भ्रष्टाचार के मामले में यूपीए सरकार आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना तो दूर उनका बचाव कर रही है, जो गंभीरत चिंता का विषय है। फिर मामला चाहे मुख्य सतर्कता आयुक्त पीजे थामस की नियुक्ति का हो अथवा क्वात्रोच्चि और अब काला धन देश में लाने को लेकर रस्साकसी चल रही है। विदेशों में जमा काले धन के खातेदारों के नाम उजागर करने में सरकार की हिचक समझ से परे है। इससे सरकार की भूमिका को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। अब वह इन पर सफाई देती नजर आ रही है। हमारी शासन और प्रशासनिक व्यवस्था में प्रधानमंत्री से लेकर छोटे से छोटे अधिकारी तक के पास इतने सारे विशेषाधिकार हैं कि उनके सहारे लगभग किसी भी कानून का उल्लंघन संभव है। जमीन के आवंटन को लेकर हर राज्य में हो रहे अरबों रुपये के घोटाले ऐसे ही विशेषाधिकार पर आधारित हैं। जब केंद्र सरकार खुद घपलों और घोटालों में घिरी हो तो वह राज्यों में हो रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई कदम कैसे उठा सकती है। इससे पूरे देश में निराशा का ही माहौल बन रहा है। यह लज्जा की बात है कि सार्वजनिक जीवन में शुचिता और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के मामले में हमारा नंबर नीचे के देशों में है। भ्रष्टाचार को रोकने के लिए अब तक जितने उपाय किए गए हैं वे दिखावटी ही साबित हुए हैं। राजनीति और प्रशासन पर भ्रष्ट तत्वों का ऐसा कब्जा है कि उन्हें जवाबदेह बनाने के सारे उपाय बेकार हो जाते हैं, लेकिन राष्ट्र के लिए सबसे घातक बात यह है कि यूपीए सरकार भ्रष्टाचारियों के खिलाफ ठोस और वास्तविक कार्रवाई करने के बजाय उनका बचाव कर रही है। भ्रष्टाचार के मामले में यूपीए सरकार जिस तरह से अपने दागी आरोपियों का बचाव कर रही है उससे उसकी साख खतरे में है। विदेशी बैंकों में जमा काले धन और केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति के मामले में अदालत में सरकार द्वारा दिए गए तर्को से भी उसकी साख पर बट्टा लगा है। आखिर क्या वजह है कि सरकार विदेशी बैंकों में जमा भारतीय नागरिकों के काले धन की जानकारी देने से हिचक रही है। सरकार का तर्क है कि स्विट्जरलैंड के साथ दोहरे कराधान से बचने की संधि के चलते इस सूचना को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। यह सही है कि विदेशी बैंकों में जमा काले धन की जानकारी प्राप्त करने के लिए सरकार को कर चोरी संबंधी संधि करनी पड़ती है। पर इसका यह अर्थ नहीं है कि सरकार उपलब्ध जानकारियों को ही छिपाए। खासकर नाजायज तरीके से धन जमा करने वालों का नाम उजागर होना ही चाहिए। अदालत ने सरकार से कहा है कि वह विदेशी बैंकों में जमा धन की पूरी जानकारी दे। विदेशी बैंकों में काला धन रखने को न्यायमूर्तियों ने राष्ट्रीय संपदा की चोरी और देश के साथ लूटपाट करार दिया है। यह बड़ी शर्मनाक और दुखद बात है कि सरकार भ्रष्टाचारियों के साथ खड़ी हुई दिखाई दे रही है। कुछ दिन पहले केंद्रीय संचार मंत्री ने 2 जी घोटाले पर कैग की रिपोर्ट को ही निराधार ठहरा दिया था। इस तरह तो सरकार संवैधानिक संस्थाओं को ही नकार रही है। आंकड़ों से यह सिद्ध करना व्यर्थ है कि हम किस तरह के नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। जनता पर भारी कर बोझ बढ़ाए जाने के बावजूद आर्थिक दृष्टि से केंद्र एवं राज्य सरकारें दिवालिया होती जा रही हैं, क्योंकि राजनेताओं और नौकरशाहों के बेलगाम खर्चो और भ्रष्टाचार ने देश को पतन की पराकाष्ठा पर पहुंचा दिया है। बढती गरीबी, असंतुलन, हिंसा, घृणा, जीवन के गिरते हुए मूल्य और जीवन के हर क्षेत्र में घोर अनैतिक व्यवहार निराशा की स्थिति पैदा कर रहे हैं। आर्थिक अपराधी अर्थव्यवस्था को खोखला करते रहें और राज्य व्यवस्था असमर्थ बनी रहे तो इसका अर्थ हुआ लोकतंत्र नहीं, आर्थिक शोषण, भ्रष्टाचार और अपराध का अराजक वातावरण है। अराजकता, नक्सलवाद और आतंकवाद से जूझते इस देश का हर विवेकशील नागरिक चाहता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई हो। आम जनता चाहती है प्रशासकीय व्यवस्था का पूरी तरह से कायाकल्प हो ताकि वह उसके नियंत्रण में आए और राजनीति एवं सरकार में भ्रष्टाचार दूर करने के लिए कड़े कदम उठाए जाएं, लेकिन यूपीए सरकार ने इस दिशा में अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। सरकार की गिरती साख और विश्वसनीयता का संकट आम आदमी को ही नहीं, बल्कि देश के हर विवेकशील व्यक्ति को झकझोर रहा है। पिछले तीन महीने से देश में जो सियासी माहौल बना है, उसने आर्थिक महाशक्ति बनने को अग्रसर भारत की क्षमता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लग रहा है।
निरंकार सिंह, दैनिक जागरण (राष्ट्रीय संस्करण),२५ जनवरी २०११ ,पृष्ठ संख्या ९

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