Friday, January 21, 2011

भ्रष्टाचार पर उद्योग जगत की चिंता


भ्रष्टाचार जैसे मामले में आम तौर पर मुंह न खोलने वाले कॉरपोरेट जगत ने भी अगर इस बार साफ शब्दों में हमारे नेताओं को खुला पत्रलिखा है, तो यह बाकी सभी के लिए तो ध्यान देने की चीज है ही, हमारी राजनीति के लिए भी बहुत गंभीर मामला है। कॉरपोरेट जगत को सिर्फ लाभ की प्रेरणा से काम करने वाला माना जाता है और अकसर हम भ्रष्टाचार की जड़ तलाशते-तलाशते इसी समूह को मुख्य दोषी बताने लगते हैं। ऐसे में अगर देश के 14 प्रमुख उद्यमियों, बैंकरों, पूर्व जजों और आर्थिक नीतियां बनाने में प्रमुख भूमिका निभाने वालों को अपने नेताओं के नाम खुला पत्र लिखकर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने की मांग करनी पड़ी है, तो इसे उनका दुस्साहस भर नहीं मानना चाहिए। यह पानी सिर से ऊपर निकल जाने का प्रमाण है। वरना बड़ी खामोशी और सूझबूझ से अपना काम करने वाले अजीम प्रेमजी, दीपक पारेख, जमशेद गोदरेज, बिमल जालान और पूर्व जस्टिस बीएन श्रीकृष्ण जैसे लोग सामान्यत: सार्वजनिक तौर पर कुछ भी कहने-करने से बचते ही हैं। उनका रिकॉर्ड इतना विलक्षण है कि उनकी अपील का असर जरूर होना चाहिए। पर सबसे समझदारी भरी चीज इस पत्र में दिए पांच सुझाव हैं, जिन पर अमल हो, तो भ्रष्टाचार पर निश्चित रूप से अंकुश लगेगा। मंत्रियों-अधिकारियों का विशेषाधिकार कोटा प्राय: भ्रष्टाचार का कारण बना है। गुलामी वाले पुराने दिनों की या सामंती शासन वाली ऐसी व्यवस्था को चलाने का कोई मतलब नहीं है। यही सुझाव सोनिया गांधी ने भी कांग्रेसी मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों वाले अपने पत्र में दिया है। फिर जांच एजेंसियों को स्वायत्तता देने का सुझाव है-इसे मानना सरकार के लिए मुश्किल होगा, पर भ्रष्टाचार के रिकॉर्ड के मद्देनजर इस पर गंभीरता से सोचना होगा। फिर गठबंधन के दौर में किसी की मतभिन्नता और उसके द्वारा काम में बाधा डालने के बीच फर्क करने का सुझाव है। इस पत्र में विकास का लाभ आम लोगों तक न पहुंचने की बात भी कही गई है और सबको समान अवसर उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है। भ्रष्टाचार की जड़ गैर बराबरी में ही है-ऊपर वाला ज्यादा ऊपर पहुंचने के लिए गलत काम करता है-नीचे वाला जल्दी से उसके बराबर आने के लिए। पत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह है, जिसमें भ्रष्टाचार के असर की चर्चा है-स्पष्ट कहा गया है कि इससे आम आदमी का शासन पर से भरोसा उठने लगा है। यह बात मुल्क में आ रहे विदेशी निवेश में कमी से ठोस रूप में दिखती है-नेताओं और शासन पर विश्वास उठने की परीक्षा तो चुनाव में होती है। पर एक सही मौके पर अपनी तरफ से चेतावनी और सुझाव देकर इस समूह ने अच्छा काम किया है।


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