Sunday, January 9, 2011

भ्रष्टाचार पर अंकुश कैसे लगाएं

आर्थिक घोटालों की जांच के लिए एक राष्ट्रीय आयोग बनाया जाए। जिसके अध्यक्ष का चुनाव विपक्षी दलों, लोकसभा अध्यक्ष और उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की रजामंदी से हो। राज्य स्तर पर यह चयन विपक्षी दलों, विधानसभा अध्यक्ष और उच्च न्यायालय की रजामंदी से होना चाहिए। भ्रष्ट अधिकारियों, सांसदों और मंत्रियों पर मुकदमा चलाने का दायित्व इसी संस्था का हो और इसके लिए उसे किसी की अनुमित न लेनी पड़े
बोफोर्स सौदे में कमीशनखोरी के बाद यह पहला मौका है, जब भ्रष्टाचार एक राष्ट्रीय मुद्दे के रूप में सामने आया है। विनाथ प्रताप सिंह की सरकार पहली सरकार थी जो भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही बनी थी। उन्होंने वादा किया था कि वे भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए कृतसंकल्प हैं। लेकिन अपने पूरे कार्यकाल में उन्होंने इस दावे को पूरा करने के लिए कुछ भी नहीं किया। बीच में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार ने छह साल तक शासन किया, पर बोफोर्स के मामले में उसने भी कुछ नहीं किया। आज फिर बोफोर्स का भूत जाग उठा है और उसे वापस बोतल में भेजने के लिए कांग्रेस की सरकार पूरी कोशिश कर रही है। वाजपेयी सरकार के दौरान भी कई घोटाले सामने आए। यहां तक कि करगिल संघर्ष के दौरान कफन की पेटियों की खरीद में भी घोटाला हुआ, पर किसी को सजा नहीं मिली। इसी तरह, नरसिंह राव के शासन के दौरान राजनीतिक भ्रष्टाचार के अनेक मामले सामने आए, लेकिन संसद तथा न्यायपालिका ने कोई गंभीर कदम नहीं उठाया। लगता है कि भ्रष्टाचार से लड़ने की कोई इच्छाशक्ति भारत के राजनीतिक प्रतिष्ठान में नहीं है। इसीलिए भाजपा द्वारा ए राजा की करतूतों की जांच के लिए जेपीसी गठित करने की जिद सारहीन लगती है। भ्रष्टाचार के मामले में भाजपा का इतिहास कोई अच्छा नहीं रहा है। ताजा उदाहरण कर्नाटक का है। भ्रष्टाचार के असंदिग्ध प्रमाण होने के बावजूद भाजपा नेतृत्व वहां के मुख्यमंत्री को हटा नहीं पाया। दूसरी तरफ, वाममोर्चा शासित राज्यों में भी भ्रष्टाचार एक व्यापक परिघटना बन चुका है। वहां भ्रष्टाचार का कोई बड़ा मामला अभी तक सामने नहीं आया है, लेकिन निचले स्तर पर तमाम कॉमरेड बेईमानी में लिप्त हैं। कांग्रेस का तो आधार ही भ्रष्टाचार की ईटों से बना हुआ है। चूंकि सभी राजनीतिक दल भ्रष्ट हो चुके हैं, इसलिए किसी खास मुद्दे को छोड़कर, जिसका राजनीतिक लाभ लिया जा सकता है, आम तौर पर इस भ्रष्ट व्यवस्था के विरुद्ध कोई ठोस कदम नहीं उठाया जा सकता। यही कारण है कि जब चुनाव के पहले सत्तारूढ़ दल पर भ्रष्ट होने का आरोप लगाया जाता है और वह चुनाव हार जाता है, तो उसके स्थान पर सरकार बनाने वाली पार्टी कभी भी पूर्ववर्ती सरकार के भ्रष्टाचार की जांच नहीं कराती। मान लिया जाता है कि मतदाताओं ने भ्रष्ट लोगों को सत्ता से बाहर कर दिया, यही सजा उनके लिए काफी है। केंद्र में न तो एनडीए की सरकार ने कांग्रेस की पूर्व सरकार की बेईमानियों का पर्दाफाश किया न उसके बाद आने वाली कांग्रेस सरकार ने एनडीए सरकार के भ्रष्टाचार का। इसका मतलब यह हुआ कि सत्ता में आने के बाद प्रत्येक राजनीतिक दल उसके पहले के निजाम के भ्रष्ट कामों को माफ कर देता है। इस नामाकूल परंपरा के चलते सार्वजनिक धन की लूट जारी रहती है। राजा भ्रष्टाचार कांड की जांच संयुक्त संसदीय समिति द्वारा कराने से मनमोहन सिंह की सरकार इसलिए डर रही है कि यह जांच शुरू होने पर जनसाधारण के बीच इस कांड के ब्यौरे लंबे समय तक सुनाई देते रहेंगे। दरअसल, विपक्षी दलों का इरादा भी यही है। अन्यथा किस विपक्षी दल को भ्रष्टाचार को खत्म करने की चिंता है? क्या विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों में भ्रष्टाचार के खिलाफ सतत युद्ध चल रहा है? क्या किसी राज्य में संयुक्त विधायक दल द्वारा भ्रष्टाचार की जांच का नियम बनाया गया है? यदि ऐसा है तो कर्नाटक के मुख्यमंत्री द्वारा जमीन हड़पो कांड की जांच कर्नाटक विधानमंडल द्वारा होनी चाहिए। क्या इसके लिए भाजपा तैयार होगी? दरअसल, भ्रष्टाचार की जांच का मुद्दा बेहद जटिल है। मनमोहन सिंह की सरकार कह रही है कि वह सभी जांच एजेंसियों को मिला कर एक सामूहिक जांच दल बनाने को तैयार है। प्रधानमंत्री भी पब्लिक अकाउंट्स कमिटी (पीएसी) के सामने उपस्थित होने के लिए तैयार हैं। लेकिन इससे क्या होगा? पीएसी ने अभी तक किसी बड़े घोटाले का पर्दाफाश नहीं किया है। जहां तक सरकारी जांच एजेंसियों का सवाल है, वे राजनीतिक भ्रष्टाचार की जांच के लिए पूरी तरह नाकारा साबित हो चुकी हैं। वे सरकारी आकाओं के इशारे पर भरतनाट्यम करती रहती हैं। अगर सरकारी जांच एजेंसियां राजनीतिक दबाव या प्रभाव से मुक्त हो जाएं, तो एक मामूली इंस्पेक्टर भी बड़े-बड़े नौकरशाहों और मंत्रियों की खाट खड़ी कर सकता है। उसे काम करने की आजादी दे कर तो देखिए। दूसरी ओर, संसदीय या विधानमंडलीय जांच का भी कोई भरोसा नहीं है, क्योंकि ऐसी जांच कभी भी राजनीतिक दांवपेंच से मुक्त नहीं हो सकती। बोफोर्स तोपों की खरीद में कमीशन खाने के मामले की जांच एक संयुक्त संसदीय दल द्वारा की गई थी। उसका नतीजा क्या निकला? न किसी को सजा हुई, न किसी से बेईमानी से हासिल किए गए पैसे वसूल किए गए। तो क्या भ्रष्टाचार की जांच का कोई मतलब ही नहीं रह गया है, एक तरह से हां, क्योंकि अब जो भी कहिए या जो भी कीजिए, जनसाधारण में यह विास आने से रहा कि हम भ्रष्टाचार-मुक्ति की दिशा में बढ़ रहे हैं। भ्रष्टाचार तो तभी खत्म होगा, जब वर्तमान राजनीति पूरी की पूरी स्वाहा हो जाए और देश को चलाने के लिए कोई दूसरी राजनीति उभर कर आए। ऐसा होने तक तत्काल दो महत्वपूर्ण कदम उठाए जाने चाहिए। एक, पद के दुरुपयोग और आर्थिक घोटालों की जांच के लिए एक राष्ट्रीय आयोग बनाया जाए। जिसके अध्यक्ष का चुनाव विपक्षी दलों, लोकसभा अध्यक्ष और उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की रजामंदी से हो। राज्य स्तर पर यह चयन विपक्षी दलों, विधानसभा अध्यक्ष और उच्च न्यायालय की रजामंदी से होना चाहिए। भ्रष्ट अधिकारियों, सांसदों और मंत्रियों पर मुकदमा चलाने का दायित्व इसी संस्था का हो और इसके लिए उसे किसी की अनुमित न लेनी पड़े। दूसरी बात यह है कि जिस व्यक्ति, वह चाहे जो हो- मंत्री हो, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री, का दोष साबित हो जाए कि उसके कारण राजकोष की क्षति हुई है, तो उसे न केवल कारावास की सजा हो, बल्कि उससे राजकोष को हुई क्षति के बराबर रकम वसूल की जाए। क्या केंद्र सरकार में हिम्मत है कि वह ऐसे आयोग का गठन करके दिखाए, क्या विपक्षी दलों में यह हिम्मत है कि वे ऐसे आयोग के गठन की मांग करें? फिलहाल यह या ऐसी ही कोई तटस्थ व्यवस्था भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में कारगर हो सकती है। अन्यथा तो अंधेरा गहरा ही होता जाएगा और हम भविष्य में भी एक आत्म-लज्जित देश में रहने को विवश होंगे, जैसे आज हैं।

No comments:

Post a Comment