मानव संसाधन विकास मंत्रालय के साथ-साथ दूरसंचार मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे कपिल सिब्बल ने जिस तरह देश को यह घुट्टी पिलाने की कोशिश की कि 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में ए.राजा पाक-साफ हैं और पौने दो लाख करोड़ रुपये के राजस्व घाटे का आकलन करने वाली संस्था नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) गलत है वह जितनी चौंकाने वाली है उतनी ही हास्यास्पद भी। यदि केंद्र सरकार अपनी और अधिक जगहंसाई नहीं कराना चाहती तो उसे अपने उन नेताओं पर अंकुश लगाना चाहिए जो नित-नए बहानों और विचित्र तर्को के सहारे देश को गुमराह करने की चेष्टा कर रहे हैं। यदि केंद्र सरकार को इसी नतीजे पर पहुंचना था कि सीएजी का आकलन बेबुनियाद है और राजा की कारगुजारी से एक पैसे का भी नुकसान नहीं हुआ तो फिर वह इतने दिनों तक क्या करती रही? क्या कपिल सिब्बल के पहले किसी ने सीएजी की रपट का अध्ययन करने की जरूरत नहीं समझी अथवा कोई उसे समझ नहीं पाया? सवाल यह भी है कि सरकार यह बात उस समय क्यों नहीं कह सकी जब संसद सत्र चल रहा था और विपक्ष की संयुक्त संसदीय समिति की मांग के कारण दोनों सदनों में कोई कामकाज नहीं हो पा रहा था? यदि सरकार सही है तो फिर राजा से त्यागपत्र क्यों लिया गया? सीबीआइ स्पेक्ट्रम आवंटन से जुड़े लोगों के यहां छापेमारी क्यों कर रही है? क्या कारण है कि इस मामले में उच्चतम न्यायालय को भी दखल देना पड़ा? यदि एक क्षण के लिए यह मान लिया जाए कि राजा स्पेक्ट्रम आवंटन की उसी कथित दोषपूर्ण नीति पर चल रहे थे जो राजग सरकार ने तय की थी तो भी यह सवाल उठेगा कि संप्रग सरकार इस नीति को बदलने का साहस क्यों नहीं जुटा सकी? देश यह भी जानना चाहेगा कि संप्रग सरकार राजग शासन की कितनी दोषपूर्ण नीतियों को अपनाए हुए है और क्यों? सीएजी की रपट पर कपिल सिब्बल का बयान इसलिए और अधिक आपत्तिजनक है, क्योंकि वह एक संवैधानिक संस्था पर हमला करने के साथ-साथ एक बड़े घोटाले की जांच प्रभावित करते दिख रहे हैं। आखिर जब यह मामला उच्चतम न्यायालय के साथ-साथ संसद की लोक लेखा समिति के समक्ष भी विचाराधीन है तब फिर किसी केंद्रीय मंत्री के जांच अधिकारी के साथ-साथ न्यायाधीश की भूमिका में आने का क्या मतलब? नि:संदेह यह समझा जा सकता है कि घपले-घोटालों पर लीपापोती करने के गंभीर आरोपों से घिरी केंद्र सरकार को अपना बचाव करना मुश्किल हो रहा है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह दुष्प्रचार को हवा देने लगे। यदि केंद्र सरकार यह समझ रही है कि उल्टे-सीधे बयान देकर वह अपना बचाव करने के साथ-साथ स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच संयुक्त संसदीय समिति से कराने की विपक्ष की मांग को खारिज कर सकती है तो यह संभव नहीं। स्पेक्ट्रम घोटाले को रफा-दफा करने की प्रत्येक कोशिश आम जनता के मन में न केवल और अधिक संदेह पैदा करती है, बल्कि संयुक्त संसदीय समिति के गठन की आवश्यकता को बल प्रदान करती है। यदि स्पेक्ट्रम आवंटन में कहीं कुछ गलत हुआ ही नहीं है, जैसा कि कपिल सिब्बल दावा कर रहे हैं तो फिर कांग्रेस और उसके नेतृत्व वाली सरकार संयुक्त संसदीय समिति के गठन से कन्नी क्यों काट रही है?
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