महात्मा गांधी रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के अमल में चौतरफा अंधेरगर्दी ही नजर आती है। अंधेरगर्दी का आलम यह है कि जहां मजदूरों ने काम किया वहां दाम नहीं मिल रहा है और जहां काम हुआ ही नहीं वहां पूरा भुगतान बड़े आराम से हो गया है। जमीनी हकीकत की पड़ताल करने पर पूर्व-मध्य उत्तर प्रदेश के जिलों में इस महत्वाकांक्षी योजना की तस्वीर कुछ यूं नजर आई कि धांधली करने वालों ने सारे कानून ताक पर रख दिये। प्रतापगढ़ जिले के सदर ब्लाक की पूरे भइया ग्राम पंचायत में नहर नहीं है, लेकिन वहां नहर में जमा मिट्टी और बालू की सफाई के लिए 70 हजार रुपये खर्च दिखा दिये गये, तो विक्रांतपुर नाम का कोई मजरा ही नहीं है, लेकिन इसमें खड़ंजा लगाने के नाम पर ढाई लाख रुपये खर्च हो गये। भूमिहीनों के खेतों के समतलीकरण के नाम पर भी खासा धन खर्च दिखाने का खेल तो आम हुआ। कौशांबी में गत वित्तीय वर्ष में 14 करोड़ 37 लाख रुपये नहीं खर्च किए जा सके। बैंकों की उदासीनता के चलते मजदूरों को समय से मजदूरी का भुगतान नहीं किया जाता। इसके चलते मजदूर काम करने से कतरा रहे हैं। संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली के जगतपुर अंतर्गत रामगढ़ में तीन लाख, टाघन में डेढ लाख रुपये मजदूरी बकाया है। जिले के दो सौ गांव में लाखों रुपये मजदूरी बकाया है। हरदोई के टोडरपुर ब्लाक की चठिया ग्राम पंचायत में बिना काम कराये ही ईट भट्ठे को चार लाख का भुगतान कर दिया। जांच में मामले की पुष्टि हुई। सीतापुर के मिश्रिख क्षेत्र के सरवाडीह में बालू खनन के बाद दो तालाबों का एस्टीमेट बनाकर दस लाख रुपये का गबन किया गया। ब्लॉक पहला के मझिया गांव में राज्य वित्त आयोग के पैसे से पक्की सड़क बनवाई गई थी। प्रधान जी ने यह कार्य मनरेगा के तहत दिखाकर धन निकासी करा ली। सुल्तानपुर में दूबेपुर ब्लॉक में तालाब व खड़ंजे के निर्माण में गड़बड़ी व मजदूरी भुगतान न किए जाने की शिकायत है। भुगतान के लिए मजदूरों ने एक माह तक जिला मुख्यालय पर धरना भी दिया था। छत्रपति शाहू जी महाराजनगर जिले के खानापुर गांव के 65 मजदूरों को तकरीबन 75 हजार रुपये मजदूरी नहीं मिली है। अप्रैल 2010 में मजदूरों ने गांवों के तालाब की खोदाई की थी। कागज पर तालाब पूर्ण है, लेकिन हकीकत में अपूर्ण है। गोरखपुर जिले में एक खेत से पहले मिट्टी निकालकर बेच दी और समतलीकरण के नाम पर अब मिट्टी पाटी जा रही है। खोराबार ब्लाक के रायगंज में एक वर्ष पूर्व जिस 74 मीटर लंबे व 55 मीटर चौड़े खेत से मिट्टी निकालकर बेची गयी थी, मनरेगा का धन खर्च करने के लिए अब उसी खेत में मिट्टी पाटी जा रही है। इतना ही नहीं वह खेत भी दूसरे ग्राम पंचायत रामलखना में है।
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