जो लोग सरकार में हैं, वह नीति निर्धारण नहीं कर रहे हैं। वे यह देख रहे हैं कि पैसा कहां से बनेगा। पैसा बनाने का सबसे आसान तरीका है कि सट्टेबाजों से पैसा लो और उन्हें मनमानी करने दो। मेरा मानना है कि यह हमारे मंत्रियों की एक्टिव मिलीभगत है कि इसे होने दो। इसमें उनका जाती फायदा है। यह कोई सरकार की निष्क्रियता का मामला नहीं है कि सरकार को समझ नहीं आया कि वक्त पर क्या कदम उठाएं या दूसरी चीजों के कारण सरकार ध्यान नहीं दे पाई बल्कि इसमें भ्रष्ट व्यवस्था की सक्रिय भागीदारी है
एकाएक महंगाई बढ़ने के कई कारण हैं। एक तो कुछ चीजों के उत्पादन में कमी आई है, उसका असर तो है। लेकिन जितना बड़ा असर देखने में आ रहा है, वह कमी से होनेवाला असर नहीं है। जब किसी चीज की कमी होती है तो उसका फायदा उठानेवाले भी बहुत होते हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यापारियों का रवैया क्या है और सरकार क्या कदम उठा रही है। आज देश में इतना भ्रष्टाचार है कि जो चाहे मनमानी कर सकता है। इसमें पुलिस, ब्यूरोक्रेसी और स्थानीय नेताओं तक की मिलीभगत होती है। पहले व्यापारियों पर सख्ती होती थी। आज व्यापारियों को लगता है कि हम पकड़े भी गए तो पैसा खिलाकर निकल जाएंगे। दूसरी बात, आज जनता भी दस हजार करोड़ और लाख करोड़ के घोटाले की बात को आसानी से पचा जाती है। तो भ्रष्टाचार हमारे देश का सामान्य चरित्र बन गया है आजकल। दूसरी बात यह है कि कारपोरेट सेक्टर रिटेल के कारोबार में पैसा लगा रहा है और उनके पास होल्डिंग क्षमता बहुत अधिक है। जहां चीजों की कमी नहीं भी है वहां वह उसे रोके रखकर कृत्रिम कमी पैदा कर देते हैं। तो एक तो स्थानीय व्यापारी और दूसरे रिटेल सेक्टर दोनों मिलकर महंगाई बढ़ाने का काम कर रहे हैं। इसमें कारपोरेट सेक्टर को लिंक तो राष्ट्रीय नेताओं से होता है और आजकल वायदा कारोबार में भी कारपोरेट सेक्टर काफी सक्रिय है। वे भ्रष्ट नेताओं की मदद से अपनी बेतहाशा आर्थिक क्षमताओं का बेजा इस्तेमाल करते हुए चीजों की कृत्रिम कमी पैदा कर और सट्टेबाजी द्वारा दाम बढ़ा देते हैं। यह सरकार की 1991 की नीतियां और खासतौर से 2001 की नीतियों का नतीजा है कि जिस तरह से कारपोरेट कंपनियां जमीन, जंगल, नदी, माइिनंग इत्यादि का अधिग्रहण कर रही थीं, वह अब कमोडिटी के कारोबार का भी अधिग्रहण कर रही हैं। पहले के समय से तुलना करें तो आज छोटी सी कमी के कारण जितनी तेजी से दाम बढ़ रहे हैं उतनी तेजी से 70 या 80 के दशक में दाम नहीं बढ़ते थे। दूसरी बात, पहले सरकार के पास दाम को काबू करने के बहुत सारे हथियार थे। सरकार मूल्य निर्धारण करती थी, सार्वजनिक बितरण पण्राली हुआ करती थी तथा दोहरी मूल्य नीति हुआ करती थी। लेकिन आज यह पण्राली ध्वस्त हो चुकी है। आज बाजारीकरण का जमाना है यानी जो बाजार कहे वही ठीक है। लेकिन बाजार में तो सट्टेबाज घुस आते हैं। पिछले दस- पंद्रह सालों में बेतहाशा पैसे कमाए कारपोरेट सेक्टर को आज बाजार में खुला खेलने के लिए छोड़ दिया गया है। वे तो इसी जुगाड़ में रहते हैं कि कितनी जल्दी ज्यादा से ज्यादा लाभ कमाएं। इसके लिए वे वस्तुओं की कृत्रिम कमी पैदा करते हैं। सरकार की नीति प्रबंधन में जो खामी है (इसमें बाजार और कारपोरेट का ही दबदबा है) उसके कारण भी यह समस्या बढ़ गई है। इसमें एक कोण यह भी है कि प्रधानमंत्री बड़े ईमानदार हैं। यह भी एक खतरनाक मामला है। हमारे ईमानदार प्रधानमंत्री सारे घोटाले और भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करते जा रहे हैं तो ऐसी ईमानदारी भला जनता के किस काम की? जनता में यह संदेश जा रहा है कि प्रधानमंत्री बहुत ईमानदार हैं और भ्रष्टाचारियों में यह संदेश जा रहा है कि उनका कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता। चाहे वह त्याग की प्रतिमूर्ति सोनिया गांधी हों या ईमानदार प्रधानमंत्री, वे बस बातें ही करते हैं और कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। बढ़ती महंगाई पूरी तरह से सरकार का खेल है। सरकार ही दाम को बढ़ावा दे रही है। पिछले साल भी हमारे वित्त मंत्री ने कहा कि दाम बढ़ेगें और इस साल भी उन्होंने कहा कि दाम घटने में समय लगेगा। यह एक प्रकार से सट्टेबाजों को सिग्नल देना है। वायदा कारोबारियों को सट्टेबाजी कर दाम बढ़ाने के लिए अब सरकार ही प्रेरित करने लगी है। पिछले साल जब देश में सूखा पड़ा था तो देश के पास उस वक्त मिलियन टन फुड स्टॉक थे जबकि हमें बफर फूड स्टॉक मिलियन टन की ही जरूरत है। तो दोगुना स्टॉक होने के बाबजूद दाम बढ़ गए क्योंकि सरकार ने कंट्रोल नहीं किया। उदाहरण के लिए प्याज की अभी कमी चल रही है लेकिन जैसे ही सरकार ने ट्रेडर्स पर कुछ सख्ती की तो रेट कुछ घट गए। नहीं तो प्याज के दाम आकाश छूने लगे थे। उसके बाद सरकार ने फिर प्याज का आयात करने का कदम उठाया। तो सवाल यह है कि सरकार आज पूर्वानुमान क्यों नहीं करती यह भी एक बड़ी समस्या है। पूर्वानुमान के लिए सरकार के पास कई स्रेत हैं। हमें मौसम के हालात से भी पता चल जाता है कि किस खाद्य पदार्थ का उत्पादन कम होनेवाला है। लेकिन उस हिसाब से सरकार तैयारी नहीं करती। जब सिर पर पहाड़ गिरता है और जनता में हाहाकार मचती है तब सरकार कदम उठाती है। अंतिम क्षण में जब आयात कर चीजों की उपलब्धता सुनिश्चित करती है तो बाहर के देशों में एकाएक रेट बढ़ जाता है। जब सामान महंगे दाम पर आता है तो सरकार कहती है कि सब्सिडी देने के हमारे पास पैसा नहीं है। आज सरकार पहले से कदम इसलिए नहीं उठाती क्योंकि सरकार का ज्यादातार हिस्सा आज भ्रष्ट हो चुका है। जो लोग सरकार में हैं, वह नीति निर्धारण नहीं कर रहे हैं बल्कि वे यह देख रहे हैं कि पैसा कहां से बनेगा। पैसा बनाने का सबसे आसान तरीका है कि सट्टेबाजों से पैसा लो और उन्हें मनमानी करने दो। मेरा मानना है कि यह हमारे मंत्रियों की एक्टिव मिलीभगत है कि इसे होने दो। इसमें उनका जाती फायदा है। यह कोई सरकार की निष्क्रियता का मामला नहीं है कि सरकार को समझ नहीं आया कि वक्त पर क्या कदम उठाएं या दूसरी चीजों के कारण सरकार ध्यान नहीं दे पाई बल्कि इसमें भ्रष्ट व्यवस्था की सक्रिय भागीदारी है। महंगाई में हो रही भयावह वृद्धि विकास की रणनीति से जुड़ा मसला है। इसमें पूंजी का सारा नियंतण्रबहुत थोड़े हाथों में चला जाता है। जो बड़ी पूंजी के मालिक हैं वह सट्टेबाजी करते हैं और उसमें आम आदमी और उनके हितों की कोई भागीदारी नहीं होती। अर्थव्यवस्था में काले धन के बढ़ने का भी महंगाई पर काफी असर होता है। उसकी कड़ी मार आम आदमी पर पड़ती है। हमारे देश में अभी 93 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र है। सिर्फ6-7 प्रतिशत लोग ही संगठित क्षेत्र में काम करते हैं। संगठित क्षेत्र में तो फिर भी मंहगाई बढ़ती है तो तन्ख्वाह बढ़ जाती है। मगर असंगठित क्षेत्र में ऐसा काफी देर से होता है। यहां तक कि सरकार भी न्यूनतम मजदूरी काफी देर से बढ़ाती है। जहां पर सरकार को तुरंत करना चाहिए वहां सरकार करती नहीं है, तो निजी कम्पनियों से क्या अपेक्षा की जाए? इससे देश की बड़ी आबादी पर गहरा असर पड़ता है। 1991 के बाद उपभोक्तावाद के दौर में यह असर और भी बढ़ गया है। आज गरीब से गरीब आदमी भी उपभोग करना चाहता है। भले पेट काटकर ही सही लेकिन वह भी फैशन और दिखावे के दौर में शामिल हो गया है। इसलिए जब खाने-पीने की चीजों के दाम बढ़ते हैं तो उस पर दोहरी मार पड़ती है। इसीलिए इतना विकास होने के बाबजूद देश में कुपोषण की समस्या काफी गंभीर है। 50 प्रतिशत महिलाएं और बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। यह सारी समस्याएं महंगाई से ही जुड़ी हुई हैं। महंगाई के दौरान खरीद क्षमता आम आदमी के हाथ से निकल कर व्यापारियों के हाथ में चली जाती है। महंगाई को रोकने के लिए सबसे बड़ा कदम तो यह उठाना चाहिए कि वायदा कारोबार पर तुरंत रोक लगानी चाहिए। सबसे पहले सरकार को सट्टेबाजी के खिलाफ कड़े कदम उठाना चाहिए। व्यापारियों द्वारा और रिटेल सेक्टर में बड़ी कंपनियों द्वारा की जा रही प्राइवेट स्टॉक होल्डिंग पर अंकुश डालना पड़ेगा,जहां चीजों को दबा दिया जाता है। अभी जब रेड हुआ तो पाया गया कि गोदामों में प्याज भरा है। तो देश में हर स्तर पर घोटाला है। सरकार की फूड ग्रेन स्टॉक की नीति ही गलत है। हमें सार्वजनिक वितरण पण्राली को सुदृढ़ करना होगा। जैसे की मदर डेयरी, नेफैड इत्यादि। खाद्य पदार्थ- सब्जियों इत्यादि की भी सार्वजनिक वितरण पण्राली होनी चाहिए, जिसे सरकार नई आर्थिक नीतियों के आने के बाद से घटाती चली जा रही है क्योंकि इसमें सब्सिडी देनी पड़ती है। लेकिन जब तक अर्थव्यवस्था सही ढर्रे पर नहीं आ जाती, सब्सिडी देने में कोई नुकसान नहीं है। सब्सिडी देकर अनाज, सब्जी इत्यादि मुहैया करवाया जाएगा तो बाजार के दाम पर भी असर पड़ेगा। रोजमर्रा की चीजों में सार्वजनिक वितरण पण्राली को लागू करना चाहिए। लेकिन इसमें एक बड़ी अड़चन यह है कि वहां भी भारी भ्रष्टाचार है। तो सबसे पहले भ्रष्टाचार को काबू करने के लिए सरकार को प्रभावी कदम उठाना चाहिए। नहीं तो कोई भी कदम अप्रभावी ही रहेगा।
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