लेखक विदेशी बैंकों में जमा काले धन पर अंतरराष्ट्रीय संधि से बंधे होने को सरकार का बहाना बता रहे हैं...
भ्रष्टाचार के साथ-साथ काले धन पर भी सरकार कठघरे में खड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने काले धन को देश की लूट बताया है। काले धन के लुटेरे न केवल देश के शत्रु हैं, बल्कि आर्थिक आतंकवादी भी हैं। देश में धन की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग कुपोशन के शिकार होकर और इलाज के अभाव में मारे जा रहे हैं अथवा आत्महत्या को विवश हो रहे हैं। अफसोस की बात है कि सरकार इन लुटेरों के साथ खड़ी है और सुप्रीम कोर्ट की बार-बार लताड़ खाने के बाद भी इनके नाम जाहिर नहीं कर रही है। ये आर्थिक आतंकवादी सत्ता के ऊंचे पायदान तक पहंुच रखते हैं इसलिए इनके कारनामों अथवा नामों पर भी कोई शोर नहीं मचता। कभी हमारी संसद में भी इस विषय पर बहस करना मुनासिब नहीं समझा गया। 2009 के आम चुनाव में काले धन की समस्या बड़े मुद्दे के रूप में उभरी। तब जनता से वायदा किया गया था कि चुनाव खत्म होने के बाद गोपनीय स्विस खातों समेत दूसरे बैंकों में जमा काला धन देश में वापस लाया जाएगा, लेकिन नेताओं के तमाम दावों और वायदों के बावजूद आज भी स्थिति जस की तस है। इतना ही नहीं, न तो सरकार की तरफ से यह बताया जा रहा है कि देश का कुल कितना धन विदेशों में जमा है और न ही यह कि इस धन को वापस पाने के लिए सरकार कौन से कदम उठाने जा रही है? इसके उलट सरकार खातेदारों के नाम जनता के सामने न आने देने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि से बंधे होने का गलत बहाना बना रही है। इस संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन खाताधारकों के नाम सरकार को मिले हैं, वे सीधे तौर पर किसी बैंक या सरकार से नहीं, बल्कि एक हैकर के माध्यम से जर्मनी सरकार को और जर्मनी सरकार से भारत और दूसरे कई देशों तक पहुंचे हैं। दरअसल, जर्मनी सरकार ने लिचटेंस्टीन के एलजीटी बैंक में काम करने वाले एक व्यक्ति को 70 लाख डॉलर देकर इस बैंक की सूचनाएं हासिल कीं। उस हैकर ने बैंक में विभिन्न देशों के जमाकर्ताओं के खातों की जानकारी चुरा ली और इसे जर्मनी और बाकी देशों को बेच दिया। बाद में जर्मनी सरकार ने भारत समेत विभिन्न देशों की सरकारों को यह जानकारी मुहैया कराने की पहल की। अन्य संबंधित देशों द्वारा यह जानकारी लेने के बावजूद भारत सरकार ने इन्हें हासिल करने से साफ मना कर दिया। जब यह खबर मीडिया में उछली तो मनमोहन सरकार पर पूरे देश की जनता का दबाव पड़ा, जिस कारण सरकार इन सूचनाओं को लेने के लिए विवश हुई। परंतु सरकार ने एक बार फिर देशवासियों को अंधेरे में रखते हुए और अनिवार्यता न होने के बावजूद जर्मनी और दूसरे टैक्स स्वर्ग देशों के साथ डीटीएए यानी डबल टैक्सेसन अवॉयडेंस एग्रीमेंट या कहें कि दोहरे कराधान वाले समझौते पर पहले हस्ताक्षर किए और फिर हैकर के माध्यम से जर्मनी को मिली सूचना हासिल की। यहां यह सवाल स्वाभाविक है कि जब इन सूचनाओं को लेने के लिए जर्मनी सरकार ने बिना शर्त सरकार को प्रस्ताव दिया था तो सरकार ने दोहरे कराधान वाले समझौते क्यों किए और यदि ये समझौते कर भी लिए तो किसी प्राइवेट हैकर के माध्यम से खाताधारकों के नामों और उनकी धनराशि के बारे में मिली सूचना को देश के सामने सार्वजनिक करना किस तरह गलत हो सकता है। साफ है कि मनमोहन सिंह सरकार की मंशा शुरुआत से ही संदिग्ध नजर आ रही है और अब अंतरराष्ट्रीय संधि का हवाला देकर एक बार फिर देश और अदालत को गुमराह करने का काम किया जा रहा है। यह वास्तविकता को छिपाने और तथ्यों से देश को भरमाने का मामला है। सवाल यह है कि जर्मनी के माध्यम से मिली इस जानकारी के आधार पर जब अन्य देश अपने यहां कार्रवाई कर सकते हैं तो हमारी सरकार इस बारे में कोई ठोस कार्रवाई के बजाय बहाने क्यों बना रही है? हालांकि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दखल और दबाव के बाद खाताधारकों के नाम बंद लिफाफे में अदालत को सौंप दिए हैं, जिन्हें फिलहाल आम जनता के सामने नहीं लाया जा सकता, लेकिन पूरे मामले की बहस के बाद यदि अदालत संतुष्ट होती है तो वह आम जनता को इसकी जानकारी बाद में स्वत: दे सकती है। लेकिन तब तक शायद काफी देर हो चुकी होगी और सरकार से जनता का विश्वास उठ चुका होगा। ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रिटी की रिपोर्ट और मैंने अपने अध्ययन में यह पाया है कि प्राइवेट स्विस बैंक और 76 टैक्स स्वर्ग देशों में भारत के करीब 300 लाख करोड़ रुपये जमा हैं, जिनमें स्विस बैंकों की विभिन्न शाखाओं में जमा करीब 70 लाख करोड़ रुपये शामिल हैं। इसके अलावा प्रतिवर्ष हमारे देश से 20 से 30 लाख करोड़ रुपये हवाला आदि के जरिये बाहर जा रहे हैं, जिसे तत्काल रोके जाने की आवश्यकता है। आज काले धन की समस्या पर समग्रता में विचार करने की आवश्यकता है। इस पर अंकुश लगाने के लिए हमें दीर्घकालिक और अल्पकालिक कदम उठाने होंगे। इन कदमों में खातेदारों के नाम जनता के सामने लाना, उन पर कानूनी कार्रवाई करना तथा काला धन पैदा न होने देने के लिए कानूनी प्रावधान कड़े करने जैसे उपाय अपनाने होंगे। इसके अलावा हवाला जैसे चैनलों पर भी लगाम कसनी होगी। इस दिशा में सरकार ने फेरा कानून की जगह फेमा कानून बनाया है, लेकिन वास्तविकता यही है कि फेमा कानून काफी कमजोर है और फेरा कानून को ही थोड़ा बदलकर लागू किए जाने की आवश्यकता है। नए कानून फेमा के प्रावधान फेरा जितने कड़े नहीं हैं। जिस कारण इसका गलत इस्तेमाल कर अपराधी बच निकल रहे हैं। काले धन की एक बड़ी वजह कैश ट्रांजेक्शन प्रणाली है। यदि हम प्लास्टिक मनी यानी क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड आदि के प्रयोग को बढ़ावा दें और एक हजार व पांच सौ के नोटों का प्रचलन कम कर सकें तो इससे काले धन पर अंकुश लगाने में काफी मदद मिल सकती है। इसी तरह हमें टैक्स सुधार पर भी ध्यान देना होगा, क्योंकि सोने जैसे महंगी धातुओं पर टैक्स एक प्रतिशत है जबकि आवश्यक वस्तुओं पर इससे कई गुना अधिक वैट वसूला जाता है। इसी तरह और भी अनेक विसंगतियां हैं। सरकार में जनहित से जुड़े मुद्दों पर सक्रियता दिखाने की इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है। यदि ऐसा नहीं होता तो आज काले धन को लेकर इतना हायतौबा मचने के बावजूद सरकार सोती नहीं रहती और इन आर्थिक आतंकवादियों की धरपकड़ अथवा रोकथाम करती। (लेखक सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेशक हैं)

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