Thursday, January 20, 2011

महंगाई की मूल वजह

लेखक संप्रग सरकार की जनविरोधी नीतियों और भ्रष्टाचार को महंगाई की मुख्य वजह बता रहे हैं...
लखनऊ में महंगाई के संदर्भ में छात्रों के सवालों का जवाब देते हुए प्रतीक्षारत प्रधानमंत्री राहुल गांधी ने जो कहा उससे कम से कम यह निष्कर्ष तो निकलता ही है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति होती तो पिछले कुछ सालों से महंगाई की मार झेल रही जनता को राहत मिल सकती थी। राहुल गांधी ने कहा है कि गठबंधन सरकार के कारण महंगाई को रोक पाना कठिन हुआ। उन्होंने अपनी दादी इंदिरा गांधी के जमाने में महंगाई पर काबू रखने के परिप्रेक्ष्य में यह कहा कि तब एक पार्टी का राज था। राहुल को संभवत: यह पता नहीं है कि इंदिरा गांधी के कार्यकाल में महंगाई और भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे बड़ा जन आंदोलन हुआ था और तब गली-गली में यह नारा गूंजता था-देखो यह इंदिरा का खेल, खा गई राशन, पी गई तेल। वास्तव में भ्रष्टाचार और महंगाई में चोली-दामन का साथ है। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री ने विगत दिसंबर माह तक महंगाई पर पूर्ण काबू पा लेने का दावा किया था, किंतु वस्तुओं की जमाखोरी, कालाबाजारी और महंगाई रुकने का नाम नहीं ले रही। मुद्रास्फीति की वर्तमान दर 8.5 प्रतिशत होने के बावजूद यदि महंगाई की दर 18 प्रतिशत तक पहुंच गई है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? विगत शुक्रवार को महंगाई पर चर्चा करने बैठी मनमोहन सिंह की टीम ने इसके लिए गरीबों के पेट को कसूरवार बताया। सरकार का कहना है कि गरीबों के पास ज्यादा पैसे आने से उनकी खुराक बढ़ गई है। इसलिए खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतें बढ़ रही हैं। सरकार के इस तर्क को मानें तो आय किसकी बढ़ी है? महंगाई की मौजूदा दर को जोड़ दें तो आम आदमी का वेतन स्थिर होने के साथ ही उसकी क्रयशक्ति घटी है। रुपयों में आय बढ़ने का क्या मोल, जब वास्तविक क्रयशक्ति में बढ़ोतरी न हो? आय बढ़ी है तो कुछ हजार लोगों की, जो सत्तातंत्र का हिस्सा हैं और भ्रष्टाचार में लिप्त हैं। अभी प्याज की कीमतें आम आदमी को रुला रही हैं। इससे पहले दाल और चीनी की कीमतों ने आम आदमी को बेदम कर रखा था। पेट्रोल-डीजल की कीमतों को नियंत्रण मुक्त करने के बाद से तेल कंपनियों ने चार बार कीमतें बढ़ाई हैं। पेट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी का बहुआयामी प्रभाव पड़ता है। दूध के दामों में निरंतर वृद्धि समझ से परे है। दुग्ध उत्पादन में चार प्रतिशत की वृद्धि होने के बावजूद पिछले चार सालों में दूध के दामों में सौ प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अगले दो सालों में सौ फीसदी बढ़ोतरी का अंदेशा है। वह दिन दूर नहीं, जब दूध 50 रुपये प्रति लीटर बिकेगा। दिसंबर, 2006 में घी 160 रुपये प्रति किलो उपलब्ध था। आज उसकी कीमत 266 रुपये प्रति किलोग्राम है। दुग्ध उत्पादकों ने चारे की कीमतों में वृद्धि को मूल्यवृद्धि का कारण बताया है। जिस देश के नेता पशुओं का चारा खा जाते हों, वहां इस अतार्किक मूल्यवृद्धि पर आश्चर्य कैसा? उचित भंडारण की व्यवस्था नहीं होने के कारण हर साल लाखों टन अनाज, फल और सब्जियां सड़ जाती हैं। हर साल 58 हजार करोड़ रुपये का अनाज बर्बाद होने की बात स्वयं सरकार ने स्वीकार की है। सर्वोच्च न्यायालय ने इसका संज्ञान लेते हुए सरकार को गरीबों के बीच अनाजों के मुफ्त वितरण का निर्देश दिया था, किंतु सरकार ने हाथ खड़े कर दिए। यह आम आदमी की हितैषी होने का दावा करने वाली कांग्रेसी सरकार की कहानी है। इस सरकार के कार्यकाल में गेहूं, चीनी, दाल और चावल के घोटाले हुए। इस सरकार ने राहत के नाम पर भेजी जाने वाली सहायता में भी घपलेबाजी करने से गुरेज नहीं किया। पंजाब सरकार की आटा-दाल योजना को विफल करने के लिए केंद्र सरकार ने अतिरिक्त खाद्यान्न देने से मना कर दिया था। सरकार के पास पर्याप्त स्टॉक नहीं होने का बहाना किया गया, जबकि केंद्र सरकार तब कथित रूप से दो रुपये किलो की दर से चावल का निर्यात अफ्रीकी देशों को कर रही थी। हकीकत यह है कि यह चावल पीडि़त देशों को न भेजकर विदेशों में अधिक दरों पर बेचा गया। लगभग 2500 करोड़ रुपये इस घोटाले में लिप्त भ्रष्ट राजनेताओं, व्यापारियों और अधिकारियों की जेब में काली कमाई के रूप में गए। पिछले साल चीनी की बेतहाशा बढ़ी कीमतों ने संप्रग सरकार की संवेदनहीनता को ही रेखांकित किया था। सरकार ने जानबूझकर ऐसी नीति बनाई जिससे व्यापारियों को कई गुना मुनाफा हुआ, जबकि बाजार में चीनी महंगी होती गई और किसानों को उचित मूल्य भी नहीं मिला। पिछले साल गन्ने की सामान्य उपज होने के बावजूद सरकार ने 48,000 टन चीनी निर्यात करने का आदेश जारी कर दिया। यह निर्यात 12 रुपए प्रति किलो की दर से किया गया। घरेलू बाजार में किल्लत पैदा होने पर छह महीने के अंदर ही सरकार ने चीनी आयात का फैसला किया। इस बार चीनी का आयात 27 रुपए प्रति किलो की दर से किया गया। सरकारी स्तर पर की गई इस लूटखसोट के कारण ही भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिला है। संप्रग सरकार की दूसरी पारी में घोटालों की झड़ी लग गई। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल, आदर्श सोसाइटी, सत्यम, एलआइसी हाउसिंग घोटाला आदि ऐसे ही घोटाले हैं जिनके कारण राजकोष को लाखों करोड़ का चूना लगा। कैग की रिपोर्ट के अनुसार स्पेक्ट्रम आवंटन में प्रावधानों की अनदेखी किए जाने के कारण एक लाख 76 हजार करोड़ रुपयों की हानि हुई। राष्ट्रमंडल खेलों पर 87 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। खेलों के लिए 2005-06 का केंद्रीय बजट 45.50 करोड़ रुपये था, जो 2009-10 में बढ़कर 2,883 करोड़ रुपये हो गया। यह 6,235 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। बाजार में मुद्रा की आवक अधिक होने के कारण महंगाई बढ़ी है, यह आंशिक सत्य है। यथार्थ में यह मुद्रा भ्रष्टाचार से अर्जित हुई है। सरकार की महत्वाकांक्षी योजना-मनरेगा कांग्रेस शासित राज्यों में भ्रष्टाचार का दूसरा नाम है। इस सरकार ने राजमागरें आदि आधारभूत संरचनाओं की अनदेखी की। परिणामस्वरूप जो कार्य सन 2007 में खत्म होने थे उनका 2012 तक समापन संभव नहीं लगता। एक ओर उत्पादकता कम हो रही है तो मंद गति से काम चलने के कारण लागत बढ़ती जा रही है। भ्रष्ट नेता और ठेकेदार काली कमाई कर रहे हैं। यह कमाई मुद्रा के रूप में बाजार में उपलब्ध सीमित उत्पादन की मांग को बढ़ाती है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में अपनी सफाई में प्रधानमंत्री ने कहा है कि तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने उनके निर्देशों की अनदेखी की। उनकी नाक के नीचे घोटाला होता रहा और वह देखते रहे। वह ऐसी सरकार के प्रमुख हैं जो आकंठ भ्रष्टाचार में लिप्त है। वास्तव में भ्रष्टाचार महंगाई का पर्याय ही है। (लेखक राज्यसभा सांसद हैं)

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