Thursday, April 7, 2011

काले धन से पा सकते हैं पार


आए दन देश के कुलीन तबके का नाम रिश्वत के बड़े मामलों में सामने आने पर हमें गुस्सा तो आता ही है, साथ ही यह सवाल भी उठता है कि आखिर वह पैसा कहां जाता है? भारी काला धन आखिर कैसे बिना किसी परेशानी के सफेद बनता है? जब सुखराम ने रिश्वत ली तो उन्होंने उसे सूटकेसों में भरकर रखा लेकिन जब मधु कोड़ा ने ऐसा किया तो जाहिर है उन्हें कुछ अधिक रचनात्मक तरीका खोजना था। अचल संपत्ति का बेनामी लेन-देन संभव तो है लेकिन इन सौदों को छिपाना आसान नहीं। ऐसे में बुद्धिमानी यही है कि इस पैसे को विदेशों में कुछ खास ठिकानों में रखा जाए। भारत के विश्व अर्थव्यवस्था से जुड़ने से चालू और पूंजी खातों से पैसा देश में लाना और यहां से ले जाना आसान हो गया है जिससे देश में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है। वैश्वीकरण के दौर में भ्रष्टाचार के तीन आयामों पर चर्चा करें तो यह बात अधिक स्पष्ट हो सकती है।

भूमंडलीकरण की वजह से भारी मात्रा में पूंजी देश से बाहर जा सकती है। लैटिन अमेरिकी देशों में अस्थिरता के दौर में कुछ ऐसा ही हुआ था। दुनिया के भ्रष्ट और निरंकुश शासन वाले देशों में लगातार ऐसा हो रहा है। आज के भारत में वैश्वीकरण की ताकत से युक्त भ्रष्टाचार की इतनी ही दास्तान नहीं है। भारत की तेज माली तरक्की से यहां वैध-अवैध मुनाफे को एक समान गति से ऊंचा मुनाफा मिल रहा है। फिर भी भ्रष्ट लोग केवल अपने काले धन को छिपाने के सुरक्षित ठिकाने नहीं तलाशते बल्कि पुख्ता ठिकाने तलाशते हैं। आखिर जो धन राशि बाहर जाती है उसे वापस तो आना ही है। वृहद अर्थव्यवस्था के संदर्भ में होता यह था कि पूंजी बाहर जाने से घरेलू बचत और निवेश में कमी आती थी लेकिन अब होता यह है कि बचत पर तो बहुत अधिक असर नहीं पड़ता लेकिन वितरण पर इसका असर होता है। न केवल सार्वजनिक धन कुछ निजी हाथों में चले जाते हैं बल्कि अवैध धन वापस लाने की प्रRिया में तमाम तरह की छूट और कर बचत मिलती है क्योंकि यह विदेशी निवेश के रूप में आता है। यह केवल भारत में नहीं होता। अनुमान है कि चीन में होने वाले कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में चौथाई से लेकर एक तिहाई तक ऐसा ही धन लगता है।

दरअसल पैसा कई तरीकों से बाहर जाता और वापस आता है। चालू खाते के मामले में सेवा व्यापार इसका बढ़िया माध्यम है। सेवाओं को कर के जाल में उलझा पाना आसान नहीं होता है और इसलिए यह काम आसान हो जाता है। एक दूसरा आसान तरीका यह है कि पैसा विदेश में रहने वाले किसी रिश्तेदार को दे दिया जाता है जो बाद में किसी अन्य रिश्तेदार की विदेश में रहकर की गई कमाई के रूप में वापस आ जाता है।

तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम जैसी सरकारी कंपनियां कमजोर प्रशासन वाले मुल्कों में परिसंपत्तियां खरीदने में अरबों डॉलर की रकम लगा रही हैं। यह भी भ्रष्टाचार के लिए काफी गुंजाइश छोड़ती है। अभी पिछले सप्ताह ही कैग यानी भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने कहा था कि रूस में ऐसी गतिविधियों में 1,182 करोड़ रुपए और सूडान तथा कतर में 800 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। हालांकि ये नुकसान खराब कारोबारी निर्णयों की वजह से भी हो सकते हैं लेकिन अगर कोई गलत इरादा रखे तो उसके पास काफी गुंजाइश रहती है। इसके अलावा बैंकिंग भी इसका एक जरिया है। झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा, जिन्होंने कथित तौर पर 4,000 करोड़ रुपए की संपत्ति बटोरी थी उनके पास दुनिया भर में संभवत: 1,800 से अधिक बैंक खाते हैं। हाल के हफ्तों में 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच में लगी एजेंसियों का मानना है कि इस दौरान लाभान्वित होने वाली कम से कम पांच कंपनियों का धन संयुक्त अरब अमीरात, ब्रिटेन, नॉर्वे, लीबिया, सिंगापुर, जर्सी, रूस, साइप्रस और मॉरीशस आदि देशों में निवेश कर दिया गया था। अगर साइप्रस से आने वाल एफडीआई जर्मनी और फांस से आने वाले एफडीआई के बराबर हो तो जाहिर है कि कुछ-न-कुछ बात है, या फिर मॉरीशस से भारत आने वाले एफडीआई की मात्रा तमाम जी-7 देशों के एफडीआई से ज्यादा हो तो किसे संदेह नहीं होगा? यह मॉरीशस में कॉरपोरेट घरानों से मात्र तीन प्रतिशत की दर से टैक्स वसूले जाने और भारत के साथ उसकी कर संधि की बदौलत मुमकिन होता है। इस संधि के मुताबिक मॉरीशस के जरिए भारत में आने वाले निवेशकों को पूंजीगत लाभ कर नहीं चुकाना पड़ता। ऐसा नहीं है कि भारत को सिर्फ कर राजस्व की हानि होती है बल्कि पारदर्शिता का अभाव पैसे का सही dोत छिपाना आसान बना देता है। संभवत: राजनेता इस स्थिति को बदलने के बहुत इच्छुक नहीं हैं। देश में भ्रष्टाचार की महामारी की जड़ें और उनका समाधान दोनों यहीं स्थित है। हालांकि ये समाधान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों हो सकते हैं। व्यापक पैमाने पर देखा जाए तो भारत को काले धन की परेशानी से बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहल करनी चाहिए ताकि वह अपने नागरिकों की विदेशी संपत्ति के बारे में सही सूचना हासिल कर सके और उस तक आसानी से पहुंच सके। हालांकि भारत भारत सरकार ने हाल में एफएटीएफ यानी फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स का गठन कर इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है लेकिन इसका दायरा अब भी काफी संकुचित है। अगर प्रधानमंत्री समेत कांग्रेस, भारतीय जनता पार्टी और वाम दल सभी भ्रष्टाचार के खिलाफ उतने ही गंभीर हैं जितना कि वे खुद को दिखाते हैं तो यह समय उनकी कठिन परीक्षा का है।



No comments:

Post a Comment