आदर्श सोसायटी ने भ्रष्ट तरीकों से और नियम-कायदों का मखौल उड़ाते हुए अगर एक इमारत खड़ी की, तो उस इमारत को जरूर गिराया जाना चाहिए। लेकिन बात सिर्फ ऐसे कदमों से संदेश देने तक सीमित रह गई, तो फिर असली बीमारी का कोई इलाज नहीं हो सकेगा। आज जरूरत भ्रष्टाचार की पूरी इमारत पर चोट करने की है, तभी समाज में कोई आदर्श कायम हो सकेगा
पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश का आदेश है कि मुंबई की आदर्श सोसायटी की इमारत को गिरा दिया जाए। लेकिन इस आदेश पर सचमुच अमल होगा, इस पर देश के बहुत से लोगों को यकीन नहीं है। इसलिए कि ऐसी कार्रवाई पहले कभी नहीं देखी-सुनी गई। बहरहाल, इस आदेश से क्या यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि मनमोहन सिंह सरकार अब सचमुच भ्रष्टाचार बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है? पर्यावरण एवं समुद्र-तटीय क्षेत्र संबंधी कायदों के उल्लंघन की जांच करने वाली समिति ने आदर्श सोसाइटी की इमारत के संदर्भ में तीन सुझाव दिए हैं। इनमें पहला सुझाव यह है कि इमारत को पूरी तरह गिरा दिया जाए। दूसरा सुझाव इसके कुछ हिस्सों को गिराने का है और तीसरी सिफारिश यह है कि पूरी इमारत सरकारी मालिकाने में लेकर उसका सार्वजनिक हित के लिए इस्तेमाल किया जाए। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय द्वारा पहले सुझाव को स्वीकार करना यह संकेत देता है कि वह कायदे तोड़ने वालों को सबसे कड़ा संदेश देना चाहता है। असल में अगर इमारत गिराई गई तो उसका महत्व यही होगा कि उससे देश भर में एक बेहद अहम पैगाम जाएगा। यही वजह बताते हुए मुंबई के कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने जयराम रमेश के आदेश का स्वागत किया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे सचमुच भ्रष्टाचार को रोकने की दिशा में कोई पहल होगी या फिर यह सिर्फ सरकार की हाल में खराब हुई छवि को सुधारने की जुगत भर है? सवाल यह भी है क्या सरकार सिर्फ अपनी पहल से भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सकती है या फिर पूरे समाज को इस दिशा में पहल करने की जरूरत है? दरअसल, हाल में सामने आए अनेक मामलों से जाहिर होता है कि देश में भ्रष्टाचार की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी हैं। ताजा तस्वीर से यह बात साफ होती है कि भ्रष्टाचार के बारे में देश को अपना विमर्श बदलना होगा। अभी भ्रष्टाचार की बात होने पर ज्यादातर राजनीतिक भ्रष्टाचार की र्चचा होती है और इसके साथ कभी-कभार नौकरशाही के भ्रष्टाचार को भी जोड़ दिया जाता है। लेकिन आज भ्रष्टाचार में राज्य-व्यवस्था के ये दोनों अंग भले सक्रिय भागीदार हों, लेकिन यह साफ है कि इसके संचालक की हैसियत चंद कॉरपोरेट जगत ने हासिल कर ली है। अगर यह क्रम आगे बढ़ा, तो देश के संसाधन न सिर्फ चंद तबकों के हाथ में इकट्ठे होते जाएंगे, बल्कि उन तबकों के बीच भी जो ज्यादा भ्रष्ट और सत्ता तंत्र के विभिन्न अंगों से साजिशी रिश्ते बनाने में सक्षम होंगे, उसका सबसे बड़ा हिस्सा हड़प लेंगे। देश में नियमों के मुताबिक और सीमित ईमानदारी के साथ भी कारोबार करना मुमकिन नहीं रह जाएगा। इस आशंका से आज कुछ पूंजीवादी हलकों में भी बेचैनी देखी जा रही है। एचडीएफसी के चेयरमैन दीपक पारेख की यह चेतावनी बेजा नहीं है कि अगर सब कुछ इसी तरह चलता रहा तो भारत के विकास की कहानी खतरे में पड़ जाएगी। भ्रष्टाचार के मजबूत होते शिकंजे से इसीलिए चिंतित होने की जरूरत है और उन संभव उपायों पर गौर किए जाने की जरूरत है, जिससे अब वजूद में आ चुके क्रोनी कैपिटिलज्म यानी-सिफारिशी पूंजीवाद पर लगाम लगाई जा सके। इस संदर्भ में दीपक पारेख ने कुछ समय पहले एक अहम सुझाव दिया। उन्होंने मांग की है कि ब्रिटेन में हाल में लाए गए रिश्वत विधेयक की तरह का कानून भारत में भी बनाया जाए। उस विधेयक का सबसे खास प्रावधान यह है कि घूस देने को अपराध बना दिया गया है और घूसखोरी रोकने की जवाबदेही कंपनियों पर डाल दी गई है। मकसद कंपनियों को बेईमान तौर-तरीकों का सहारा लेने से रोकना है। इसी तरह कॉरपोरेट लॉबिंग को पारदर्शी बनाने के लिए आज सख्त कानून की जरूरत महसूस की जा रही है। जानकारों का कहना है कि लॉबिंग को रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन उसकी संहिता तैयार की जा सकती है और उसकी सार्वजनिक जांच-पड़ताल के कानूनी प्रावधान किए जा सकते हैं। एक जरूरी प्रावधान यह किया जा सकता है कि लॉबिस्ट अपनी पहचान सार्वजनिक रूप से घोषित करें और वे अपने पेशेवर कार्य में किससे और कब मिलते हैं, इसका पूरा ब्योरा बताने के लिए बाध्य हों। यह एक तरह से सूचना के अधिकार कानून का कॉरपोरेट सेक्टर तक विस्तार होगा। लेकिन ऐसा कानून तभी बन सकता है, जब उसके लिए राजनीतिक दल इरादा दिखाएं। अगर राजनीतिक दलों के भीतर कॉरपोरेट घरानों के पैरोकार बैठे हों, तो वो अपने आकाओं के हित पर चोट पहुंचाने वाले कदम उठाएंगे, इसकी उम्मीद बेवजह है। इसीलिए आज जरूरत भ्रष्टाचार के सवाल को सार्वजनिक र्चचा में बनाए रखना और इसके नए संदर्भों को लोगों के सामने लाना है। 1991 के पहले, जब उदारीकरण की आर्थिक नीतियां लागू नहीं हुई थीं और कॉरपोरेट जगत उस दौर को अपमान के साथ लाइसेंस-परमिट राज कहता था, तब यह बात खूब प्रचारित हुई थी कि बाजार से सरकारी नियंतण्रघटने के साथ भ्रष्टाचार कम हो जाएगा। लेकिन पिछले बीस सालों का अनुभव यह है कि खुले बाजार के दौर में भ्रष्टाचार घटने के बजाय और बढ़ा है और आज यह लोकतंत्र व संवैधानिक राजनीतिक व्यवस्था को पटरी से उतारने की स्थिति में पहुंच गया है। कुछ समय पहले अमेरिकी थिंक टैंक ग्लोबल फाइनेंशियल इंटेग्रिटी ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि 1948 से 2008 तक भ्रष्ट तरीके से कमाए गए 20 लाख 80 हजार करोड़ रु पए भारत से बाहर ले जाए गए। इसमें आधे से भी ज्यादा रकम यानी करीब 11 लाख करोड़ रु पए सिर्फ 2000 से 2008 के बीच बाहर गए। इन आंकड़ों ने यह भ्रम तोड़ दिया कि देश में टैक्स की ऊंची दर और सरकार की नियंत्रणकारी नीतियों की वजह से काला धन पैदा होता है, जिसे चोरी-छिपे विदेशों में ले जाकर जमा या निवेश कर दिया जाता है। दरअसल, देश के संसाधनों को काले धन में बदला जाना जारी है। 1990 में जहां देश के सकल घरेलू उत्पाद का 46 फीसद हिस्सा काले धन में तब्दील हो गया था, वह अब 50 प्रतिशत तक पहुंच गया है। आज भारत की जीडीपी करीब 1.3 खरब डॉलर है, जबकि करीब देश में काला धन 640 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। आज सबसे ज्यादा जरूरत भ्रष्टाचार के इस विकराल रूप को देखने की है। आदर्श सोसायटी ने भ्रष्ट तरीकों से और नियम-कायदों का मखौल उड़ाते हुए अगर एक इमारत खड़ी की, तो उस इमारत को जरूर गिराया जाना चाहिए। लेकिन बात सिर्फ ऐसे कदमों से संदेश देने तक सीमित रह गई, तो फिर असली बीमारी का कोई इलाज नहीं हो सकेगा। आज जरूरत भ्रष्टाचार की पूरी इमारत पर चोट करने की है, तभी समाज में कोई आदर्श कायम हो सकेगा।

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