Saturday, January 15, 2011

सुधार की कोशिश

इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि अपनी जमीनों से जुड़े एक के बाद एक घोटाले सामने आने के बाद रक्षा मंत्रालय चेतता हुआ दिख रहा है। रक्षा मंत्री एके एंटनी की मानें तो आदर्श सोसायटी घोटाले से सबक लेते हुए रक्षा मंत्रालय ने अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने की नीति बदलने के साथ-साथ भूमि रिकार्डो का कंप्यूटरीकरण करने का निर्णय लिया है। प्रश्न यह है कि नीति बदलने अथवा भू-संपदा के रिकार्डो का कंप्यूटरीकरण करने की आवश्यकता तब क्यों नहीं महसूस हुई जब दार्जिलिंग में सुकना घोटाला सामने आया था और जिसके कारण सेना को अच्छी-खासी बदनामी का सामना करना पड़ा था? सुकना घोटाले से पीछा छूटने के पहले ही जिस तरह आदर्श सोसायटी घोटाला सामने आ गया और अब मुंबई में ही एक नए घोटाले की परतें खुल रही हैं उससे तो यह लगता है कि यदि कोई व्यापक समीक्षा हो तो सुकना और आदर्श जैसे घोटालों की कतार लग जाएगी। बेहतर हो कि रक्षा मंत्रालय ऐसे घोटालों के मूल कारणों पर गौर करे। इस तरह के घोटालों का एक कारण रक्षा मंत्रालय की जमीनों के इर्द-गिर्द आबादी का विस्तार हो जाना है। कई शहरों में तो छावनी क्षेत्र शहरों के बीच आ गए हैं। इसके चलते एक ओर जहां सेना की जमीनें बेशकीमती हो गई हैं वहीं दूसरी ओर वे शहरों के विस्तार में बाधक भी बन रही हैं। क्या यह सही समय नहीं जब सेना अपनी ऐसी जमीनों का व्यावसायिक उपयोग करे और छावनियों को आबादी से दूर ले जाए? सच तो यह है कि यह काम अब तक शुरू हो जाना चाहिए था, क्योंकि सैन्य ठिकानों के सघन आबादी से घिरते चले जाने का कोई औचित्य नहीं। रक्षा मंत्रालय को इसकी भी अनुभूति होनी चाहिए कि मामला सिर्फ सेना की जमीनों को अनुचित तरीके से बेचने का ही नहीं है, बल्कि अन्य अनेक नियम-कानूनों की अनदेखी का भी है। क्या यह तथ्य नहीं कि मुंबई में आदर्श हाउसिंग सोसायटी ने जब 31 मंजिला अपार्टमेंट खड़ा कर लिया तब सेना के अधिकारियों को यह समझ आया कि सैन्य ठिकाने के निकट इतनी ऊंची इमारत नहीं बननी चाहिए थी? आखिर ऐसा तो है नहीं कि इतनी बड़ी इमारत रातोंरात बना ली गई हो। यह आश्चर्यजनक है कि मुंबई में सेना की एक अन्य जमीन पर इमारत खड़ी होने के बाद सैन्य अधिकारियों को यह समझ आया कि ऐसा नहीं होना चाहिए था। स्पष्ट है कि केवल अनापत्ति प्रमाणपत्र जारी करने की नीति बदलने और भूमि रिकार्डो का कंप्यूटरीकरण करने से बात बनने वाली नहीं है। रक्षा मंत्रालय को इस सवाल का जवाब खोजना होगा कि उसके वरिष्ठ अधिकारी घपले-घोटालों में क्यों लिप्त हो रहे हैं? यह साधारण बात नहीं कि जनरल और ले. जनरल स्तर के अधिकारी घपले-घोटालों में लिप्त माने जा रहे हैं। चिंताजनक यह है कि घपले-घोटाले केवल सेना की जमीनों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि अन्य अनेक क्षेत्रों में भी नजर आ रहे हैं और इसका ताजा उदाहरण है सेना की कैंटीन के लिए सामानों की खरीद-फरोख्त में अनियमितता के मामले में तीनों सेनाओं के वरिष्ठ अधिकारियों का लोकलेखा समिति के सामने पेश होना।


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