लेखक विशेषाधिकार के दुरुपयोग को भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह बता रहे हैं...
देश के 14 प्रतिष्ठित नागरिकों ने नेताओं के नाम खुली चिट्ठी लिखकर सरकार, व्यापार एवं संस्थानों में सुशासन के लोप पर गहरी चिंता व्यक्त की है। साथ ही भ्रष्टाचार के रोग को खत्म करने के लिए तुरंत जरूरी कदम उठाने का आह्वान भी किया है। दस्तखत करने वालों में चोटी के उद्योगपति, अर्थशास्त्री एवं उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज शामिल हैं। वर्ष 2010 में एक से बढ़कर एक घोटाले उजागर हुए। अब भ्रष्टाचार एक ऐसा नासूर बन गया है, जिसकी टीस हर व्यक्ति महसूस कर रहा है। सभी राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ धंसे हैं। भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए प्रबुद्ध एवं निष्ठावान नागरिकों को सामने आना पडे़गा। हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने मुंबई के विवादित आदर्श हाउसिंग सोसाइटी भवन को अनधिकृत करार देते हुए इसे ध्वस्त करने का निर्देश दिया है। मंत्री ने अन्य दो विकल्पों-पहला, भवन का अधिग्रहण सरकार कर ले तथा दूसरा, निर्धारित फ्लोर स्पेस इंडेक्स से अधिक किए गए निर्माण को तोड़ दिया जाए, को खारिज कर दिया क्योंकि पहले विकल्प में सरकार को बहुत अधिक विशेषाधिकार प्राप्त हो जाता और दूसरा विकल्प तटीय नियमन क्षेत्र अधिसूचना, 1991 के उल्लंघन को नियमित या माफ करना होता। अनैतिक व्यक्तियों के हाथ में विशेषाधिकार भ्रष्टाचार एवं पक्षपात को जन्म देता है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 19 दिसंबर को कांग्रेस के 83वें अधिवेशन को संबोधित करते हुए सरकार के भूमि आवंटन करने के विशेषाधिकार को खत्म करने का सुझाव दिया। अधिवेशन में उपस्थित करीब 20 हजार प्रतिनिधि अपनी अध्यक्ष की हर बात पर जमकर तालियां बजा रहे थे, किंतु किसी ने तब ताली नहीं बजाई जब उन्होंने मुख्यमंत्रियों एवं मंत्रियों को यह अधिकार छोड़ने को कहा। इस तटस्थ प्रतिक्रिया से वह खुद हैरान हुईं और एक शुष्क मुस्कान के साथ उन्होंने टिप्पणी की, इसके लिए कोई ताली नहीं! विशेषाधिकार का दुरुपयोग भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह है। भ्रष्टाचार के कीटाणु देश की शासन व्यवस्था में स्वाधीनता प्राप्ति के तुरंत बाद ही प्रवेश कर गए थे। 1950 और 60 के दशकों में ए.डी. गोरवाला एवं पॉल एप्पलबी की रिपोर्ट पूरी तरह प्रशासनिक सुधार पर केंद्रित थीं। 1950 में भारत सरकार ने प्रख्यात नौकरशाह ए.डी. गोरवाला को शासन व्यवस्था में सुधार के लिए सुझाव देने को कहा। 1951 में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में उन्होंने दो कड़वी टिप्पणियां कीं। पहली यह कि नेहरू मंत्रिमंडल के कुछ मंत्री भ्रष्ट हैं और दूसरी कि सरकार इन मंत्रियों का गलत ढंग से बचाव करती है। उस वक्त तक केवल जीप घोटाला सामने आया था, जिसमें लंदन में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त वी.के. कृष्णमेनन के ऊपर उंगली उठी थी। भारतीय सेना ने 155 जीपों की मांग की थी। सेना ने इसके लिए एक ब्रिगेडियर की सेवा उपलब्ध कराई थी, किंतु कृष्णमेनन ने उन्हें नजरअंदाज कर एक एजेंट क्लिमेंसन के जरिये एक विदेशी कंपनी को जीप आपूर्ति का आदेश दे दिया। हालांकि कृष्णमेनन एक ईमानदार व्यक्ति माने जाते थे और जीप की गुणवत्ता के बारे में कोई संदेह नहीं था, किंतु प्रक्रिया का पालन न करने के कारण उनके ऊपर विपक्ष द्वारा तीखे प्रहार किए गए। दूसरा घोटाला जीवन बीमा निगम-मुंद्रा डील है जो स्वतंत्र भारत का पहला वित्तीय घोटाला है। हरिदास मुंद्रा कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज का दलाल एवं उद्योगपति था। उसने अपने प्रभाव से जीवन बीमा निगम के 1.24 करोड़ रुपये का निवेश अपनी छह समस्याग्रस्त कंपनियों में करा दिया। तत्कालीन कांग्रेस सांसद फिरोज गांधी ने इस घपले को संसद में उजागर किया। सरकार ने न्यायमूर्ति एम.सी. छागला की एक-सदस्यीय जांच समिति का गठन किया, जिसने रिकॉर्ड 24 दिनों में रिपोर्ट सौंप दी। इसने तत्कालीन वित्तमंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी को कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया और उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। मुंद्रा को सजा हुई। समिति ने तत्कालीन वित्त सचिव एच.एम. पटेल एवं जीवन बीमा निगम के अधिकारी एल.एस. वैद्यनाथन पर भी मिलीभगत के लिए मुकदमा चलाने की सिफारिश की। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का एक लाभ यह हुआ कि इस कारण केंद्रीय सतर्कता आयोग का गठन हो गया। इसके बाद लगातार घपले-घोटाले होते रहे, किंतु सबसे बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआइ) अभियुक्तों को सजा दिलाने में अक्षम साबित हुई है क्योंकि यह सही मायने में स्वायत्त नहीं है और राजनीतिक दबाव में काम करती है। सीबीआइ द्वारा दायर लगभग नौ हजार मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। इनमें से करीब दो हजार मामले तो एक दशक से भी अधिक समय से लंबित हैं। इसके अलावा एकल निर्देश भेदभावपूर्ण प्रावधान है, जिसके तहत केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के अधिकारी पर अभियोजन चलाने के लिए उसे नियुक्त करने वाले अधिकारी की पूर्वानुमति होनी चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने विनीत नारायण मामले में इसे अवैध करार दिया, किंतु सरकार पिछले दरवाजे से इसे फिर से ले आई। यह संविधान के अनुच्छेद 14 द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार का हनन है। भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए विशेषाधिकार खत्म कर सुपरिभाषित प्रक्रिया निर्धारित करना जरूरी है। संविधान की समीक्षा के लिए बने आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत संसद द्वारा कानून बनाकर स्वायत्त पर्सनल बोर्ड बनाने की अनुशंसा की जिसने राजनीतिक कार्यपालिका को नियुक्ति, प्रोन्नति तथा स्थानांतरण के बारे में सुझाव दिए। इसने जनसेवकों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ठोस कानूनी प्रावधान बनाने पर जोर दिया। साथ ही बेनामी हस्तांतरण; निरोधक अधिनियम, 1988 तथा भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम जैसे कानूनों की कमियों को दूर करने की सिफारिश कीं। इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार की परिभाषा को विस्तारित करने की आवश्यकता है जैसे कि उच्चतम न्यायालय ने डॉ. एस. दत्त बनाम उत्तर प्रदेश में व्यवस्था दी-शब्द भ्रष्ट में केवल घूस लेना ही शामिल नहीं है। इसका इस्तेमाल व्यापक अर्थ में ऐसे आचरण के लिए होता है जो नैतिक रूप से पतित है। भ्रष्ट शब्द की न्यायिक व्याख्या कई मामलों में की गई है। एम्परर बनाम राना नाना में मुख्य न्यायाधीश मैक्लिओड ने इस शब्द को घपले या बेईमानी से ज्यादा व्यापक अर्थ में लिया और इसे केवल रिश्वत लेने या घूस के मामलों तक सीमित नहीं रखा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
देश के 14 प्रतिष्ठित नागरिकों ने नेताओं के नाम खुली चिट्ठी लिखकर सरकार, व्यापार एवं संस्थानों में सुशासन के लोप पर गहरी चिंता व्यक्त की है। साथ ही भ्रष्टाचार के रोग को खत्म करने के लिए तुरंत जरूरी कदम उठाने का आह्वान भी किया है। दस्तखत करने वालों में चोटी के उद्योगपति, अर्थशास्त्री एवं उच्चतम न्यायालय के पूर्व जज शामिल हैं। वर्ष 2010 में एक से बढ़कर एक घोटाले उजागर हुए। अब भ्रष्टाचार एक ऐसा नासूर बन गया है, जिसकी टीस हर व्यक्ति महसूस कर रहा है। सभी राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के दलदल में आकंठ धंसे हैं। भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए प्रबुद्ध एवं निष्ठावान नागरिकों को सामने आना पडे़गा। हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने मुंबई के विवादित आदर्श हाउसिंग सोसाइटी भवन को अनधिकृत करार देते हुए इसे ध्वस्त करने का निर्देश दिया है। मंत्री ने अन्य दो विकल्पों-पहला, भवन का अधिग्रहण सरकार कर ले तथा दूसरा, निर्धारित फ्लोर स्पेस इंडेक्स से अधिक किए गए निर्माण को तोड़ दिया जाए, को खारिज कर दिया क्योंकि पहले विकल्प में सरकार को बहुत अधिक विशेषाधिकार प्राप्त हो जाता और दूसरा विकल्प तटीय नियमन क्षेत्र अधिसूचना, 1991 के उल्लंघन को नियमित या माफ करना होता। अनैतिक व्यक्तियों के हाथ में विशेषाधिकार भ्रष्टाचार एवं पक्षपात को जन्म देता है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने 19 दिसंबर को कांग्रेस के 83वें अधिवेशन को संबोधित करते हुए सरकार के भूमि आवंटन करने के विशेषाधिकार को खत्म करने का सुझाव दिया। अधिवेशन में उपस्थित करीब 20 हजार प्रतिनिधि अपनी अध्यक्ष की हर बात पर जमकर तालियां बजा रहे थे, किंतु किसी ने तब ताली नहीं बजाई जब उन्होंने मुख्यमंत्रियों एवं मंत्रियों को यह अधिकार छोड़ने को कहा। इस तटस्थ प्रतिक्रिया से वह खुद हैरान हुईं और एक शुष्क मुस्कान के साथ उन्होंने टिप्पणी की, इसके लिए कोई ताली नहीं! विशेषाधिकार का दुरुपयोग भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी वजह है। भ्रष्टाचार के कीटाणु देश की शासन व्यवस्था में स्वाधीनता प्राप्ति के तुरंत बाद ही प्रवेश कर गए थे। 1950 और 60 के दशकों में ए.डी. गोरवाला एवं पॉल एप्पलबी की रिपोर्ट पूरी तरह प्रशासनिक सुधार पर केंद्रित थीं। 1950 में भारत सरकार ने प्रख्यात नौकरशाह ए.डी. गोरवाला को शासन व्यवस्था में सुधार के लिए सुझाव देने को कहा। 1951 में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में उन्होंने दो कड़वी टिप्पणियां कीं। पहली यह कि नेहरू मंत्रिमंडल के कुछ मंत्री भ्रष्ट हैं और दूसरी कि सरकार इन मंत्रियों का गलत ढंग से बचाव करती है। उस वक्त तक केवल जीप घोटाला सामने आया था, जिसमें लंदन में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त वी.के. कृष्णमेनन के ऊपर उंगली उठी थी। भारतीय सेना ने 155 जीपों की मांग की थी। सेना ने इसके लिए एक ब्रिगेडियर की सेवा उपलब्ध कराई थी, किंतु कृष्णमेनन ने उन्हें नजरअंदाज कर एक एजेंट क्लिमेंसन के जरिये एक विदेशी कंपनी को जीप आपूर्ति का आदेश दे दिया। हालांकि कृष्णमेनन एक ईमानदार व्यक्ति माने जाते थे और जीप की गुणवत्ता के बारे में कोई संदेह नहीं था, किंतु प्रक्रिया का पालन न करने के कारण उनके ऊपर विपक्ष द्वारा तीखे प्रहार किए गए। दूसरा घोटाला जीवन बीमा निगम-मुंद्रा डील है जो स्वतंत्र भारत का पहला वित्तीय घोटाला है। हरिदास मुंद्रा कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज का दलाल एवं उद्योगपति था। उसने अपने प्रभाव से जीवन बीमा निगम के 1.24 करोड़ रुपये का निवेश अपनी छह समस्याग्रस्त कंपनियों में करा दिया। तत्कालीन कांग्रेस सांसद फिरोज गांधी ने इस घपले को संसद में उजागर किया। सरकार ने न्यायमूर्ति एम.सी. छागला की एक-सदस्यीय जांच समिति का गठन किया, जिसने रिकॉर्ड 24 दिनों में रिपोर्ट सौंप दी। इसने तत्कालीन वित्तमंत्री टी.टी. कृष्णमाचारी को कानूनी रूप से जिम्मेदार ठहराया और उन्हें त्यागपत्र देना पड़ा। मुंद्रा को सजा हुई। समिति ने तत्कालीन वित्त सचिव एच.एम. पटेल एवं जीवन बीमा निगम के अधिकारी एल.एस. वैद्यनाथन पर भी मिलीभगत के लिए मुकदमा चलाने की सिफारिश की। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना का एक लाभ यह हुआ कि इस कारण केंद्रीय सतर्कता आयोग का गठन हो गया। इसके बाद लगातार घपले-घोटाले होते रहे, किंतु सबसे बड़ी जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआइ) अभियुक्तों को सजा दिलाने में अक्षम साबित हुई है क्योंकि यह सही मायने में स्वायत्त नहीं है और राजनीतिक दबाव में काम करती है। सीबीआइ द्वारा दायर लगभग नौ हजार मामले विभिन्न अदालतों में लंबित हैं। इनमें से करीब दो हजार मामले तो एक दशक से भी अधिक समय से लंबित हैं। इसके अलावा एकल निर्देश भेदभावपूर्ण प्रावधान है, जिसके तहत केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव या उससे ऊपर के अधिकारी पर अभियोजन चलाने के लिए उसे नियुक्त करने वाले अधिकारी की पूर्वानुमति होनी चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने विनीत नारायण मामले में इसे अवैध करार दिया, किंतु सरकार पिछले दरवाजे से इसे फिर से ले आई। यह संविधान के अनुच्छेद 14 द्वारा प्रदत्त समानता के अधिकार का हनन है। भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए विशेषाधिकार खत्म कर सुपरिभाषित प्रक्रिया निर्धारित करना जरूरी है। संविधान की समीक्षा के लिए बने आयोग ने संविधान के अनुच्छेद 309 के तहत संसद द्वारा कानून बनाकर स्वायत्त पर्सनल बोर्ड बनाने की अनुशंसा की जिसने राजनीतिक कार्यपालिका को नियुक्ति, प्रोन्नति तथा स्थानांतरण के बारे में सुझाव दिए। इसने जनसेवकों की जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए ठोस कानूनी प्रावधान बनाने पर जोर दिया। साथ ही बेनामी हस्तांतरण; निरोधक अधिनियम, 1988 तथा भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम जैसे कानूनों की कमियों को दूर करने की सिफारिश कीं। इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार की परिभाषा को विस्तारित करने की आवश्यकता है जैसे कि उच्चतम न्यायालय ने डॉ. एस. दत्त बनाम उत्तर प्रदेश में व्यवस्था दी-शब्द भ्रष्ट में केवल घूस लेना ही शामिल नहीं है। इसका इस्तेमाल व्यापक अर्थ में ऐसे आचरण के लिए होता है जो नैतिक रूप से पतित है। भ्रष्ट शब्द की न्यायिक व्याख्या कई मामलों में की गई है। एम्परर बनाम राना नाना में मुख्य न्यायाधीश मैक्लिओड ने इस शब्द को घपले या बेईमानी से ज्यादा व्यापक अर्थ में लिया और इसे केवल रिश्वत लेने या घूस के मामलों तक सीमित नहीं रखा। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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