकारी विधेयक में भी राष्ट्र के साथ हास्यास्पद मजाक किया गया है। सो देश के इतिहास में पहली दफा आमजनों की तरफ से एक जनलोकपाल विधेयक का मसौदा जारी किया गया है।जनलोकपाल विधेयक की कई बातें विचारणीय हैं। प्रस्तावित सरकारी लोकपाल जनता से सीधे शिकायतें नहीं सुनेगा। आमजन लोकसभा अध्यक्ष/राज्यसभा सभापति को शिकायत करेंगे, लेकिन जनलोकपाल आम जनता की शिकायतें सीधे लेगा। सरकारी लोकपाल जांच के बाद सिफारिश करेगा, लेकिन जनलोकपाल सीधे कार्रवाई करेगा। जनलोकपाल प्रस्ताव में पुलिस की भी शक्तियां मांगी गई हैं। इस लोकपाल की परिधि में नेता, अधिकारी और न्यायपालिका को भी शामिल करने की मांग की गई है। सरकारी प्रस्ताव वाले लोकपाल की चयन समिति में उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, दोनों सदनों के नेता, प्रतिपक्ष के नेता, गृह मंत्री व विधि मंत्री होंगे, लेकिन जन लोकपाल का चयन न्यायपालिका, मुख्य चुनाव आयुक्त, महालेखाकार, भारतीय मूल के नोबेल व मैग्सेसे पुरस्कृत व्यक्तियों द्वारा कराए जाने की मांग है। दुर्भाग्य से इस प्रस्ताव में निर्वाचित संसद के प्रति जवाबदेह किसी भी पदधारक का उल्लेख नहीं है। इसी तरह लोकपाल की जांच में प्रथम द्रष्टया आरोपी के विरुद्ध एक साल के भीतर न्यायिक कार्रवाई पूरी करने की मांग भी है। बेशक इस प्रस्ताव में आलोचनाओं की गुंजाइश है, बावजूद इसके अन्ना केआंदोलन ने सारे देश का ध्यान आकर्षित किया है। बहुमत न्याय का सबूत नहीं होता। संसद में जवाब देकर बच जाना आसान है, लेकिन राष्ट्रीय गुस्से की गरम आंच से बचना असंभव है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध राष्ट्र का गुस्सा अचानक नहीं उमड़ा। योग गुरु रामदेव ने भी दिल्ली की रैली में भ्रष्टाचार का सवाल उठाया था। सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार पर गंभीर टिप्पणी की, सीवीसी की नियुक्ति को गलत बताया, 2-जी घोटाले की जांच भी वही करवा रहा है। प्रधानमंत्री इतना भी नहीं जानते कि भ्रष्टाचार पर कार्रवाई उन्हीं की सरकार की ही जिम्मेदारी है। सुषमा स्वराज ने लोकसभा में शेर सुनाते हुए सटीक टिप्पणी की थी। जवाब में प्रधानमंत्री ने भी शेर पढ़ा-माना कि तेरी दीद के काबिल नहीं हूं मैं/तू मेरा शौक देख, मेरा इंतजार देख। राष्ट्र पीछे लगभग 8 वर्ष से प्रधानमंत्री का शौक और इंतजार ही देख रहा है। लोकतंत्र में लोकहित की सर्वोपरिता है। तब लोकपाल लोकहित का संरक्षक होना चाहिए, लेकिन देश में भ्रष्टाचार की सत्ता है। अन्ना हजारे आदि की मांगें अटपटी हो सकती हैं। वे विधेयक की तैयारी में जनता के लोगों को शामिल करने की मांग कर रहे हैं, वे लोकपाल की नियुक्ति समिति में भी ऐसा ही चाहते हैं। बेशक ऐसी मांगें स्थापित परंपरा से मेल नहीं खातीं, लेकिन उनका लक्ष्य सत्ता नहीं लोकहित ही है। संविधान, कानून और सारी संस्थाओं का उद्देश्य लोकहित ही होता है। सरकारी पिछलग्गू लोकपाल लोकहित का संरक्षण नहीं कर सकता। प्रधानमंत्री कृपया देश को बताएं कि भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन पर आपकी सरकार की कार्ययोजना क्या है? न्यायपालिका को लोकपाल की परिधि से बाहर रखने का कारण क्या है? नौकरशाहों और राजनेताओं को अलग-अलग क्यों रखा गया है? सरकारी कदाचरण के ज्यादातर मसले राजनेता और अफसरों के साझे होते हैं। दोनों को लोकपाल के दायरे में लाने की शक्ति को सिर्फ सलाहकार की ही भूमिका में रखने का औचित्य क्या है? प्रधानमंत्री नोट करें लोक सरकारी लोकपाल नहीं, वास्तविक लोकपाल चाहता है। यही वजह है कि लोक लड़ रहा है। सरकारें सामान्य आंदोलनों पर मौन रहती हैं। प्रधानमंत्री ने अन्ना हजारे के पत्र की उपेक्षा की। कानून मंत्री को प्रस्तावित विधेयक की प्रति दी गई तो भी संवाद नहीं हुआ। अनशन शुरू हुआ तो भी सरकारी पक्ष ने उपेक्षा का रुख अपनाया। अन्ना हजारे गांधीवादी परंपरा के नायक हैं। देश उनके साथ है। वे लड़ाई जारी रखें, लेकिन उनका और उनके साथियों का जीवन अमूल्य है। वे लड़ाई के तरीके को बदलने पर विचार करें। राष्ट्र सरकार के अडि़यल रुख का बदला लेगा। अन्ना के कई उत्साही साथी देश के समूचे राजनीतिक संसदीय तंत्र को ही खारिज करने पर आमादा हैं। संविधान और संसदीय जनतंत्र केढांचे में ही लोकपाल की उपयोगिता है। दुनिया के अनेक देशों ने भिन्न-भिन्न नामों से ऐसी ही संस्थाएं बनाई हैं। अमेरिका में तो व्यापारिक कंपनियों ने भी अपने कार्यसंचालन के लिए ऐसे ही शक्तिशाली निकाय बनाए हैं। भ्रष्टाचार और राष्ट्रीय इच्छा का तिरस्कार देश की जनता अब और आगे बर्दाश्त नहीं कर सकती। (लेखक उप्र विधान परिषद के सदस्य हैं)

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