Sunday, January 30, 2011

फेनेल व हूपर के चहेतों ने भी खूब काटी मलाई


राष्ट्रमंडल खेलों को दागदार बनाने वाले हाथ केवल देशी ही नहीं थे। कॉमनवेल्थ खेल संघ (सीजीएफ) के अध्यक्ष माइक फेनेल और सीईओ माइक हूपर कई मामलों में तो सरकार पर भी भारी पड़े। सीजीएफ के दबाव में सरकार ने केवल एक माह के भीतर ही अपना फैसला बदल कर आयोजन के बीमा कवरेज को पांच गुना बढ़ा दिया। नतीजतन प्रीमियम भुगतान भी बढ़ गया। नियम टूटने की हद तो तब हुई जब बीमा करने का अनुबंध सीजीएफ की कंसल्टेंट और आयोजन समिति के तत्कालीन बीमा ब्रोकर को दे दिया गया। फैसले का फायदा उठाने वाली कंपनी ने बीमा भी किया और मोटा कमीशन भी हजम किया। राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन देशी- विदेशी खेल अधिकारियों और कंपनियों की मनमानी का एक नायाब नमूना बन कर उभर रहा है। जांच एजेंसियों के हाथ इस बात के पुख्ता सबूत लगे हैं कि टीम कलमाड़ी को बात-बात पर नसीहत देने वाले फेनेल व हूपर ने कई बड़े फैसलों को प्रभावित किया था। दैनिक जागरण के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि खेल मंत्रालय की नुमाइंदगी वाले आयोजन समिति एक्जीक्यूटिव बोर्ड ने पूरे आयोजन के लिए केवल 20 मिलियन डॉलर (लगभग 100 करोड़ रुपये) का बीमा मंजूर किया था, लेकिन 2009 अक्टूबर के अंत में हूपर के दबाव में इसे बढ़ाकर 100 मिलियन डॉलर (लगभग 500 करोड़ रुपये) कर दिया। यही वह दौर था जब फेनेल व कलमाड़ी के बीच तनातनी हुई थी और बाद में लंदन में दोनों के बीच गिले-शिकवे दूर किए गए। आयोजन का बीमा किया मे. मार्श ने, जो आयोजकों को अपनी सेवाएं पहले से दे रही थी। बीमा कवरेज का आकार और प्रीमियम बढ़ने का फायदा परोक्ष रूप से इसी कंपनी को मिला है। बीमा करने वाली कंपनी का पहले से कंसल्टेंट व ब्रोकर होना सरकार के गले में फंस रहा है क्योंकि यह नियमों के पूरी तरह खिलाफ है। दस्तावेज बताते हैं कि एक्जीक्यूटिव बोर्ड ने तय किया था कि बीमा देने वाली एजेंसी को कोई कमीशन नहीं दिया जाएगा, लेकिन अंतत: जब आयोजन समिति की ब्रोकर ने ही बीमा करने के लिए चुनी गई तो उसने 15 फीसदी कमीशन भी ले लिया। बीमा के पूरे फैसले पर हूपर किस कदर भारी थे इसकी नजीर यह है कि मई और इसके बाद सितंबर 2009 में दो बार आयोजन समिति के एक्जीक्यूटिव बोर्ड ने बीमा कवरेज केवल 20 मिलियन डॉलर रखने का निर्णय किया था, लेकिन अक्टूबर में अचानक फैसला बदल गया। जांच एजेंसियों ने मे. मार्श के चुनने के फैसले में भी अपारदर्शिता पाई है। तकनीकी मूल्यांकन पूरी तरह साफ सुथरा नहीं था और कंपनी को चुनने वाली बैठक के एक ही तारीख में दो अलग-अलग कार्य विवरण तैयार किए गए।



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