Sunday, January 30, 2011

सीजीएफ के सामने सरकार भी बेबस, जांच पड़ी अधूरी


भ्रष्टमंडल खेलों में विदेशी हाथों की जांच कॉमनवेलथ खेल संघ (सीजीएफ) के दरवाजे पर आकर ठिठक रही है। जांच एजेंसियों के हाथ लगे दस्तावेज बताते हैं कि बीमा, प्रसारण अधिकारों की बिक्री और मार्केटिंग सहित कई बड़े अनुबंध विदेशी सलाहकारों को देने के फैसले सीजीएफ अधिकारियों की सिफारिश या असर से हुए थे। विदेशी कंसल्टेंट नियुक्त करने के कई मामलों में गहरी अनियमितता पाई गई, लेकिन सीजीएफ के अधिकारी जांच में मदद से किनारा कर रहे हैं। सीईओ माइक हूपर ने जांच एजेसियों के पत्रों का कोई जवाब नहीं दिया है। सीजीएफ के असहयोग का मामला सरकार के लिए नई सांसत बन सकता है। राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार की जांच कई मामलों में टीम कलमाड़ी और टीम फेनेल की मिलीभगत की तरफ इशारा कर रही है। जांच व ऑडिट एजेंसियों ने कलमाड़ी व उनकी टीम को अपने शिकंजे में ले लिया है, लेकिन एक्जीक्यूटिव बोर्ड में सीजीएफ के नुमाइंदे सूचनाएं देने से भी बच रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक दस्तावेज और बैठकों के कार्यवाही के ब्योरे बताते हैं कि सीजीएफ के अधिकारियों ने कई बड़े फैसलों को प्रभावित किया था। इस जानकारी के आधार पर ऑडिट एजेंसियों ने सीजीएफ के सीईओ माइक हूपर से दो बार पत्र लिखकर सूचनाएं मांगी हैं, लेकिन हूपर की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। मामला कैबिनेट सचिवालय और विदेश मंत्रालय के सामने रखा जाने वाला है। संभव है कि जांच एजेंसियां हूपर के असहयोग को दर्ज करते हुए अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दें क्यों कि सीजीएफ और इसके अधिकारी भारतीय कानूनों के दायरे से बाहर हैं। बताते चलें कि जुलाई अगस्त 2009 में माइक फेनेल तैयारियों में देरी पर भड़के थे और विदेशी सलाहकारों को तैनात करने का दबाव बनाया था। सूत्र बताते हैं कि आयोजन समिति ने फेनेल की यह बात मानकर उन्हें मना लिया और बाद में सीजीएफ व टीम कलमाड़ी के बीच रिश्ते पूरी तरह सामान्य हो गए। दैनिक जागरण के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि फेनेल व हूपर ने विदेशी कंसल्टेंट के चुनाव को प्रभावित किया और विदेशी कंसल्टेंट के चयन नियम तोड़ कर हुए। पहला मामला खेलों के अंतरराष्ट्रीय प्रसारण अधिकारों की बिक्री का था। इसके लिए लंदन की फास्ट ट्रैक सेल्स का चयन किया गया था। सीएजी ने एक साल पहले सरकार को भेजी अपनी अंतरिम रिपोर्ट में यह दर्ज किया था कि फास्ट ट्रैक का चुनाव सीजीएफ के मुखिया माइक फेनेल और सीईओ माइक हूपर की सिफारिश पर किया गया। यह चयन बगैर किसी तकनीकी मूल्यांकन के हुआ। इसे प्रतिस्पर्धी कंपनी से ज्यादा दर पर कमीशन दिया गया और यह कंपनी प्रसारण अधिकारों की बिक्री से अपेक्षित राजस्व लाने में असफल रही। इस फैसले से 24.60 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ। लगभग ऐसा ही किस्सा विवादित मार्केटिंग कंपनी स्मैम के चुनाव का है जिस पर प्रायोजक जुटाने की जिम्मेदारी थी। इसे भी सीजीएफ की सिफारिश पर चुना गया और पूरी प्रक्रिया बुरी तरह अपारदर्शी थी। सबसे ऊंची दर पर कमीशन लेने वाली यह कंपनी प्रायोजक जुटाने में असफल रही और अंतत: खेलों से ठीक पहले आयोजकों ने इससे नाता तोड़ लिया। तीसरा मामला बीमा एजेंट मार्श का है, जो सीजीएफ कंसल्टेंट थी। सीजीएफ के ही दबाव सरकार ने आयेाजन के लिए बीमा कवरेज बढ़ाया था। क्वींस बेटर रिले की इवेंट मैनेजर जैक मॉर्टन का चयन में भी सीजीएफ की भूमिका के संकेत हैं। इस कंपनी को दिया गया काम तो घटा दिया गया लेकिन फीस बढ़ गई। एजेंसियां विदेशी कंसल्टेंट चुनने के और मामलों में सीजीएफ की भूमिका तलाश रही हैं।



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