Saturday, July 30, 2011

यह लोकपाल नही रोक पाएगा भ्रष्टाचार

महाभियोग से डरे दिनकरन का इस्तीफानई दिल्ली,

भ्रष्टाचार के आरोपों में महाभियोग की कार्यवाही का सामना कर रहे सिक्किम हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनकरन ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। जस्टिस दिनकरन ने शुक्रवार शाम राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को अपना इस्तीफा भेजा। पद से इस्तीफा देने के बाद उन्हें पद से हटाने के लिए राज्यसभा में लंबित महाभियोग की कार्यवाही स्वत: समाप्त हो जाएगी। जस्टिस दिनकरन विवादों में तब आए जब 2009 में उनका नाम सुप्रीम कोर्ट में प्रोन्नति के लिए भेजा गया और बार के कुछ वकीलों ने उन पर सरकारी जमीन पर कब्जे का आरोप लगाते हुए प्रोन्नति का विरोध किया। अंत में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में उनकी प्रोन्नति की संस्तुति वापस ले ली गई। बाद में जस्टिस दिनकरन के खिलाफ जांच हुई। जस्टिस दिनकरन को पद से हटाने के लिए सांसदों ने हस्ताक्षर कर राज्यसभा में महाभियोग का प्रस्ताव दिया जिसे सभापति ने स्वीकार कर लिया। फिलहाल राज्यसभा सभापति द्वारा नियुक्ति तीन सदस्यीय जांच समिति जस्टिस दिनकरन पर लगे आरोपों की जांच कर रही है। इस समिति के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश आफताब आलम हैं। हाल ही में दिनकरन की अर्जी पर सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता पीपी राव को समिति के पद से हटाने और उनकी जगह दूसरे कानूनविद को रखने का निर्देश दिया था। यह आदेश दिनकरन की ओर से राव पर पक्षपाती होने की आशंका जताये जाने पर दिया गया था। हालांकि कोर्ट ने राव पर लगाए गए दिनकरन के आरोप नहीं स्वीकार किए थे और जस्टिस दिनकरन का अर्जी दाखिल करने को देरी करने का हथकंडा बताया था। मालूम हो कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के न्यायाधीश को सिर्फ संसद में महाभियोग के जरिये ही पद से हटाया जा सकता है। इसके अलावा अनुच्छेद 217 (1)(ए) के मुताबिक हाईकोर्ट के न्यायाधीश अपने हस्तलेख में राष्ट्रपति को संबोधित कर पद से इस्तीफा दे सकते हैं।

अन्ना को पागल बताने वाली चिट्ठी सरकारी वेबसाइट पर

नई दिल्ली लोकपाल पर जनता की राय मांगना सरकार के लिए सिर्फ एक राजनीतिक शोशेबाजी से ज्यादा कुछ नहीं। खुद वित्त मंत्री ने देश भर के लोगों के सुझाव आमंत्रित करते हुए कहा था कि कैबिनेट के पास मसौदा भेजे जाने से पहले इन पर विचार किया जाएगा। हजारों लोगों ने अपने सुझाव भेजे भी, लेकिन इन पर विचार करना या इन्हें पढ़ना तो दूर, अब तक इनकी गिनती तक नहीं की गई है। उल्टे सरकारी वेबसाइट पर अन्ना हजारे को पागल बताने वाली एक चिट्ठी जरूर डाली गई है। इस चिट्ठी में अन्ना को सांप्रदायिक सिद्ध किया गया है। इसके अतिरिक्त कहा गया है कि दलित, पिछड़े वर्गो के साथ-साथ मुस्लिम समाज को इसलिए भ्रष्टाचार की लड़ाई से अलग रहना चाहिए, क्योंकि देश में कभी कोई मुसलमान प्रधानमंत्री नहीं बनेगा। इस चिट्ठी में और भी तमाम तर्कहीन बातें लिखी हैं, लेकिन उसे पर्याप्त महत्व देते हुए वेबसाइट पर स्थान दिया गया है। देश भर से 15 हजार से ज्यादा लोगों ने ई-मेल या पत्र के माध्यम से लोकपाल के संबंध में अपनी राय दी। इनमें से अधिकांश उस ई-मेल पर भेजे गए जो वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के आदेश के बाद इस विभाग ने तैयार किया था। इन ई-मेल में कोई दो सौ ई-मेल का प्रिंट लेकर उन्हें एक फाइल में लगा दिया गया, पर अब तक इस पर कोई विचार नहीं किया गया है। विभाग के वरिष्ठ अधिकारी अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं, यह काम डीओपीटी की निगरानी शाखा के सेक्शन-4 को दिया गया है, जिसमें आधा दर्जन कर्मचारी भी नहीं। इनके पास रूटीन की जिम्मेदारियां भी हैं। इसलिए अब तक सिर्फ कुछ ई-मेल के प्रिंट लिए जा सके हैं। उन्हें अब तक पढ़ना या उनका सारांश तैयार करना भी संभव नहीं हुआ है। वित्त मंत्री ने जनता से मिलने वाले सुझावों को वेबसाइट पर भी डालने को कहा था, मगर अब तक कुल 22 सुझाव ही सरकार को डीओपीटी की वेबसाइट पर डालने लायक लगे। इनमें अन्ना हजारे को पागल और माओवादी बताने वाली चिट्ठी भी शामिल है।

अन्ना के आड़े आई दिल्ली पुलिस

नई दिल्ली संसद सत्र का हवाला देकर दिल्ली पुलिस जंतर-मंतर पर 16 अगस्त से प्रस्तावित अन्ना हजारे के अनशन पर अड़ंगा डालने में जुट गई है। बेमियादी अनशन की अनुमति देने के बजाय पुलिस ने अन्ना से न केवल इसकी अवधि बताने को कहा है बल्कि यह भी पूछा है कि इसमें कितने लोग होंगे। पुलिस ने कहा है कि अगर अनशन में 1500 से 2000 लोग आएं तो अन्ना को जंतर मंतर पर एक दिन के अनशन की अनुमति दी जा सकती है। उसका कहना है कि अन्ना चाहें तो बुराड़ी तथा रोहिणी के जापानी पार्क अथवा उस जैसे किसी अन्य स्थान पर अनशन कर सकते हैं। वहीं जंतर-मंतर पर आमरण अनशन की इजाजत न मिलती देख अब अन्ना हजारे की कोशिश है उनके आंदोलन के दौरान रामलीला मैदान जैसी स्थिति न पैदा हो। लिहाजा वह अपने अनशन के लिए कानूनी विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। वह अदालत में याचिका दायर कर जंतर-मंतर पर अनशन की इजाजत मांगेंगे। हालांकि कोर्ट से राहत न मिलने पर भी वह अपना आंदोलन रोकेंगे नहीं, और तब वह 16 अगस्त को इसी जगह पर गिरफ्तारी देंगे। अन्ना ने लोकपाल विधेयक मामले पर 16 अगस्त से जंतर मंतर पर अनिश्चितकालीन अनशन शुरू करने का एलान किया है। इसकी अनुमति के लिए करीब 15 दिन पूर्व अन्ना पक्ष ने दिल्ली पुलिस को पत्र लिखकर अनुमति मांगी थी। दिल्ली पुलिस के आला अधिकारियों के अनुसार संसद सत्र 1 अगस्त से शुरू होकर 9 सितंबर तक चलेगा। इसके चलते कई संगठनों ने जंतर मंतर पर धरने प्रदर्शन की अनुमति मांगी है, इसलिए वहां जगह कम होगी, दूसरा सत्र के दौरान आसपास के कई क्षेत्रों में निषेधाज्ञा लगी रहती है। इस लिहाज से अधिकतम 2000 लोग ही अन्ना के साथ अनशन में शामिल हो सकते हैं। दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत के अनुसार, दस दिन पूर्व हमने पत्र लिखकर स्पष्ट कर दिया था कि एक दिन के अनशन की ही अनुमति जंतर मंतर पर दी जा सकती है, लेकिन अब तक हमें कोई जवाब नहीं मिला है। हमने बुराड़ी तथा जापानी पार्क जैसे स्थान भी उन्हें सुझाए हैं। दूसरी ओर टीम अन्ना ने भी आगे की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। इसी क्रम में अन्ना सबसे पहले अदालत में याचिका दायर कर अपने आंदोलन के अधिकार की रक्षा की अपील करेंगे। अगर कोर्ट ने इस मामले में दखल नहीं दिया तो फिर उनके पास सविनय अवज्ञा का विकल्प होगा। इसके तहत वह जंतर-मंतर पर गिरफ्तारी देंगे। अन्ना के करीबी बताते हैं कि गिरफ्तारी देने की स्थिति आने पर भी इस बात की कोशिश की जाएगी कि सीमित संख्या में ही लोग जंतर-मंतर पर जाएं।

चंदौलिया ने सारे आरोप राजा के सिर मढ़े

नई दिल्ली 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में घिरे पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा के निजी सचिव आरके चंदौलिया ने शुक्रवार को सारे आरोप राजा के सिर मढ़ दिए। चंदौलिया ने यह कहकर बचने की कोशिश की कि मैं तो राजा के आदेशों को पालन कर रहा था। उसने यह भी कहा कि इस मामले में टाटा और कॉरपोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया को भी आरोपी बनाया जाना चाहिए। विशेष सीबीआइ अदालत ने चंदौलिया की अंतरिम जमानत अर्जी खारिज कर दी। केस रिपोर्ट का जिक्र करते हुए चंदौलिया की ओर से कहा गया कि राजा के एक सहयोगी असीर वथम आचार्य ने कलैगनार टीवी को टाटा स्काई डीटीएच पर लाने के लिए राजा और राडिया के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। खुद को आरोप मुक्त किए जाने की मांग करते हुए चंदौलिया ने कहा कि वह बिना किसी उद्देश्य के अपने मास्टर (राजा) के आदेश का पालन कर रहा था। उसने यह भी दलील दी कि उसके खिलाफ कार्रवाई के लिए सही अनुमति ही नहीं ली गई थी। चंदौलिया के वकील ने कहा, जब डील के बारे में राडिया और आचार्य के बीच बातचीत हो रही थी तो आचार्य ने एक बार भी नहीं पूछा कि वह (राडिया) किस बारे में बातचीत कर रही है। जिससे जाहिर होता है कि कलैगनार टीवी और टाटा के बीच हुई डील के बारे में आचार्य को पता था। लिहाजा टाटा, राडिया, आचार्य और कलैगनार टीवी को भी आरोपी बनाया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट से गिरफ्तारी पर रोक लगते ही सामने आए बालकृष्ण

सीबीआइ और खुफिया विभाग के लिए चार दिन से रहस्य बने आचार्य बालकृष्ण शुक्रवार को हरिद्वार में पतंजलि योगपीठ में अचानक सामने आ गए। उन्होंने वहां योग गुरु रामदेव के साथ यज्ञ किया। इस बीच, नैनीताल हाईकोर्ट ने आचार्य की गिरफ्तारी पर 29 अगस्त तक रोक लगा दी। साथ ही तीन अगस्त को सीबीआइ के सामने पेश होने को कहा है, हालांकि हरिद्वार में शाम को जारी एक बयान में आचार्य ने चार अगस्त को पेश होने की बात कही। अदालत ने उन्हें अपना पासपोर्ट हाईकोर्ट में जमा करने के भी आदेश दिए हैं। सीबीआइ को जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया गया है। इधर, बालकृष्ण बगैर पासपोर्ट के बुलावे पर भी शुक्रवार को सीबीआइ के समक्ष पेश नहीं हुए, उन्होंने वकीलों की व्यस्तता का हवाला देकर फैक्स के जरिए दस दिन की मोहलत मांगी। सीबीआइ ने आचार्य को छह दिन का वक्त देते हुए चार अगस्त से पहले किसी भी दिन कार्यालय में हाजिर होने को कहा है। फर्जी दस्तावेजों के जरिए पासपोर्ट हासिल करने के आरोपों से घिरे आचार्य बालकृष्ण सीबीआइ के मुकदमा दर्ज करने के दो रोज बाद यानी मंगलवार से भूमिगत थे। सामने न आने के कारण खुफिया एजेंसियां उनके नेपाल चले जाने आशंका तक जाहिर करने लगी थीं। चार दिन से सीबीआइ और खुफिया तंत्र उनके संभावित ठिकानों पर नजर गड़ाए था, लेकिन आचार्य की लोकेशन नहीं मिल पाई। शुक्रवार शाम बालकृष्ण अचानक पतंजलि योगपीठ फेज वन की यज्ञशाला में योग गुरु रामदेव के साथ प्रकट हो गए। बाबा ने उस वक्त पत्रकारों को बातचीत करने के लिए वहां बुला रखा था। बाबा ने अपनी बात रखी, लेकिन बालकृष्ण मीडिया से दूरी बनाए रखी। पूरे समय वह यज्ञ करते दिखे। इस बीच, हाईकोर्ट ने सीबीआइ को झटका देते हुए आचार्य की गिरफ्तारी पर 29 अगस्त तक रोक लगा दी है। गुरुवार को बालकृष्ण के पैरोकार की ओर से याचिका दायर कर सीबीआइ की प्राथमिकी निरस्त करने व गिरफ्तारी पर रोक लगाने का आग्रह किया गया था। शुक्रवार को हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस तरुण अग्रवाल की एकल पीठ में याचिका पर सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता की तरफ से तर्क दिया गया कि उनके खिलाफ दर्ज मामले राजनीति से प्रेरित हैं और बाबा रामदेव का सहयोगी होने के कारण सीबीआइ उन्हें झूठे मुकदमे में गिरफ्तार करना चाह रही है। कोर्ट में सीबीआइ के अधिवक्ता द्वारा अपनी कार्रवाई को सही ठहराने के पक्ष में कई तर्क पेश किए गए। कोर्ट ने जानना चाहा कि राज्य सरकार एवं पुलिस से सहयोग मांगे बिना मामला किन कारणों से सीधे सीबीआइ के सुपुर्द किया गया।प्राथमिकी में लगाई गई धारा 120 बी के साथ ही आचार्य के पासपोर्ट की वैधता के मसले पर भी कोर्ट ने सीबीआई अधिवक्ता से सवाल किए। कोर्ट ने अगली सुनवाई तक आचार्य की गिरफ्तारी पर रोक लगा दी, जबकि सीबीआइ को जवाब दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया है। बालकृष्ण को सीबीआइ के समक्ष 3 अगस्त को पक्ष रखने और आचार्य को 5 अगस्त तक अपना पासपोर्ट हाईकोर्ट में जमा करने के निर्देश दिए हैं।

रामदेव की जमीन को केंद्र से नहीं मिली मंजूरी

, शिमला हिमाचल में पतंजलि योगपीठ स्थापित करने के लिए योग गुरु बाबा रामदेव द्वारा सोलन में खरीदी गई जमीन को अभी केंद्र से मंजूरी नहीं मिली है। रामदेव ने साधुपुल में हाल ही में 96 बीघा जमीन खरीद थी। हालांकि राज्य सरकार ने रामदेव को जमीन सौंप दी है, लेकिन हकीकत में अभी तक केंद्रीय वन मंत्रालय ने इसके लिए हरी झंडी नहीं दी है। ऐसे में बाबा रामदेव की आशाओं पर पानी फिर सकता है। पतंजलि योगपीठ स्थापित करने के लिए प्रदेश सरकार रामदेव पर मेहरबान हुई थी तो केंद्र सरकार ने इस पर रुचि नहीं दिखाई। साधुपुल स्थित 96 बीघा जमीन को अपने नाम करने के लिए रामदेव व पतंजलि योगपीठ को अभी इंतजार करना पड़ेगा। योग गुरु रामदेव ने पासपोर्ट मामले में आचार्य बालकृष्ण की गिरफ्तारी पर रोक लगाने के हाईकोर्ट के फैसले को बाबा रामदेव ने न्याय की जीत करार दिया। बाबा ने कहा कि उन्होंने या आचार्य ने कभी सीबीआइ के साथ असहयोग नहीं किया। साधुपुल में जो जमीन प्रदेश सरकार ने रामदेव को दी है वह पटियाला के महाराजा की थी। प्रदेश सरकार ने इस भूमि को अपने अधीन कर लिया था। पिछले साल सोलन में योग शिविर के दौरान प्रदेश सरकार ने रामदेव को यह जमीन दे दी थी। साधुपुल में रामदेव की जमीन को मंजूरी मिलने से पहले ही वहां पर काम शुरू कर दिया गया है। जानकारी के मुताबिक पतंजलि योगपीठ को स्थापित करने के लिए यहां पर काम जोरों पर चला हुआ है। केंद्र सरकार से हरी झंडी न मिलने के बावजूद यहां निर्माण हो रहा है। कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष ठाकुर कौल सिंह का कहना है कि रामदेव को दी गई जमीन की जांच होनी चाहिए।

कालेधन के मुद्दे पर पीएम दे सकते हैं संसद में बयान

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भारतीयों द्वारा विदेशी बैंकों में रखे गए काले धन को वापस लाने के लिए सरकार की ओर से उठाए गए कदमों पर अगले सप्ताह संसद में बयान दे सकते हैं। विपक्षी दलों ने सोमवार से शुरू हो रहे संसद सत्र में कालाधन का मुद्दा उठाने की योजना बनाई है, ऐसे में प्रधानमंत्री की ओर से बयान दिए जाने की संभावना बनी है। आधिकारिक सूत्रों ने यहां कहा कि प्रधानमंत्री काले धन के मुद्दे पर संसद में बयान दे सकते हैं। अप्रैल में सरकार ने विदेशी बैंकों में रखे गए काले धन की जांच के लिए राजस्व सचिव की अगुवाई में एक उच्च स्तरीय समिति बनाई थी। जुलाई के प्रारंभ में सुप्रीम कोर्ट ने इस जांच पैनल को शीर्ष अदालत के पूर्व न्यायाधीश बीपी जीवन रेड्डी और न्यायमूर्ति एमबी शाह की अगुवाई में विशेष जांच दल (एसआइटी) में तब्दील कर दिया था।

विदेशी से चंदा लेने वाले एनजीओ पर होगी सख्ती

, नई दिल्ली केंद्र सरकार ने यह मान लिया है कि देश में काले धन पर रोक लगाने के लिए विदेश से चंदा प्राप्त करने वाले एनजीओ और ट्रस्टों पर अंकुश लगाना जरूरी है। शायद यही वजह है कि उसे बार-बार विदेशी अनुदान अधिनियम व नियमों में संशोधन करके गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) के आय के स्रोत को लेकर कड़ाई बरतनी पड़ रही है। एनजीओ एवं ट्रस्टों के कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए इस वर्ष की शुरुआत में ही विदेशी अनुदान नियमन कानून के नियम बनाए गए थे। सरकार इनमें एक बार फिर संशोधन करने की तैयारी कर रही है। इस बार विदेशी अनुदान नियमों में संशोधन के लिए भारतीय चार्टर्ड लेखाकार संस्थान (आइसीएआइ) की सिफारिशों को आधार बनाया जाएगा। दरअसल, केंद्र सरकार ने आइसीएआइ से कहा है कि वह काले धन पर लगाम लगाने के लिए उपयुक्त सुझाव दे। आइसीएआइ के अध्यक्ष जी रामास्वामी ने बताया कि काले धन पर लगाम लगाने के लिए सबसे अहम है कि विदेश से जो धन देश में आ रहा है उसकी निगरानी की पुख्ता व्यवस्था हो। इसके लिए हम एनजीओ और ट्रस्टों की आय एवं उन्हें प्राप्त होने वाली आय के बारे में और पारदर्शिता लाने का प्रावधान करने जा रहे हैं। अगले कुछ दिनों के भीतर इस बारे में विस्तृत सुझाव केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (सीबीडीटी) को सौंप दिए जाएंगे। सनद रहे कि केंद्र सरकार ने वर्ष 2010 में विदेशी अनुदान नियमन कानून पारित किया था। इसके नियम मई, 2011 में जारी किए गए। इससे विदेशी धन प्राप्त करने वाले एनजीओ और ट्रस्टों के कामकाज को काफी हद तक पारदर्शी बना दिया गया है। मगर सरकार को लग रहा है कि अभी और कड़ाई बरतने की जरूरत है। लिहाजा इस बार सुझाव देने की जिम्मेदारी आइसीएआइ को सौंपी गई है। रामास्वामी ने बताया कि पिछले पांच वर्षो में देश के विभिन्न एनजीओ, ट्रस्टों आदि को 42 हजार करोड़ रुपये का विदेशी अनुदान मिला है। वैसे आइसीएआइ आयकर कानून, विदेशी मुद्रा प्रबंधन कानून, विदेशों के साथ कराधान समझौते आदि में भी संशोधन का सुझाव देगा। विदेशी अनुदान नियमन नियम, 2011 में यह प्रावधान किया गया है कि जो भी विदेशी राशि एनजीओ या ट्रस्ट प्राप्त करेंगे उसके बारे में सभी जानकारी सरकार को मुहैया कराएंगे। लेकिन सरकार का मानना है कि अगर विदेशी स्रोत से गैर-कानूनी तरीके से अर्जित आय को भारतीय एनजीओ या ट्रस्ट को दिया जाता है, तो यहां भी भारतीय एजेंसी का दायित्व तय किया जाना चाहिए, ताकि विदेशों से धन प्राप्त करते समय ये एजेंसियां तमाम सावधानी बरतें।

बेल्लारी में खनन पर सुप्रीम कोर्ट की

, नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के बेल्लारी जिले में लौह अयस्क के खनन पर अगले आदेश तक पूरी तरह रोक लगा दी है। अवैध और अनियंत्रित खनन से पर्यावरण को हो रहे नुकसान को देखते हुए कोर्ट ने यह अंतरिम आदेश दिया है। इसके साथ ही कोर्ट ने देश में स्टील उद्योग के लिए लौह अयस्क की जरूरत पर केंद्र से एक सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है। मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाडि़या, न्यायमूर्ति आफताब आलम व न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार की पीठ ने कर्नाटक के वन क्षेत्र में चल रहे अवैध खनन के मामले में सुनवाई के दौरान ये आदेश जारी किए। कोर्ट ने बेल्लारी जिले में 10,868 हेक्टेयर में चल रहा खनन अगले आदेश तक निलंबित रखने का निर्देश दिया है। पीठ ने कहा है कि इस बीच केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय एक सप्ताह में रिपोर्ट दाखिल कर बताए कि देश में स्टील इंडस्ट्री के लिए कुल कितने लौह अयस्क की जरूरत होती है। कितना लौह अयस्क घरेलू जरूरत को पूरा करने के लिए चाहिए होता है और कितना निर्यात किया जाता है। देश में कुल लौह अयस्क की जरूरत भी बताने को सरकार से कहा गया है। वन एवं पर्यावरण मंत्रालय, यह जानकारी इस्पात, खनन व वाणिज्य मंत्रालय से एकत्र करेगा। पीठ ने पर्यावरण मंत्रालय को इस बाबत तत्काल संबंधित मंत्रालय के सचिवों के साथ बैठक कर एक सप्ताह में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया है। इतना ही नहीं कोर्ट ने वन मामलों की केंद्रीय अधिकारिता समिति (सीईसी) को कर्नाटक के दो जिलों तुमकूर और चित्रदुर्ग के बारे में पर्यावरण प्रभाव आकलन कर तीन सप्ताह में रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने साफ कर दिया है कि पर्यावरण की कीमत पर खनन की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने राज्य सरकार से भी कहा है कि वह खनन से पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई की योजना बताये। राज्य सरकार को कुल खनन और उससे पहंुचे नुकसान का हिसाब रखना होगा और पक्षकारों को नुकसान की भरपाई करनी होगी, तभी आगे खनन की अनुमति दी जा सकती है। जब खनन कंपनियों और अन्य पक्षकारों ने खनन पर पूरी तरह रोक लगाने का विरोध किया और कोर्ट को वर्ष 2006 के आदेश की याद दिलाई जिसमें सशर्त खनन जारी रखने की अनुमति दी गई थी, तो पीठ ने कहा कि पुराने आदेशों का हवाला मत दो। पीठ ने कहा कि कोर्ट कई बार संतुलन बनाने की कोशिश कर चुका है, लेकिन इसका उल्लंघन होता रहा। इसलिए मजबूर होकर ही उन्हें हरियाणा के बारे में भी आदेश देने पड़े थे। पीठ ने कहा कि वे पहले यह देखेंगे कि बेल्लारी में और खनन की क्षमता बची भी है कि नहीं। उधर सीईसी ने बेल्लारी में खनन संबंधी नियमों के उल्लंघन का आरोप लगाया और कहा कि पूरा तंत्र ही फेल है।


कानून पांच साल पहले रद पर जारी रही शुल्क वसूली

सरकार के गलियारों में कितनी अंधेर है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि खुद संसद ने जिस कानून को रद कर दिया था, उसी के आधार पर पांच साल तक शुल्क वसूली जारी रही। दिलचस्प यह है कि शुल्क देने वाले भी इससे अनजान बने रहे कि नए कानून के आधार पर उनसे इसकी वसूली नहीं की जा सकती है। यह मामला बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में पैदा होने वाले लाख का है। लाख एक रेजिन है, जो यहां पाए जाने वाले कुछ चुनिंदा पेड़ों से निकलता है। लाख जैसी वन उपजों के निर्यात पर सेस लगाने वाला वनोपज उपकर कानून 1966 संसद ने वर्ष 2006 में ही निरस्त कर दिया था। लेकिन इस सेस यानी उपकर की वसूली बंद करने में सरकार को पांच साल लग गए। लाख निर्यातकों और उनके संगठन शेलैक एंड फॉरेस्ट प्रॉडक्ट्स एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (शेफैक्सिल) को भी पता नहीं था कि यह कानून समाप्त हो चुका है। अब उन्हें यह सेस चुकाने की जरूरत नहीं है। केंद्रीय उत्पाद एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीईसी) ने पांच साल बाद 26 जुलाई, 2011 को सीमा शुल्क अधिकारियों को इस संबंध में निर्देश जारी किया। इसमें उनसे लाख पर लगे उपकर की वसूली रोकने को कहा गया है। वर्ष 2010-11 में 211 करोड़ रुपये के लाख उत्पादों का निर्यात किया गया था। चूडि़यों में इसका उपयोग तो जगजाहिर है, लेकिन खाद्य पदार्थो में चमक लाने और वुड फिनिश जैसे कामों में भी इसका इस्तेमाल होता है। शेफैक्सिल की कार्यकारी निदेशक देबजानी रॉय ने निर्यातकों को वर्ष 2009 में बंदरगाहों पर नई सॉफ्टवेयर प्रणाली लगने के बाद इस उपकर का पता चला। इसकी वजह यह है कि प्रति क्विंटल लाख उत्पाद के निर्यात पर महज 2 रुपये 30 पैसे का सेस वसूला जाता था। इसीलिए उन्हें इसका पता ही नहीं चला। वैसे सितंबर, 2006 से इस सेस के जरिये कुल वसूली भी महज 5 लाख रुपये की रही है।

Thursday, July 28, 2011

स्विस बैंकों में भारतीयों से ज्यादा पाकिस्तानियों का धन

भारत में दावा किया जा रहा है कि स्विस बैंकों में भारतीयों की अरबों-खरबों की काली कमाई जमा है। मगर इन बैंकों के अधिकारियों की मानें तो उनके यहां जमा विदेशी नागरिकों के कुल धन में भारतीयों की हिस्सेदारी एक फीसदी से भी बेहद कम (0.07 प्रतिशत) है। यह रकम पाकिस्तानियों की इन बैंकों में जमा काली कमाई से कम है। यहां के केंद्रीय बैंक स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2010 के अंत में स्विस बैंकों में भारतीय नागरिकों व कंपनियों की कुल जमा राशि 2.5 अरब डॉलर (1.945 अरब स्विस फ्रैंक) थी। रुपये में यह रकम 11,000 करोड़ रुपये से अधिक बैठती है। इसके मुकाबले पाकिस्तानियों ने इन बैंकों में 1.947 अरब स्विस फ्रैंक जमा कर रखे हैं। यह राशि भारतीयों से 20 लाख स्विस फ्रैंक (करीब 11 करोड़ रुपये) ज्यादा है। स्विटजरलैंड के बैंकों के शीर्ष संगठन स्विस बैंकर्स एसोसिएशन (एसबीए) के प्रवक्ता ने कहा कि स्विस बैंकों में जमा कुल विदेशी धन वर्ष 2010 के अंत में 3,500 अरब डॉलर था। हालांकि, भारतीयों द्वारा स्विस बैंकों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से रखी गई वास्तविक रकम इससे कहीं अधिक हो सकती है। कुछ निजी बैंकों ने यह आंकड़ा 15 से 20 अरब डॉलर होने का अनुमान जताया है। भारत में लगाए गए अनुमानों के मुताबिक, यह राशि 1,500 अरब डॉलर से अधिक है। बहरहाल, एसएनबी के आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, जापान और हांगकांग जैसे देशों की तुलना में स्विस बैंकों में भारतीयों का धन काफी कम है। वास्तव में भारतीय आंकड़ा रूस, ब्राजील, चीन, इस्राइल, सऊदी अरब, इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण कोरिया व थाइलैंड जैसे कई विकासशील देशों से भी कम है। बहरहाल, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती जांच पड़ताल के चलते बीते कुछ साल से स्विस बैंकों में जमा काली कमाई की रकम घटी है।

येद्दयुरप्पा ने अपनी किस्मत का फैसला गडकरी पर छोड़ा

नई दिल्ली भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी से साफ कर दिया है कि कर्नाटक में लोकायुक्त की रिपोर्ट आने के बाद ही मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा के बारे में पार्टी फैसला लेगी। विदेश यात्रा से लौटने के बाद येद्दयुरप्पा खुद तो दिल्ली नहीं आए, लेकिन उन्होंने गडकरी को एक पत्र लिखा है जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ आरोपों की जांच पार्टी की समिति से कराए जाने की मांग की है। बेंगलूर पहुंचे येद्दयुरप्पा ने कहा है कि वे इस्तीफा तो नहीं देंगे लेकिन उन्होंने अपने राजनीतिक भविष्य का फैसला पार्टी अध्यक्ष पर छोड़ दिया है। विदेश यात्रा से लौटते ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा ने लोकायुक्त रिपोर्ट आने से पहले ही अपनी मजबूत मोर्चाबंदी कर ली है। उन्होंने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी से बात कर उन्हें अपनी सफाई दी और कहा कि उनके बारे में पार्टी जो भी निर्णय करेगी, वे उसे स्वीकार करेंगे। येद्दयुरप्पा ने अपने खिलाफ लग रहे आरोपों की जांच के लिए पार्टी की एक समिति से जांच कराए जाने की मांग भी की है। गडकरी को लिखे पत्र में उन्होंने इसकी अगुवाई पार्टी में अपने धुर विरोधी माने जाने वाले राष्ट्रीय महासचिव अनंत कुमार से कराने की मांग की है। इस समिति में प्रभारी महासचिव धर्मेद्र प्रधान व पूर्व अध्यक्ष वेंकैया नायडू को रखने का आग्रह किया है। येद्दयुरप्पा को हटाए जाने के सवालों के बीच गडकरी ने स्पष्ट किया कि वे धारणा के आधार पर फैसला नहीं लेते हैं। जब लोकायुक्त की रिपोर्ट आ जाएगी, पार्टी उचित फैसला लेगी। अभी जो खबरे आ रही हैं उनमें विरोधाभास है। वे पहले ही स्पष्ट कर चुके है कि जब भी किसी संवैधानिक संस्था से कोई रिपोर्ट मुख्यमंत्री या सरकार के खिलाफ आएगी, पार्टी कार्रवाई करेगी। इस मामले में पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शांता कुमार के येद्दयुरप्पा को पद से हटाने के बयान को भी पार्टी ने गंभीरता से लिया है। गडकरी ने कहा है कि पार्टी के किसी भी नेता को मीडिया में इस तरह की बातें नहीं करनी चाहिए। शांता कुमार ने जो कहा वह कतई उचित नहीं है। पार्टी सूत्रों के अनुसार गडकरी ने शांता कुमार से भी बात कर इस मामले में गहरी नाराजगी जताई है।

कैग की निगरानी में फलेगी-फूलेगी मनरेगा

जयपुर केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) समेत ग्रामीण विकास योजनाओं में राज्य सरकारों को दिए जाने वाले धन के उपयोग पर निगरानी को असरदार बनाएगा। मंत्रालय इन योजनाओं पर नियंत्रक महालेखापरीक्षक (कैग) की निगरानी व्यवस्था लागू करने पर विचार कर रहा है। राजस्थान यात्रा पर आए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने बताया कि रक्षा मंत्रालय के बाद ग्रामीण विकास मंत्रालय का सबसे ज्यादा बजट है। पिछले वित्तीय वर्ष में मंत्रालय ने नौ विभिन्न योजनाओं के माध्यम से 90 हजार करोड़ रुपए राज्य सरकारों को बांटे है जिसमें राजस्थान को छह हजार करोड़ रुपए आवंटित किए गए। उन्होंने बताया कि मंत्रालय की भूमिका अब तक वित्त मंत्रालय से मिली राशि को राज्य सरकारों को बांटने की रही है। अब मंत्रालय बांटी गई इस राशि का उपयोग सही हुआ हैं या नहीं, इस पर भी विशेष ध्यान देगा। उन्होंने बताया कि सीएजी से नियमित जांच की व्यवस्था लागू करने के लिए बातचीत चल रही है। वहीं नई दिल्ली में एक कार्यक्रम के दौरान छत्तीसगढ़ के माओवादी प्रभावित इलाकों में हालात अत्यंत गंभीर करार देते हुए ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने कहा है कि उनका मंत्रालय प्रभावित लोगों और प्रशासन के बीच विश्वास की कमी दूर करने की रणनीति पर काम करेगा। रमेश ने नक्सलियों से प्रभावित 60 जिलों पर ध्यान केंद्रित करने का वादा करते हुए कहा कि केंद्र सरकार योजनाओं में प्रशासनिक खर्च छह फीसदी से बढ़ाने की जिलाधिकारियों की मांग पर जल्द फैसला लेगी। नक्सल प्रभावित जिलों के कलेक्टरों ने प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत सीमेंट कंकरीट रोड सभी जगहों पर बनाने की मंजूरी मांगी है। नक्सलियों के आतंक से पीडि़तों को भी इंदिरा आवास योजना का पात्र बनाने का सुझाव दिया है। साथ ही बैंकिंग, पोस्ट ऑफिस, अस्पताल और अन्य जरूरी सुविधाओं की बेहतरी पर जोर दिया

पीएम-चिदंबरम पर भी 2जी घोटाले के छींटे

नई दिल्ली 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के मुख्य आरोपी पूर्व दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने अपने बचाव में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी. चिदंबरम को भी इस कीचड़ में लपेट लिया है। राजा ने पटियाला कोर्ट में साफ कह दिया कि 2जी आवंटन की पूरी प्रक्रिया न सिर्फ प्रधानमंत्री की जानकारी में थी, बल्कि तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने उसको जायज भी करार दिया था। राजा के वकील ने अदालत से इस बात की तस्दीक प्रधानमंत्री से कराने की चुनौती भी दे डाली। 2जी घोटाले में अदालत के सामने सीधे प्रधानमंत्री और चिदंबरम की तरफ उठी उंगली के बाद भाजपा ने दोनों नेताओं का इस्तीफा मांग लिया। इस असहज स्थिति से बचने के लिए सरकार ने कानूनी तर्को की ढाल बनाई और इस पूरे घटनाक्रम के लिए राजा को जिम्मेदार ठहराया। साथ ही कहा कि अभियुक्त की जिरह को सुबूत नहीं माना जा सकता। पटियाला हाउस के विशेष कोर्ट में बहस के दौरान राजा ने कहा कि 2जी स्पेक्ट्रम का आवंटन पूरी तरह नियम-कानून का पालन करते हुए किया था, जिस पर तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम ने मंजूरी भी दी थी। वित्त मंत्री ने इस मामले की जानकारी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी दी थी। राजा के वकील सुशील कुमार ने कहा कि इस मामले में लाइसेंसधारक कंपनियों के अपने शेयर बेचने के मामले पर प्रधानमंत्री और तत्कालीन वित्त मंत्री (अब गृह मंत्री) के बीच चर्चा हुई थी। तब चिदंबरम ने प्रधानमंत्री के सामने कहा था कि कंपनी कानून के मुताबिक हिस्सेदारी को कम करने का मतलब 2जी लाइसेंस की बिक्री नहीं है। सुशील कुमार ने लगभग चुनौती दी कि प्रधानमंत्री इस बात से इनकार कर सकते हैं तो करें! राजा की तरफ से अदालत में दिए गए इन तर्को के बाद जहां विपक्ष को ऐन संसद सत्र से पहले फिर मुद्दा मिला वहीं कांग्रेस और सरकार के लिए एक बार फिर असहज स्थिति उत्पन्न हो गई। भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने मौका न गंवाते हुए तत्काल प्रधानमंत्री और चिदंबरम से इस्तीफे की मांग कर दी। पूर्व दूरसंचार मंत्री अरुण शौरी ने भी कहा कि इस पूरे प्रकरण से प्रधानमंत्री और चिदंबरम जवाबदेही से नहीं बच सकते। उन्होंने कहा कि राजा ने मनमोहन और चिदंबरम को कई पत्र लिखे और सब कुछ उनकी जानकारी में था। चिदंबरम ने सफाई दी कि उन्होंने बतौर वित्त मंत्री और प्रधानमंत्री ने सिर्फ यह देखा कि स्वान व यूनीटेक अपनी हिस्सेदारी बेच रही हैं या फिर नए शेयर जारी करके अपनी हिस्सेदारी कम कर रही हैं। चिंदबरम ने यह भी कहा कि टेलीकॉम मंत्रालय तो हमेशा यही चाह रहा था कि प्रवेश शुल्क वर्ष 2001 के स्तर पर ही बना रहे, लेकिन वित्त मंत्रालय का यह दबाव था कि निविदा के जरिये नई कीमत तय की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह सच्चाई है कि उक्त दोनों कंपनियों ने विदेशी कंपनियों को स्पेक्ट्रम नहीं बेचे, बल्कि नए शेयर जारी कर विदेशी निवेश आकर्षित किया। शीर्ष नेतृत्व के बचाव में दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल और कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी उतरे। सिब्बल ने कहा कि अदालत में राजा की दलीलें सुबूत नहीं हैं और उनके आधार पर भाजपा जैसी पार्टी का इस्तीफा मांगना दुर्भाग्यपूर्ण है। वे कम से कम किसी वकील या अपने नेता अरुण जेटली से ही इस बारे में पूछ लेते। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने भी यही दलील देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता और साख का लोहा पूरी दुनिया मानती है। एक अभियुक्त के बचाव को जरूरत से ज्यादा तवज्जो दिया जाना लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा। वह यहां तक कह गए कि प्रधानमंत्री पर लांछन लगाना एक तरह से सूरज पर थूकने जैसा है।

येद्दयुरप्पा के परिजनों ने ली 30 करोड़ की रिश्वत

कर्नाटक सरकार का काला चिट्ठा खोलते हुए लोकायुक्त एन संतोष हेगड़े ने बुधवार को अवैध खनन मामले में बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट पेश की। मीडिया में लीक हुई खबरों पर मुहर लगाते हुए हेगड़े ने बताया कि कैसे मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा के परिवार के प्रेरणा ट्रस्ट ने खनन कंपनियों से 30 करोड़ की रिश्वत ली। एक खनन कंपनी ने ट्रस्ट को उधार लेकर दस करोड़ का दान दिया। ट्रस्ट ने खनन कंपनी को एक एकड़ जमीन करीब 20 करोड़ में बेची जबकि उसकी अनुमानित कीमत 1.4 करोड़ थी। हेगड़े ने सीएम के खिलाफ कार्रवाई के लिए राज्यपाल से सिफारिश की है। करीब 26,000 पन्नों की रिपोर्ट के मुताबिक अवैध खनन की काली कमाई में येद्दयुरप्पा के अलावा राज्य सरकार के चार मंत्रियों व 600 के करीब अधिकारियों की संलिप्तता थी। 2006-2010 के बीच 16,085 करोड़ के घोटाले का दावा कर रही यह रिपोर्ट दर्शाती है कि मंत्रियों, अफसरों और खनन उद्यमियों के मजबूत नेटवर्क ने किस कदर खजाने को लूटा। हेगड़े ने संवाददाता सम्मेलन में कहा, खनन मामले में मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा, पूर्व मुख्यमंत्री व जेडीएस नेता एच डी कुमारस्वामी, रेड्डी बंधु (राज्य सरकार में मंत्री और खनन उद्यमी), उनके कुछ सहयोगियों , मंत्री एच श्रीरामूलू, कांग्रेस सांसद अनिल लाड की पत्नी के नाम हैं। इनके खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक व अन्य कानूनों के तहत अभियोजन की सिफारिश की गई है। रिपोर्ट में मई 2008 से सत्तारूढ़ भाजपा सरकार को खनन कार्य में अनियमितताओं और गैरकानूनी गतिविधियों को रोक नहीं पाने के लिए जिम्मेदार ठहराया गया है। हेगड़े की मुख्य रिपोर्ट 943 पन्नों की है। कुमारस्वामी के संदर्भ में जांच में उनकी ओर से खनन के दो पट्टे देने में कदाचार की बात सामने आई है। हेगड़े ने कहा कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत अपराध होने के नतीजे पर पहुंचने के साथ ही उन्होंने राज्यपाल से मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा के खिलाफ आगे कदम उठाने की सिफारिश की है क्योंकि मुख्यमंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए समक्ष प्राधिकार प्रदेश के राज्यपाल हैं। अनुलग्नकों के साथ रिपोर्ट की एक प्रति आगे की कार्रवाई के लिए राज्यपाल को भेजी गई है। रेड्डी बंधु के बारे में हेगड़े ने कहा कि कर्नाटक में खनन नहीं करने का उनका दावा झूठा है। इस आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज हैं। लोकायुक्त ने अनेक अनियमितताओं के मद्देनजर सरकार से खनन कंपनियों का लाइसेंस निरस्त करने और नुकसान को चोरी हुआ लौह अयस्क मानते हुए संबंधित लोगों से बाजार मूल्य पर इसका धन वसूलने की सिफारिश की।


Tuesday, July 26, 2011

रामदेव के साथी बालकृष्ण को गिरफ्तार करने की तैयारी

देहरादून सीबीआइ ने योग गुरु बाबा रामदेव के करीबी आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ फर्जी दस्तावेजों से पासपोर्ट लेने के आरोप में रविवार को दो मामले दर्ज किए। जांच एजेंसी ने बालकृष्ण को फर्जी डिग्री पेश करने के मामले में धोखाधड़ी (420) आपराधिक साजिश (120-बी) और भारतीय पासपोर्ट अधिनियम की धारा 12 के तहत आरोपी बनाया है। सीबीआइ का यह कदम आचार्य की गिरफ्तारी के होमवर्क के रूप में देखा जा रहा है। इन दो मुकदमों के बाद माना जा रहा है कि सीबीआइ उन्हें जल्द ही गिरफ्तार कर सकती है। चार जून को दिल्ली के रामलीला मैदान की घटना के बाद से आचार्य बालकृष्ण के भारतीय नागरिक होने और उनके पासपोर्ट हासिल करने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, सीबीआइ ने इस मामले में गहन पड़ताल की। वाराणसी के संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा बालकृष्ण की डिग्री को गलत बताए जाने के बाद उनके खिलाफ मामला दर्ज करने का फैसला किया। विवि के रजिस्ट्रार रजनीश शुक्ला का कहना था कि बालकृष्ण ने अपनी डिग्री का जो नंबर बताया है वह विवि के अभिलेखों से नहीं मिलता। उन्होंने 1991 में पूर्व मध्यमा (हाईस्कूल) और 1996 में शास्त्री की डिग्री पेश की है, जो विवि के रिकार्ड से मेल नहीं खाती। हरिद्वार नगर पालिका कार्यालय से उनके जन्म प्रमाण पत्र संबंधी मूल दस्तावेज गायब होने का मामला पहले ही खुल चुका है। सीबीआइ के एसपी नीलाभ किशोर ने बताया, बरेली के पासपोर्ट दफ्तर से मिले दस्तावेजों की जांच के बाद आचार्य के खिलाफ पासपोर्ट अधिनियम 12 के साथ ही धारा 420, 467, 468, 120 बी के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।

धोखाधड़ी जांच कार्यालय को मिलेंगे और अधिकार

काले धन के मसले पर चौतरफा आलोचनाएं झेल रही केंद्र सरकार गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (एसएफआइओ) को और अधिकारों से लैस करने की तैयारी कर रही है। कंपनी मामलों का मंत्रालय अपनी इस जांच इकाई को और अधिक कानूनी और प्रशासनिक अधिकार देने पर विचार कर रहा है। इससे कंपनियों द्वारा विदेशों में जमा धन का पता लगाने में आसानी होगी। कंपनी मामलों के मंत्री वीरप्पा मोइली ने कहा कि इस इकाई को स्थिरता देने के लिए एक स्थायी कैडर पर भी विचार चल रहा है। इससे इस तरह की एजेंसी में अधिकारियों को प्रतिनियुक्ति पर लेने से बचा जा सकेगा। इससे निरंतरता बनी रहेगी और लचीलापन भी रहेगा। उन्होंने कहा कि यदि धन को इधर-उधर किया जाता है, तो यह कंपनी अधिनियम का उल्लंघन होगा। पर जब यह धन विदेश भेज दिया जाता है, तो यह हवाला का मामला बन जाता है, तब यह प्रवर्तन निदेशालय के दायरे में आ जाता है। मोइली ने कहा कि यदि किसी तरह की कोई खामी होगी, तो तंत्र को और मजबूत किया जाएगा ताकि दोषी हमारे हाथों से बच न पाएं। इस कार्यालय को जो भी कानूनी या अन्य अधिकार दिए जाने की जरूरत होगी, दिए जाएंगे। गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय को अधिक अधिकार दिए जाने का प्रस्ताव बहुत हद तक वी वेपा कामेशम समिति की सिफारिशों के आधार पर है। हालांकि समिति ने एसएफआइओ को विदेशों में जमा धन की जांच के लिए अधिकार दिए जाने की सिफारिश नहीं की है। आठ सदस्यीय समिति का सुझाव है कि एसएफआइओ को वित्तीय घोटाले में शामिल इकाइयों की जांच और मामला चलाने का विशिष्ट अधिकार होना चाहिए। साथ ही समिति ने एसएफआइओ को आयकर विभाग, सीमा शुल्क विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की तरह छापेमारी, जब्ती का अधिकार दिए जाने की भी सिफारिश की है। इसने यह भी सुझाव दिया है कि एसएफआइओ को स्रोत आधारित सूचना के आधार पर खुद संज्ञान लेते हुए जांच का अधिकार भी मिलना चाहिए। मोइली ने कहा कि इस समय वित्त मंत्रालय दोहरे कराधान बचाव संधि को देख रहा है। जब यहां कोई घोटाला होता है, तो घोटाले में शामिल कंपनी या व्यक्ति ने देश के बाहर भी काफी धन जमा कराया होता है। कॉरपोरेट धोखाधड़ी की जांच करने वाली एसएफआइओ काफी समय से विदेशों में भी जांच का अधिकार चाह रही है। अधिकारों की कमी की वजह से ही हजारों करोड़ रुपये के सत्यम कंप्यूटर घोटाले में जांच प्रभावित हुई है।

खनन घोटाले पर राष्ट्रपति को भेजेंगे रिपोर्ट

अवैध खनन मामले में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा और राज्य के अन्य मंत्रियों को दोषी ठहराने वाली रिपोर्ट अभी आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक भी नहीं हुई है मगर कर्नाटक के राज्यपाल एचआर भारद्वाज ने इस मामले को राष्ट्रपति के दरवाजे तक ले जाने की घोषणा कर राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। उन्होंने रविवार को कहा कि लोकायुक्त एन संतोष हेगड़े की रिपोर्ट पेश हो जाने के बाद वह उस पर अपना आकलन राष्ट्रपति को भेजेंगे। भारद्वाज के रुख से साफ हो गया है कि इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार और परोक्ष तौर पर भाजपा-कांग्रेस के बीच सियासी तलवारें खिंचना तय है। यह पूछने पर कि क्या कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए क्या खनन घोटाला उचित मामला है? इस पर उन्होंने कहा, मेरे पास सत्तापक्ष या विपक्ष किसी की ओर ऐसा आग्रह नहीं आया है कि राष्ट्रपति शासन या किसी अन्य चीज की जरूरत है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट अभी सरकार को सौंपी जानी है, लेकिन पिछले हफ्ते यह लीक हो गई। राज्यपाल ने एक बार फिर कहा कि सरकार के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उनके पास संवैधानिक शक्तियां हैं। मीडिया के माध्यम से यह बात सार्वजनिक हो गई कि इसमें मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा और चार मंत्रियों को दोषी बताते हुए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की सिफारिश की गई है। इस घोटाले के कारण मार्च 2009 के बाद के चौदह महीनों में प्रदेश सरकार के राजस्व को 1800 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। भारद्वाज ने कहा, चीजों (खनन रिपोर्ट) को रिकार्ड में आ जाने दें, तभी मैं अपनी राय राष्ट्रपति से व्यक्त कर सकूंगा। यह राय प्रेस को लीक नहीं हो सकती। लोकायुक्त के टेलीफोन टैपिंग के मामले में उन्होंने कहा कि यह मामला हेगड़े और जिनके खिलाफ यह शिकायत की है उनके बीच का है। राज्यपाल ने कहा, जिन लोगों ने हेगड़े को प्रभावित करने या उनका टेलीफोन टैप करने की कोशिश की वे बहुत जिम्मेदार लोग हैं। हमारे या आपके जैसे लोग टेलीफोन टैप नहीं कर सकते। इसलिए इस मामले में मेरी कोई भूमिका नहीं है।

खनन घोटाले पर राष्ट्रपति को भेजेंगे रिपोर्ट

अवैध खनन मामले में कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा और राज्य के अन्य मंत्रियों को दोषी ठहराने वाली रिपोर्ट अभी आधिकारिक तौर पर सार्वजनिक भी नहीं हुई है मगर कर्नाटक के राज्यपाल एचआर भारद्वाज ने इस मामले को राष्ट्रपति के दरवाजे तक ले जाने की घोषणा कर राजनीतिक माहौल गरमा दिया है। उन्होंने रविवार को कहा कि लोकायुक्त एन संतोष हेगड़े की रिपोर्ट पेश हो जाने के बाद वह उस पर अपना आकलन राष्ट्रपति को भेजेंगे। भारद्वाज के रुख से साफ हो गया है कि इस मामले में केंद्र और राज्य सरकार और परोक्ष तौर पर भाजपा-कांग्रेस के बीच सियासी तलवारें खिंचना तय है। यह पूछने पर कि क्या कर्नाटक में राष्ट्रपति शासन लगाने के लिए क्या खनन घोटाला उचित मामला है? इस पर उन्होंने कहा, मेरे पास सत्तापक्ष या विपक्ष किसी की ओर ऐसा आग्रह नहीं आया है कि राष्ट्रपति शासन या किसी अन्य चीज की जरूरत है। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट अभी सरकार को सौंपी जानी है, लेकिन पिछले हफ्ते यह लीक हो गई। राज्यपाल ने एक बार फिर कहा कि सरकार के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए उनके पास संवैधानिक शक्तियां हैं। मीडिया के माध्यम से यह बात सार्वजनिक हो गई कि इसमें मुख्यमंत्री येद्दयुरप्पा और चार मंत्रियों को दोषी बताते हुए उनके खिलाफ मुकदमा चलाने की सिफारिश की गई है। इस घोटाले के कारण मार्च 2009 के बाद के चौदह महीनों में प्रदेश सरकार के राजस्व को 1800 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। भारद्वाज ने कहा, चीजों (खनन रिपोर्ट) को रिकार्ड में आ जाने दें, तभी मैं अपनी राय राष्ट्रपति से व्यक्त कर सकूंगा। यह राय प्रेस को लीक नहीं हो सकती। लोकायुक्त के टेलीफोन टैपिंग के मामले में उन्होंने कहा कि यह मामला हेगड़े और जिनके खिलाफ यह शिकायत की है उनके बीच का है। राज्यपाल ने कहा, जिन लोगों ने हेगड़े को प्रभावित करने या उनका टेलीफोन टैप करने की कोशिश की वे बहुत जिम्मेदार लोग हैं। हमारे या आपके जैसे लोग टेलीफोन टैप नहीं कर सकते। इसलिए इस मामले में मेरी कोई भूमिका नहीं है।

अवैध खनन में येद्दयुरप्पा की आपराधिक संलिप्तता

कर्नाटक के लोकायुक्त एन संतोष हेगड़े ने कहा है कि अवैध खनन मामले में उनकी रिपोर्ट खनन विभाग को संभालने वाले मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा की आपराधिक संलिप्तता का संकेत देती है। हेगड़े ने कहा, रिपोर्ट में अन्य लोगों के खिलाफ भी पर्याप्त सबूत हैं क्योंकि इस घोटाले से राज्य को 1800 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। मुख्यमंत्री पर भी आपराधिक मामला बनता है क्योंकि वह खनन विभाग का प्रमुख होने के साथ ही वह इस विभाग में होने वाली सभी गतिविधियों के लिए जिम्मेदार हैं। वहीं कर्नाटक के लोकायुक्त एन संतोष हेगड़े के करीबी सूत्रों ने कहा कि लोकायुक्त के बुधवार तक बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट सौंपने की संभावना है। लोकायुक्त की टीम ने रविवार को भी काम किया। लोकायुक्त सूत्रों ने कहा, रिपोर्ट को मुद्रित किया जा रहा है। हमें नहीं मालूम कि यह कब पूरी होगी। हम कुछ अध्यायों को देख रहे हैं। हम चाहते हैं कि इसे कल तक तैयार कर दिया जाए। लेकिन इस चरण में ऐसा होता नहीं दिख रहा। हम बुधवार तक रिपोर्ट सौंपेगे। हेगड़े ने यह भी कहा कि खनिज संपदा की अवैध निकासी और कार्यालय का दुरुपयोग करने में मुख्यमंत्री और अन्य मंत्रियों की (प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष) भूमिका पर राज्यपाल हंसराज भारद्वाज उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए लोकायुक्त को कानूनी रूप से निर्देश दे सकते हैं। लोकायुक्त के मुताबिक चूंकि खनन विभाग मुख्यमंत्री के पास है इसलिए येद्दयुरप्पा आरोपों से दोषमुक्त नहीं हो सकते। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि येद्दयुरप्पा के पुत्रों सहित उनका परिवार अवैध खनन की गतिविधि से कैसे लाभान्वित हुआ।

लूप-एस्सार मामले में दर्ज किए गए राजा और बेहुरा के बयान

टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के तहत सीबीआइ ने लूप को स्पेक्ट्रम लाइसेंस देने और एस्सार समूह की भूमिका के सिलसिले में जेल में बंद पूर्व दूरसंचार मंत्री ए राजा और पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेहुरा का बयान दर्ज किया है। पूर्व विधि विशेषज्ञों ने कहा कि रूइया के नेतृत्व वाले एस्सार समूह की लाइसेंस दिए जाने के समय लूप टेलीकॉम में सिर्फ 2.15 फीसदी हिस्सेदारी थी। लाइसेंस की सब्सटांशियल इक्विटी शर्त के तहत कोई कंपनी एक ही सर्किल में दो ऑपरेटिंग लाइसेंस में 10 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी नहीं रख सकती। विशेष अदालत द्वारा सीबीआइ को रिलायंस एडीएजी समूह के एमडी गौतम दोषी के साथ राजा और बेहूरा से पूछताछ की अनुमति देने के बाद इन दोनों से इस हफ्ते पूछताछ की गई। एजेंसी ने दलील दी कि आगे की जांच चल रही है और तीनों आरोपियों से मामले के हित में न्यायिक हिरासत में पूछताछ की जानी जरूरी है। इन सबसे पटियाला हाउस अदालत परिसर में पूछताछ की गई।

Monday, July 25, 2011

भाजपा में भी येद्दयुरप्पा विरोधी स्वर

नई दिल्ली कर्नाटक के मुख्यमंत्री मुख्यमंत्री बीएस येद्दयुरप्पा की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। अवैध खनन व भूमि आवंटन पर अभी तक विपक्ष के हमले झेल रहे येद्दयुरप्पा का अब उनकी पार्टी के भीतर ही विरोध शुरू हो गया है। येद्दयुरप्पा को बचाने के रास्तों को पलीता लगाते हुए भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शांता कुमार ने उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने की मांग कर दी है। शांता कुमार ने पार्टी अध्यक्ष नितिन गडकरी व संसदीय दल के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी को पत्र लिखकर कहा है कि येद्दयुरप्पा को पद से न हटाने से भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई कमजोर पड़ेगी। येद्दयुरप्पा के खिलाफ जमीन आवंटन व अवैध खनन के आरोपों को लेकर पार्टी में दो राय हमेशा रही है। अभी तक पार्टी यह कह कर येद्दयुरप्पा को बचाती रही थी कि उनका काम अनैतिक हो सकता है,लेकिन गैर कानूनी नहीं है। उनके खिलाफ किसी अदालत या सक्षम संस्था से टिप्पणी न होने की आड़ भी पार्टी आलाकमान लेता रहा है। इस बार जब लोकायुक्त की जांच में उनका नाम आया है पार्टी में एक बार फिर इस मामले को लेकर दो गुट बन गए हैं। कर्नाटक के पूर्व पार्टी प्रभारी शांता कुमार ने तो लोकायुक्त की रिपोर्ट सामने आने के पहले ही येद्दयुरप्पा को हटाने की मांग कर भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दी है। ऐसे में अगर पार्टी नेतृत्व येद्दयुरप्पा के बचाव का रास्ता ढूढ़े भी तो विपक्ष शांता कुमार की चिठ्ठी को लेकर भाजपा पर दबाव बढ़ाएगा। शांता कुमार ने गडकरी व आडवाणी को लिखे पत्र में कहा है कि येद्दयुरप्पा को पद पर बनाए रखने से देश भर में पार्टी की छवि खराब होगी। इस मामले पर पार्टी पहले ही काफी समझौता कर चुकी है। अब राज्य में नेतृत्व परिवर्तन के लिए और ज्यादा प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। अपने पत्र लिखने के औचित्य को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा, कर्नाटक सरकार में भ्रष्टाचार की खबरों पर वह चुप होकर नहीं बैठ सकते हैं। इसलिए पत्र लिखने का फैसला किया। शांता कुमार ने कहा, जब वे कर्नाटक के प्रभारी थे और येद्दयुरप्पा पर जमीन आवंटन के आरोप लगने शुरू हुए थे, तभी उन्होंने उनको हटाने का सुझाव दिया था। हालांकि बाद में उनको ही वहां की जिम्मेदारी से हटा दिया गया। अब जबकि लोकायुक्त की रिपोर्ट में भी मुख्यमंत्री का नाम आ रहा है तो पार्टी को कड़ा फैसला लेना चाहिए। अगर येद्दयुरप्पा पर समझौता करते हैं तो भ्रष्टाचार से कैसे लड़ेंगे। पानी खतरे के निशान से उपर आ चुका है और न हटाने पर पार्टी की छवि दागदार होगी। शांता कुमार के इस पत्र ने भाजपा आलाकमान की मुश्किलें बढ़ा दी है। अभी तक लोकायुक्त की रिपोर्ट न आने की बात कह कर पार्टी इस मामले को ठंडा किए हुए थी और इस मुश्किल से बचने का कानूनी रास्ता ढूढ़ रही थी, लेकिन अब शांता कुमार के बाद कुछ और नेता भी मुखर हो सकते हैं।

भूमि आवंटन विवाद के बाद कैग रपट से घिरी नीतीश सरकार

पटना भूमि आवंटन विवाद से घिरी नीतीश सरकार अब 24 अरब की नई वित्तीय गड़बडि़यों में फंस गई है। भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में राज्य सरकार पर गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले वित्तीय वर्ष में बेवजह ख़र्च,गलत भुगतान, कर लगाने -वसूलने में हुई गड़बड़ी के कारण सरकार को लगभग 24 अरब की राजस्व हानि हुई है। वहीं, पथ निर्माण विभाग ने कैग की आपत्तियों पर अपने उन्नीस डिवीजनों के कार्यपालक अभियंताओं को दो दिनों के भीतर इस बारे में रिपोर्ट देने को कहा है। बिहार के प्रधान महालेखाकार प्रेमन दिनाराज ने 2009-10 की आडिट रिपोर्ट जारी करते हुए कहा है कि सिर्फ 2092 मामलों की जांच में 2399.68 करोड़ के नुकसान का पता चला है। रिपोर्ट के मुताबिक, वाणिज्य कर विभाग के टैक्स आकलन में त्रुटि से 610 करोड़, शराब की दुकानों की बंदोबस्ती में गड़बड़ी से 134 करोड़ व इसी तरह की अन्य अनियमितताओं से अरबों का घाटा हुआ है। रिपोर्ट में राच्य के स्कूलों और विभिन्न जि़लों में छात्र-छात्राओं के लिए खुले कंप्यूटर केंद्र की दुर्दशा पर आंकड़ों के साथ गंभीर टिप्पणियां की हैं। इसमें कहा गया है कि जिन 241 माध्यमिक स्कूलों के नमूनों की जांच हुई,उनमें से दो तिहाई स्कूलों में शौचालय, प्रयोगशाला, पुस्तकालय और पढ़ने के कमरे तक नहीं थे। दस जिलों में खुले 549 कंप्यूटर केंद्रों के बारे में बताया गया है कि कुछ कंप्यूटर तो चोर ले गए, कुछ अधिकारी उठा कर ले गए और जो बच गए, वो खराब हालत में पड़े हैं। जांच के क्रम में यह बात सामने आयी है कि वित्तीय गड़बडि़यों के कुछ मामले 41 साल पुराने हैं जिनमें अभी तक एडवांस समायोजित किए जाने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पायी है। अप्रैल 2010 से मई 2011 के बीच के मामलों के नमूना जांच क्रम में यह तथ्य सामने आया है कि 1.90 करोड़ रुपये का अग्रिम समायोजित नहीं हो पाया है। जिन अफसरों से यह मामला संबद्ध है उनमें 65 विभिन्न डिविजनों में स्थानांतरित हो गये, 14 रिटायर हो गये और पांच की मृत्यु हो गयी। रिटायर हो चुके और जिन अफसरों की मृत्यु हो चुकी है उनसे 23.34 लाख रुपये की वसूली होनी है। इसी प्रकार पथ निर्माण विभाग के तमाम डिवीजनों का भी लेनदेन दुरुस्त नहीं है। जिन डिवीजनों का मामला फंसा है उसमें वैशाली पथ प्रमंडल, हाजीपुर, पथ प्रमंडल दरभंगा, पथ प्रमंडल मुंगेर, नयी राजधानी पथ प्रमंडल, पथ प्रमंडल, बक्सर, पथ प्रमंडल बिहारशरीफ, पथ प्रमंडल सुपौल, पथ प्रमंडल संख्या-1, जहानाबाद, राज्य उच्च पथ प्रमंडल नवादा, पथ प्रमंडल बेगूसराय, पटना पश्चिम पथ प्रमंडल, पथ प्रमंडल, राष्ट्रीय उच्च पथ प्रमंडल, गया, राष्ट्रीय उच्च पथ प्रमंडल (यांत्रिक), मुजफ्फरपुर, राष्ट्रीय उच्च पथ प्रमंडल, सीतामढ़ी और राष्ट्रीय उच्च पथ प्रमंडल, मोतिहारी शामिल है। महालेखाकार आइडीएस धारीवाल ने बताया कि राज्य के सरकारी खज़ाने से विभिन्न मदों में ख़र्च के लिए एसी बिल के ज़रिए निकाले गए 15 हज़ार करोड़ के व्यय का अधिकृत ब्यौरा डीसी बिल के रूप में अभी तक प्राप्त नहीं हुआ है। 11 हज़ार करोड़ ख़र्च का जो डीसी बिल सौंपा गया है, उनमें से मात्र 64 करोड़ के ही वाउचर सही और समायोजन किए जाने लायक हैं। उल्लेखनीय है कि वित्तीय वर्ष 2002-09 के एसी-डीसी बिल वाले 11 हज़ार करोड़ के कथित घोटाले को लेकर नीतीश सरकार के खिलाफ पटना हाईकोर्ट में मामला दर्ज कराया गया था।