Saturday, January 29, 2011

जवाबदेह लोकपाल की दरकार


सरकार ने जो मसौदा तैयार किया है, उसके मुताबिक, भ्रष्टाचार के खिलाफलोकपाल की कोई भूमिका ही नहीं है। ऐसे में नागरिक समाज ने वैकल्पिक मसौदा तैयार किया है।

ऐसा क्यों है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ पर्याप्त सुबूत होने के बावजूद कोई जेल क्यों नहीं जाता? इसका कारण है कि हमारे यहां ऐसे भ्रष्टाचार निरोधक कानून एवं एजेंसियां हैं, जो अपने से काम नहीं कर सकतीं। मसलन, केंद्र में केंद्रीय सतर्कता आयोग जैसी स्वतंत्र संस्था है, मगर उसकी भूमिका सलाहकार जैसी है। एक पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के अनुसार, उनके कार्यकाल में उन्हें जब भी लगा कि किसी अधिकारी को जेल जाना चाहिए, उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। कहने को सीबीआई भी स्वतंत्र है, मगर वह भी पूरी तरह सरकार के अधीन काम करती है। राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार विरोधी मशीनरी का भी यही हाल है।
इसी तरह हमारे भ्रष्टाचार विरोधी कानून बेहद अपर्याप्त हैं। अगर कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार का दोषी पाया जाता है, तब उसने सरकारी खजाने को जो नुकसान पहुंचाया, उसकी भरपाई का कोई प्रावधान ही नहीं है। इसलिए अगर हम भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रति गंभीर हैं, तो हमें अपनी भ्रष्टाचार विरोधी मशीनरी में व्यापक बदलाव की जरूरत है।
आज हमारे भारत में जितना भ्रष्टाचार है, 1970 के दशक में उससे भी ज्यादा भ्रष्टाचार हांगकांग में था। नतीजतन वहां की सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक स्वतंत्र आयोग (आईसीएसी) की स्थापना के लिए मजबूर होना पड़ा था। पहले चरण में ही इस आयोग ने 180 में से 119 पुलिस अधिकारियों को नौकरी से निकाल दिया। आज हांगकांग उन देशों में शुमार है, जहां की सरकारी मशीनरी ईमानदार है।
वास्तव में जनता की भारी नाराजगी किसी गंभीर सरकार को क्रांतिकारी सुधार के लिए प्रेरित करने का अवसर हो सकती है। मगर सार्वजनिक आलोचना का मनमोहन सिंह सरकार पर बहुत कम असर पड़ता दिख रहा है। उलटे सरकार ने लोकपाल बिल का जो मसौदा तैयार किया है, वह देश का ही अपमान है।
सरकार के लोकपाल को किसी मामले में स्वस्फूर्त जांच शुरू करने का तो अधिकार होगा और ही वह जनता से आई शिकायतों को स्वीकार कर सकेगा। यदि किसी को शिकायत करनी ही है, तो वह लोकसभा अध्यक्ष से कर सकता है। अध्यक्ष द्वारा अग्रेसित शिकायतों पर ही लोकपाल विचार कर सकेगा। चूंकि अध्यक्ष सत्तारूढ़ दल का होता है, इसलिए स्वाभाविक रूप से केवल वही शिकायतें लोकपाल को जांच के लिए भेजी जाएंगी, जो विरोधी दल के सांसदों के खिलाफ होंगी। जांच के बाद लोकपाल को किसी तरह की कार्रवाई करने की शक्ति नहीं होगी। वह अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष और प्रधानमंत्री को भेजेगा। यदि शिकायत किसी मंत्री के खिलाफ है, तब प्रधानमंत्री तय करेंगे कि लोकपाल की रिपोर्ट के आधार पर उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाए।
मगर गठबंधन के दौर में क्या किसी प्रधानमंत्री में इतना राजनीतिक साहस होगा कि वह अपने किसी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करे? इस आलोक में सरकार का यह विधेयक बेतुका लगता है। इसके विपरीत नागरिक समाज ने एक वैकल्पिक लोकपाल विधेयक तैयार किया है। इसका पहला मसौदा प्रशांत भूषण, न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े और मैंने मिलकर तैयार किया था।
इसके अधिकार क्षेत्र में नौकरशाह, राजनेता और न्यायाधीश होंगे। इसमें लोकपाल को बिना किसी एजेंसी की अनुमति लिए जांच शुरू करने और मुकदमा चलाने का अधिकार होगा। यदि किसी को दोषी ठहराया जाता है तब उसके गलत कृत्यों की वजह से सरकारी खजाने को हुए नुकसान की भरपाई उन सभी लोगों से होगी, जिन्हें दोषी ठहराया गया है। राज्यों के लिए भी ऐसे स्वतंत्र निकाय, जिसे लोकायुक्त कहा गया है, का सुझाव दिया गया है। कुछ राज्यों में अभी लोकायुक्त हैं, जो अप्रभावी साबित हुए हैं। नागरिक समाज ने लोकपाल विधेयक का जो मसौदा तैयार किया है, उसकी प्रति दो महीने पहले सरकार को भेज दी गई है।
हांगकांग सरकार आईसीएसी विधेयक इसलिए लागू कर सकी थी, क्योंकि लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे। भारत में भी इस जज्बे की दरकार है, जिसकी शुरुआत 30 जनवरी को हो सकती है, जब प्रभावी और मजबूत लोकपाल की मांग को लेकर राजधानी सहित देश के 20 शहरों में हजारों लोग जुटने वाले हैं।


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