Saturday, April 30, 2011
कलमाड़ी पर मेहरबान क्यों रहे पीएम
राष्ट्रमंडल खेल में भ्रष्टाचार का मुख्य चेहरा बने सुरेश कलमाड़ी पर जहां शिकंजा कसना शुरू हुआ है वहीं भाजपा ने प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को भी घेरने की कवायद शुरू कर दी है। पार्टी ने प्रधानमंत्री पर कलमाड़ी को खुली छूट देने का आरोप लगाते हुए कहा कि पैसों की बेतहाशा बर्बादी के जिम्मे से वह नहीं बच सकते हैं। उन्हें जवाब देना चाहिए कि मंत्रियों की ओर से लगातार आगाह किए जाने के बाद भी कलमाड़ी को उनका वरद हस्त क्यों मिला हुआ था। राष्ट्रमंडल खेल में अब जबकि धीरे-धीरे पर्दा हटने लगा है, भाजपा ने सीधे प्रधानमंत्री को कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। दैनिक जागरण ने पहले ही कुछ चिट्ठियों का खुलासा किया था जिसमें तत्कालीन खेल मंत्री सुनील दत्त से लेकर मणिशंकर अय्यर तक ने कलमाड़ी को लेकर अपनी आशंकाएं जताई थीं। अय्यर ने तो प्रधानमंत्री से लेकर वित्तमंत्री तक कई पत्र लिखकर आगाह किया था कि कलमाड़ी सरकार को दुधारू गाय की तरह दुह रहे हैं। भाजपा के सचिव किरीट सोमैया ने इस पर सवाल उठाया। शुक्रवार को एक संवाददाता सम्मेलन में उन्होंने भी कुछ दस्तावेजी सबूत देते हुए कहा कि तीन खेल मंत्रियों की ओर से लगातार कलमाड़ी को लेकर सवाल उठाए गए। अय्यर के बाद खेल मंत्री बने एमएस गिल ने भी कलमाड़ी की अध्यक्षता में बनी आयोजन समिति पर प्रश्न चिन्ह लगाया था, लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह ने लगाम लगाने की बजाय उन्हें अतिरिक्त शक्तियां दे दीं। फिर तो यह तय था कि कलमाड़ी की ही चलेगी। सोमैया ने कहा कि अपने आचरण के कारण कलमाड़ी गिरफ्त में हैं तो प्रधानमंत्री पर सवाल उठने वाजिब हैं। पैसों की बर्बादी की जिम्मेदारी भी प्रधानमंत्री पर भी डालते हुए सोमैया ने कहा कि अक्टूबर 2004 में पीएम की अध्यक्षता में हुई बैठक में खेल आयोजन पर 1899 करोड़ रुपये खर्च करने का निर्णय हुआ था, लेकिन बाद में खजाने का मुंह खोल दिया गया जिसका कलमाड़ी समेत कई लोगों ने खूब फायदा उठाया। उन्होंने कहा कि कलमाड़ी सिर्फ चेहरा हैं। पूरे खेल आयोजन में कईयों के हाथ काले हैं। उन सब पर कार्रवाई होनी चाहिए जबकि प्रधानमंत्री को इसका जवाब देना चाहिए कि वह कलमाड़ी पर मेहरबान क्यूं रहे।
Thursday, April 28, 2011
कलमाडी गिरफ्तार
कांग्रेस ने किया निलंबित, विशेष अदालत में पेशी आज
टाइमिंग स्कोरिंग रिजल्ट सिस्टम के लिए स्विस कंपनी को अनाप-शनाप कीमतों पर Rs141 करोड़ में ठेका देने के मामले में किया गया गिरफ्तार
कॉमनवेल्थ गेम्स आयोजन समिति के बर्खास्त प्रमुख सुरेश कलमाडी को सोमवार को केन्द्रीय जांच ब्यूरो ने खेलों संबंधी कुछ ठेके दिए जाने में धोखाधड़ी,जालसाजी और भ्रष्टाचार के आरोपों में गिरफ्तार कर लिया। इस घटनाक्रम के बाद कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निलंबित कर दिया है। हालांकि उन्हें कोई नोटिस नहीं दिया गया है। समझा जाता है कि बेदाग पाए जाने पर उन्हें पार्टी में वापस लिया जा सकता है। कई तरह के विवादों और घोटालों से घिरे नई दिल्ली कॉमववेल्थ गेम्स की समाप्ति के छह महीने बाद सीबीआई ने आखिरकार 66 वर्षीय कलमाडी को अपनी गिरफ्त में ले ही लिया जोकि कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान कई प्रकार की सुर्खियों में रहे थे। उन्हें खेलों के संबंध में टाइमिंग स्कोरिंग रिजल्ट (टीएसआर) सिस्टम के लिए एक निजी स्विस कंपनी को कथित रूप से गैर कानूनी ठेका दिया जिससे सरकारी खजाने को 95 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। सीबीआई मुख्यालय में चार घंटे से अधिक चली पूछताछ के बाद कलमाडी की गिरफ्तारी की घोषणा की गई। दिसम्बर से लेकर अब तक सीबीआई उनसे चार बार पूछताछ कर चुकी है। जांच एजेंसी ने आयोजन समिति के दो अन्य अधिकारियों सुरजीत लाल (उप महानिदेशक-खरीद) तथा एएसवी प्रसाद( संयुक्त महानिदेशक- खेल) को भी इसी मामले में गिरफ्तार किया है। सुबह सीबीआई मुख्यालय पहुंचे कलमाडी को दोपहर बाद करीब साढ़े तीन बजे गिरफ्तार किया गया । एक वरिष्ठ सीबीआई अधिकारी ने यह जानकारी दी। पुणो से सांसद कलमाडी तथा दो अन्य अधिकारियों को सोमवार रात सीबीआई की हिरासत में रखा जाएगा और उन्हें मंगलवार को अदालत में पेश किया जाएगा। सीबीआई ने इस मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 420 की उपधारा 120 बी (साजिश) तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की अन्य संबंधित धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है। सीबीआई के प्रवक्ता धरणी मिश्रा ने संवाददाताओं को बताया,' सीबीआई ने आज कॉमनवेल्थ गेम्स 2010 की आयोजन समिति के तत्कालीन अध्यक्ष को साजिश के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। उन्होंने टीएसआर सिस्टम का ठेका स्विट्जरलैंड स्थित एक निजी कंपनी के पक्ष में दिए जाने के लिए साजिश की ।
पीएसी की नजर में पीएमओ जिम्मेदार
2जी घोटाले की जांच कर रही संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी लपेट लिया है। हालांकि इसके लिए जिम्मेदार प्रधानमंत्री कार्यालय को ठहराया गया है, जिसने न केवल प्रधानमंत्री को गुमराह किया, बल्कि एक तरह से मूक दर्शक बना रहा। समिति ने प्रधानमंत्री की भूमिका पर सवाल खड़े करते हुए कहा है कि उनकी निष्कि्रयता ने ए राजा को मनमाने ढंग से अपने निर्णयों पर आगे बढ़ने की अनुमति दे दी थी। समिति ने तब वित्त मंत्री रहे चिदंबरम को कठघरे में खड़ा किया, लेकिन बाद के वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी की सराहना की है। पीएसी अध्यक्ष डॉ. मुरली मनोहर जोशी ने 270 पृष्ठों वाली मसौदा (ड्राफ्ट) रिपोर्ट सभी सदस्यों के पास भेज दी है। इस रिपोर्ट का सबसे अहम पहलू यह है कि उसने प्रधानमंत्री को भी नहीं बख्शा। समिति ने कहा है कि संचार मंत्री के 3 जनवरी 2008 के पत्र से पता चलता है कि उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से मंत्रालय को अपनी योजना व निर्णयों के मुताबिक आगे बढ़ने की हरी झंडी दे दी थी। साथ ही प्रधानमंत्री को इस मामले में मंत्रालय ने तब जानकारी दी जब इसकी प्रक्रिया पूरी हो गई थी। समिति ने इतने अहम मामले पर भी प्रधानमंत्री के दूरसंचार मंत्रालय से अनौपचारिक रूप से मुद्दा उठाने पर सवाल खड़ा किया है। समिति ने प्रधानमंत्री को गुमराह करने के लिए पीएमओ पर मूक दर्शक बने रहने जैसे करारे प्रहार किए गए हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि उसने इस मामले में अपने को इतना दूर रखा कि ए राजा को मनमानी करने का रास्ता मिल गया। समिति ने कहा है कि पीएमओ को कानून मंत्री के सुझाव की जानकारी थी, फिर भी उसने दूरसंचार मंत्री के विचारों को वरीयता दी और मंत्रियों अधिकार प्राप्त मंत्रिमंडलीय समूह के गठन को कोई तवज्जो नहीं दी। समिति की मसौदा रिपोर्ट में तत्कालीन वित्त मंत्री चिदंबरम को भी मामले की जांच के बजाए उसे समाप्त करवाने की कोशिश के लिए जमकर आड़े हाथ लिया गया है। चिदंबरम को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि उसे यह जानकर गहरा धक्का लगा कि वित्त मंत्री ने अपने नोट में यह स्वीकार किया कि स्पेक्ट्रम की कीमत दुर्लभता व उपयोगिता पर तय होनी चाहिए। उन्होंने इस जनता के पैसे के नुकसान के मामले की जांच के बजाए प्रधानमंत्री से इस मामले को बंद करने की सिफारिश तक कर डाली।समिति ने कैबिनेट सचिवालय की भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी की है। रिपोर्ट में सारे घोटाले के लिए ए राजा को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा है कि उन्होंने प्रधानमंत्री को यह कहकर गुमराह किया कि स्पेक्ट्रम की नीलामी के मुद्दे पर विचार किया गया है, जबकि तथ्य यह है कि दूरसंचार आयोग व ट्राई ने इसकी सिफारिश तक नहीं की थी|
चिदंबरम ने भी नहीं सुनी थी अय्यर की
वर्ष 2007 में खेल मंत्री रहे मणिशंकर अय्यर ने राष्ट्रमंडल खेलों की आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी की मनमानी को लेकर प्रधानमंत्री को शिकायती पत्र भेजने के पहले तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम को भी चिट्ठी लिखी थी, लेकिन वह भी बेअसर रही। यह चिट्ठी बताती है कि कलमाड़ी का रसूख सरकार के नियम-कानूनों पर भारी था। वह सरकार को हिसाब किताब दिए बगैर सीधे वित्त मंत्रालय से खर्च का आदेश जारी करा लेते थे और खेल मंत्रालय को पैसा आवंटित करना पड़ता था। चिट्ठी में अय्यर ने यह अनुरोध किया था कि आयोजन समिति को पैसा आवंटित करने की प्रक्रिया से खेल मंत्रालय को अलग कर दिया जाए। तत्कालीन वित्तमंत्री चिदंबरम को संबोधित यह पत्र 5 दिसंबर 2007 का है। जो सरकार में कलमाड़ी के रसूख का एक बिल्कुल नया चेहरा सामने लाता है। वित्त मंत्रालय ने 2007 में खेल मंत्रालय को आदेश दिया था कि आयोजन समिति को पांच महीने के खर्च के लिए 70.21 करोड़ रुपये आवंटित किए जाएं। बकौल अय्यर, उस आवंटन के औचित्य का कोई ब्योरा खेल मंत्रालय के पास नहीं था। वित्त मंत्रालय का आदेश भी यह नहीं बताता कि आवंटन किस खर्च के लिए किया जाए। गौरलतब है कि आयोजन समिति को खर्च के लिए सरकार से कर्ज मिला था जिसकी किश्तें जारी करने के लिए खेल मंत्रालय अधिकृत था। खेल मंत्रालय को किनारे किए जाने को लेकर अय्यर ने पत्र में लिखा था, बेहतर होगा कि वित्त मंत्रालय आयोजन समिति को सीधे धन का आवंटन करे। आवंटन प्रक्रिया से खेल मंत्रालय को अलग करना ही उचित होगा। वित्त मंत्रालयवित्तीय नियमों के पालन को बेहतर ढंग से जांच सकता है। पत्र बताता है कि आयोजन समिति में अपारदर्शिता का मामला 2007 में मंत्रिसमूह की बैठकों में भी उठा था और हिसाब किताब ठीक करने के लिए एक उप समिति भी बनाई गई, लेकिन कलमाड़ी के सामने वह भी कुछ नहीं कर सकी। दो पेज के पत्र में अय्यर ने लिखा है कि आयोजन समिति आवंटित धन के इस्तेमाल की रिपोर्ट नहंी देती और न ही आय व खर्च की जानकारी दी जाती है। अय्यर लिखते हैं कि आयोजन समिति खेल मंत्रालय को पैसा देने वाली एजेंसी मानती है। कलमाड़ी चाहते हैं कि उन्हें पैसा दे दिया जाए और कोई सवाल न पूछा जाए। शायद सवाल न पूछने का ही यह नतीजा था कि पूरा आयोजन एक बड़े घोटाले पर जाकर खत्म हुआ है|
Wednesday, April 27, 2011
स्विस बैंक में सबसे ज्यादा काला धन भारतीयों का
विदेशी बैंकों में जमा काले धन को लेकर जारी गहमागहमी के बीच विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे ने मंगलवार को इस मुद्दे पर एक सनसनीखेज रहस्योद्घाटन किया। काला धन मसले पर नया विवाद खड़ा करने वाली अपनी टिप्पणी में असांजे ने कहा कि विकिलीक्स द्वारा सार्वजनिक की जाने वाली स्विस बैंक खाताधारकों की सूची में भारतीय नागरिकों के भी नाम हैं, जिसमें कुछ बड़े नाम भी शामिल हो सकते हैं। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि स्विस बैंक में सबसे ज्यादा काला धन भारतीयों का ही जमा है। संप्रग सरकार पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए असांजे ने कहा, सरकार के इस दावे में कोई दम नहीं है कि कालेधन का पता लगाने के तरीके में दोहरा कराधान रोकने संबंधी संधियां अवरोध पैदा कर रही हैं। जूलियन असांजे ने एक अंग्रेजी न्यूज चैनल से बातचीत में कहा, हां, स्विस बैंक संबंधी जानकारी में भारतीयों के नाम भी हैं, जिनका हम पहले ही प्रकाशन कर चुके हैं या करने वाले हैं। मुझे किसी विशिष्ट भारतीय का नाम याद नहीं है जो हमारे आगामी प्रकाशन में होगा, लेकिन मैंने भारतीय नाम पढ़े हैं। खाताधारकों में कुछ बड़े नाम होने के संकेत देते हुए असांजे ने कहा, स्विस बैंकिंग संस्थानों में खाता खोलने के लिए कम से कम 10 लाख डॉलर की जरूरत होती है, जो काफी ज्यादा राशि है और यह आम भारतीय के पास नहीं होती। इस सवाल पर कि क्या नामों का कभी भी खुलासा हो जाएगा, उन्होंने कहा, आपको उम्मीद बिल्कुल नहीं छोड़नी चाहिए। असांजे ने कहा, कालाधन छिपाकर रखने का मुद्दा स्थानीय स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार से भी बदतर है, क्योंकि इसमें धन को देश से बाहर भेज दिया जाता है। ऐसा करने वाले हर बार रुपए को बेचते हैं, नतीजतन देश की मुद्रा का मूल्य कम होता है। इस हस्तांतरण के चलते सभी भारतीयों के लिए सब कुछ महंगा हो जाता है। असांजे ने कहा, कालेधन का पता लगाने के मसले पर भारत के अधिक आक्रामक न होने का कोई कारण नहीं है। दूसरे देशों में जमा कालेधन का पता लगाने के जर्मन सरकार के आक्रामक तरीके की तारीफ करते हुए उन्होंने कहा, भारत को अधिक आक्रामक होना चाहिए क्योंकि ऐसा प्रतीत होता है कि भारत को प्रति व्यक्ति प्राप्त होने वाले कर के मामले में जर्मनी के मुकाबले अधिक नुकसान हो रहा है। असांजे ने आरोप लगाया कि विकीलीक्स के केबलों पर भारत सरकार की प्रतिक्रिया विश्व में बदतर रही और केबलों में क्या है, इस बारे में देश को गुमराह करने की साफ तौर पर कोशिश हुई। उन्होंने भारत सरकार के इन दावों को भी खारिज कर दिया कि कालेधन का पता लगाने के तरीके में दोहरा कराधान रोकने संबंधी संधियां अवरोध पैदा कर रही हैं। असांजे ने कहा, दोहरे कराधान का छिपाकर रखी गई दौलत से कोई लेनादेना नहीं है। इससे छिपा कर रखी गई संपत्ति पर पर्दा नहीं पड़ता। उल्लेखनीय है कि असांजे ने पूर्व में दावा किया था कि उन्हें पूर्व बैंकर रूडॉल्फ एल्मर से बैंक खातों से संबंधी दस्तावेज मिले थे। इनमें अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, ऑस्टि्रया और एशिया के कारोबारी, नेता, कला क्षेत्र के लोग और बहुराष्ट्रीय कंपनियां चलाने वाले लोगों के नाम शामिल हैं|
पीएमओ ने भी छिपाई थी कलमाड़ी की करतूत
राष्ट्रमंडल खेल आयोजन में भ्रष्टाचार की प्रामाणिक जानकारी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास 2007 में ही पहुंच गई थी। यह खुद खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर ने लिखित रूप में दी थी। यह पहला मौका था जब किसी आयोजन के प्रशासनिक इंतजाम व आर्थिक आवंटन के लिए जिम्मेदार केंद्रीय मंत्री ने भ्रष्टाचार की शिकायत प्रधानमंत्री से की और वह भी बड़े बेबाक ढंग से। बावजूद इसके अय्यर की चिट्ठी फाइलों में छिपा दी गई और टीम कलमाड़ी को घोटाले की भरपूर छूट मिल गई। मणिशंकर ने लिखा था, कलमाड़ी खेल मंत्रालय को दुधारु गाय की तरह दुह रहे हैं। उनके लिए किसी नियम कानून का कोई मतलब नहीं हैं। अय्यर का यह सनसनीखेज पत्र दैनिक जागरण के पास है। 25 अक्टूबर 2007 को पीएम को लिखी गई तीन पेज की इस गोपनीय चिट्ठी को शुंगलू समिति ने भी शायद इसलिए छिपा लिया, क्योंकि यह सीधे पीएमओ को सवालों के घेरे में खड़ा करती है। आयोजन समिति की कमान खेल मंत्री सुनील दत्त से छीनकर कलमाड़ी को देने में पीएमओ की भूमिका का खुलासा जागरण पहले ही कर चुका है और वह पत्र भी सामने ला चुका है जिसमें अय्यर ने कहा था कि वह पूरा मामला सोनिया गंाधी तक पहुंचाएंगे। राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन खेल मंत्रालय के तहत था और आयोजन समिति को पैसा भी मंत्रालय के जरिये जाता था कि इसलिए आयोजन में भ्रष्टाचार पर खेल मंत्री की शिकायत से ज्यादा अहम कुछ नहीं था। अय्यर लिखते हैं, मैं आयोजन समिति के अध्यक्ष के भारी खर्च से परेशान हूं। .वह मेरे मंत्रालय को दुधारु गाय मानकर अधिकतम पैसा निकालना चाहते हैं। वह बेसिर पैर के हर खर्च पर मंत्रालय की मुहर चाहते हैं। .वह किसी वित्तीय नियम का पालन नहीं कर रहे हैं। अय्यर ने यह भी लिखा था कि कलमाड़ी खर्चो की मंजूरी के लिए एक्जीक्यूटिव बोर्ड की उप समिति बनाना चाहते हैं ताकि बोर्ड में मौजूद केंद्र सरकार के अधिकारी उनके फैसलों पर सवाल न उठा सकें। यह पत्र अय्यर व कलमाड़ी के बीच हुए विवाद का प्रमाण भी है। क्षुब्ध अय्यर ने अपने पत्र में कहा था कि कलमाड़ी खेल मंत्रालय को कार्टूनों का जमघट बताते हैं। खेल मंत्रालय व आयोजन समिति के बीच कोई तालमेल नहीं है और मंत्रियों की समिति की कोई रचनात्मक भूमिका नहीं है। अय्यर की सिफारिश थी कि आयोजन समिति और एक्जीक्यूटिव बोर्ड का पुनर्गठन करके किसी युवा सांसद को अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजन का मंत्री बनाकर उसे समिति की अध्यक्षता दे दी जाए। इस सिफारिश के बाद अय्यर तो मंत्रालय से विदा हो गए, मगर कलमाड़ी आयोजन समिति में टिके रहे और घोटाले करके ही बाहर निकले|
कलमाड़ी पर चौतरफा कार्रवाई
राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान 107 करोड़ के ठेके में गोलमाल के आरोप में गिरफ्तार किए गए सुरेश कलमाड़ी को दिल्ली की विशेष सीबीआइ अदालत में पेश किया गया। अदालत ने उन्हें आठ दिन के लिए बतौर रिमांड सीबीआइ के हवाले कर दिया। सोमवार को गिरफ्तार होते ही कांग्रेस की ओर से निलंबित किए गए कलमाड़ी को मंगलवार को आनन-फानन में भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष पद से बर्खास्त कर दिया गया। इस पद पर वह पिछले 15 वर्षो से जमे थे। वह खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष पद से पहले ही बर्खास्त किए जा चुके हैं। उन्हें अदालत में पेश होने के पहले एक गुस्साए युवक की चप्पलबाजी का भी शिकार होना पड़ा। भाजपा प्रवक्ता निर्मला सीतारमन ने इस घटना को जायज व स्वाभाविक प्रतिक्रिया बताते हुए कहा कि सरकार अगर घूसखोरी को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाएगी तो जनता का गुस्सा तो फूटेगा। कलमाड़ी के खिलाफ उनके गृहनगर पुणे में भी लोगों का गुस्सा फूटा। यहां कांग्रेसजनों ने पार्टी कार्यालय में लगे उनके चित्र को निकाल फेंका और दफ्तर में तोड़फोड़ की। इस सबके अलावा सीबीआइ ने नई धाराएं लगाकर कलमाड़ी को 90 दिनों तक तिहाड़ जेल में रखने का बंदोबस्त कर दिया। पटियाला हाउस के विशेष सीबीआइ जज तलवंत सिंह की अदालत में मंगलवार दोपहर 2.15 बजे सीबीआइ ने कलमाड़ी, खेल आयोजन समिति के पूर्व संयुक्त महानिदेशक (खेल) एएसवी प्रसाद और आयोजन समिति के पूर्व उप महानिदेशक (व्यवस्था) सुरजीत लाल को पेश किया गया। जांच एजेंसी ने खेल घोटालों में पूर्व में गिरफ्तार किए गए आरोपियों की तरह कलमाड़ी के खिलाफ आपराधिक षडयंत्र, धोखाधड़ी की धारा 120 (बी), 420 और भ्रष्टाचार निरोधक कानून-1988 की धाराएं 13 (1) (डी), 13 (2) तो लगाई ही हैं, तीन नई धाराएं 467, 468 व 471 अलग से जोड़ी हैं। नई धाराएं तिहाड़ जेल में पहले से बंद आयोजन समिति के पूर्व महासचिव ललित भनोट और महानिदेशक वीके वर्मा पर भी बढ़ाई गई हैं। न्यायाधीश ने अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से मुंबई से आए वकीलों के दल की दलीलें सुनीं और फिर सभी आरोपियों को 4 मई तक के लिए सीबीआइ हिरासत में भेज दिया। अदालत ने जांच एजेंसी को हर 48 घंटे बाद कलमाड़ी की स्वास्थ्य जांच कराने, रोजाना शाम 4 से 5 बजे के बीच 40 मिनट तक परिजनों और वकील से मिलने देने तथा घर का खाना मुहैया कराने का निर्देश दिया। सीबीआइ ने कलमाड़ी पर जो नई धाराएं लगाई हैं उनमें सात साल से लेकर उम्र कैद तक की सजा का प्रावधान है। इसके चलते सीबीआइ को आरोप पत्र दाखिल करने के लिए 90 दिनों का समय मिलेगा। राष्ट्रमंडल खेलों के अलग-अलग घोटाले में सीबीआइ ने नवंबर से लेकर फरवरी तक पांच आला अधिकारियों संजय महेंद्रू, टीएस दरबारी, जयचंद्रण, केयूके रेड्डी, प्रवीण बक्शी को गिरफ्तार किया था। इन सभी पर जिन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था उसमें साठ दिनों के अंदर आरोप पत्र दाखिल करना था। सीबीआइ समय पर आरोपपत्र दाखिल नहीं कर सकी और सभी पांचों आरोपियों को जमानत मिल गई थी।
Monday, April 25, 2011
महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के सर्वाधिक मामले
भ्रष्टाचार पर देशभर में छिड़े बवाल की पृष्ठभूमि में यह बात जले पर नमक छिड़कने जैसी हो सकती है कि महाराष्ट्र जैसा बड़ा राज्य भ्रष्टाचार की सीढ़ी में शीर्ष पायदान पर खड़ा है लेकिन वहां दर्ज भ्रष्टाचार के मामलों की संख्या के मुकाबले दोषियों को सजा दिए जाने का प्रतिशत बहुत कम है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े दर्शाते हैं कि वर्ष 2000 से लेकर 2009 के बीच महाराष्ट्र में भ्रष्टाचार के कुल 4566 मामले दर्ज किए गए और उनमें केवल 27 फीसद मामलों में ही आरोपियों पर दोष साबित हो पाए। इन मामलों में राज्य में नौ करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की गई। ब्यूरो के आंकड़ों पर नजर डालें तो यह भी बात सामने आती है कि देश में वर्ष 2000 से लेकर अब तक भ्रष्टाचार के मामलों में साल दर साल इजाफा ही होता जा रहा है। वर्ष 2000 में जहां देश में भ्रष्टाचार के कुल 2943 मामले दर्ज किए गए तो वहीं 2009 में 3683। इन मामलों में 60 फीसद दोष सिद्धि हुई और करीब 60 करोड़ रुपए की संपत्ति जब्त की गई। वर्ष 2000 से लेकर 2009 के दौरान महाराष्ट्र, राजस्थान, उड़ीसा, पंजाब और आंध्र प्रदेश में भ्रष्टाचार के सर्वाधिक क्र मश: 4566, 3770, 2957, 2714 और 2686 मामले दर्ज किए गए। इन राज्यों में भ्रष्टाचारियों को कानून के कठघरे में खड़ा करने की दर हालांकि उत्साहवर्धक नहीं रही। संबंधित राज्यों में इसका प्रतिशत क्र मश: 27, 33, 33, 36 और 58 प्रतिशत रहा । कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जिन पांच राज्यों में भ्रष्टाचार के सर्वाधिक मामले दर्ज किए गए उनमें से केवल आंध्र प्रदेश में अन्य राज्यों के मुकाबले दोषियों को सजा दिए जाने का प्रतिशत सर्वाधिक था। कुछ राज्यों ने भ्रष्टाचारियों से निपटने की इस मुहिम में काफी शानदार प्रदर्शन किया है। ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि झारखंड में भ्रष्टाचार के 225 मामले दर्ज किए गए और भ्रष्टाचारियों को सींखचों के पीछे पहुंचाने की दर 350 फीसद रही तथा 30 लाख की संपत्ति जब्त की गई । भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की दिशा में नगालैंड, लक्षदीप और बिहार ने भी शानदार प्रदर्शन किया। लक्षदीप में जहां सौ फीसदी दोष सिद्धि दर रही तो वहीं बिहार में दोषियों को सजा देने का प्रतिशत 78 फीसद रहा। आंकड़ों से एक उत्साहजनक चलन का भी पता चलता है। वर्ष 2000 में जहां भ्रष्टाचार के मामलों में दोषियों को सजा दिए जाने का प्रतिशत मात्र 20 था जो वर्ष 2009 में बढ़कर 60 फीसदी तक जा पहुंचा।
आरोप-प्रत्यारोप में फंसती भ्रष्टाचार की मुहिम
लोकतंत्र में सुधार की मुहिम त्रासदपूर्ण तरीके से आरोप-प्रत्यारोप का शिकार बन रही है। जन लोकपाल विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए बनी मंत्रियों और सिविल सोसाइटी की दस सदस्यीय कमेटी अपने काम के शुरुआती दौर में ही सीडी विवाद में फंस चुकी है। भ्रष्टाचार से लड़ने की प्रतिबद्धतता को लगातार दोहराने वाली कांग्रेस का दोमुंहापन जहां अन्ना हजारे और उनके सहयोगियो पर बढ़ते हमलों से उजागर हो रहा है तो वहीं अन्ना हजारे के आंदोलन की सफलता पर भी संशय के बादल मंडराने लगे हैं। पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण से जुडे़ सीडी विवाद ने अन्ना हजारे की भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम को एक विवादास्पद आंदोलन में बदल दिया है। हालांकि लोकपाल बिल के लिए बनी संयुक्त मसौदा कमेटी में शांतिभूषण और प्रशांत भूषण कांग्रेस सहित कई लोगों के लिए शुरू से ही परेशानी का कारण रहे हैं। सबसे पहले इस विवाद की शुरुआत बाबा रामदेव से हुई और योग गुरु की प्रतिक्रिया ने मानो कांग्रेस को सॉफ्ट टारगेट मुहैया करा दिया हो। योग गुरु द्वारा खड़ा किया विवाद खत्म भी नहीं हो पाया था कि शांतिभूषण और प्रशांत भूषण राजनेताओं के निशाने पर आ चुके थे। पहले कांग्रेसी महासचिव दिग्विजय सिंह और उसके बाद परमाणु करार पर वोट के बदले नोट वाले प्रकरण से कांग्रेस के चिर सहयोगी बने अमर सिंह अपने चिर परिचित अंदाज में पूरी तरह से मैदान में आ डटे हैं। अन्ना हजारे के आंदोलन से जुडे़ शांतिभूषण और प्रशांत भूषण के विरुद्ध अमर सिंह की सक्रियता परमाणु करार पर उनकी चिंताओं और सक्रियता की याद ताजा कर देती है। लगता है कि अमर सिंह एक बार फिर से कांग्रेस के संकट मोचक की भूमिका में अवतरित हो रहे हैं। अमर सिंह की सक्रियता के अलावा कांग्रेस में लोकतंत्र के एक नए युग का भी मानो सूत्रपात हो चुका है। अन्ना हजारे पर दिग्गी राजा के बढ़ते हमलों और कपिल सिब्बल के गैर जिम्मेदार बयानों पर सवाल उठाए गए तो सदा गंभीर दिखने की कसरत करने वाले कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने बेहद कुटिलता से मुस्कराते हुए कहा कि लोकतंत्र में सबको बोलने की आजादी है। ऐसी मायावी लोकतांत्रिक आजादी से संभवतया कांग्रेस का खुद उसके इतिहास में पहली बार साक्षात्कार हुआ है। इस कुटिल लोकतांत्रिक आजादी पर कांग्रेस अध्यक्ष का मासूम जवाब भी इस नई लोकतांत्रिक आजादी को नई ऊंचाइयां प्रदान कर देता है। अन्ना हजारे द्वारा लिखे गए पत्र के जवाब में सोनिया गांधी ने जहां एक तरफ एनएसी की कोशिशों का हवाला देते हुए एक तरफ भ्रष्टाचार से लड़ने की अपनी प्रतिबद्धताओं को दोहराया है तो दूसरी तरफ अन्ना को आश्वस्त करने की कोशिश भी की है कि वह किसी प्रकार के दुष्प्रचार की मुहिम को समर्थन नहीं करती हैं। लेकिन अब सवाल यह है कि यदि कांग्रेस अध्यक्ष भ्रष्टाचार के खिलाफ इतनी चिंतित एवं प्रतिबद्ध हैं तो अपने सिपहसालारों की जबानी जंग पर लगाम क्यों नहीं लगाती हैं। दरअसल, यह भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम की हवा निकालने की सोची-समझी कांग्रेसी रणनीति है, जो लोकतांत्रिक आजादी के तर्क से ही लोकतंत्र की मजबूती में रुकावट बन रही है। दरअसल, भ्रष्टाचार पर अन्ना हजारे को मिले व्यापक जन समर्थन के बाद कांग्रेस को अपने तथाकथित भ्रष्टाचार विरोध अभियान को रीडिजाइन करने और नए सिरे से अपनी रणनीति तैयार की जरूरत आ गई थी और इस नई रणनीति की धमक सिविल सोसाइटी के सदस्यों पर हमले के रूप में दिखाई पड़ रही है। कांग्रेस की यह त्रिआयामी रणनीति बेहद दिलचस्प है और स्पष्ट भी। वास्तव में हमेशा की तरह हर अच्छे काम और अभियान के लिए गांधी परिवार को श्रेय देना इस कांग्रेसी रणनीति का केंद्रीय मुद्दा है। यही चपलता कांग्रेस के इन नीति नियंताओं ने आरटीआइ और ग्रामीण रोजगार योजना के क्रियान्वयन को लेकर दिखाई, जबकि इन दोनों प्रगतिशील कानूनों में विभिन्न सामाजिक कार्यकर्ताओं और संप्रग-1 को समर्थन करने वाले वामपंथ की अहम भूमिका रही है। भारतीय राजनीति के एक प्रगतिशील हिस्से द्वारा तैयार इन कानूनों पर जो रणनीति अपनाई गई, उसी रणनीति पर कांग्रेस अबकी बार भी काम कर रही थी। परंतु अन्ना हजारे और कथित सिविल सोसाइटी ने कांग्रेस के खेल को पूरी तरह बिगाड़ कर रख दिया। यदि पांच राज्यों के चुनाव का दबाव कांग्रेस पर नहीं होता तो संभवतया इस मामले से निपटने के लिए कांग्रेस किसी दूसरी रणनीति पर काम करती। कांग्रेस की इस त्रिआयामी रणनीति में सबसे पहले मिस्टर क्लीन के रूप में प्रधानमंत्री और उनकी मोहिनी छवि है तो दूसरी बाहरी एवं भीतरी राजनीतिक आक्रमण के लिए दिग्विजयी और अमर सिंह की जोड़ी है। तीसरी और आखिरी इन सबसे ऊपर गांधी परिवार की अंतिम निर्णय करने वाली भूमिका है। असल में गांधी परिवार में कांग्रेस ने एक गॉड फैक्टर को प्रत्यारोपित किया है, जिसके कारण गांधी परिवार विशेषतया कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को आरोप-प्रत्यारोप से अलग ऐसी भूमिका सौंपी है, जो प्रत्येक अंतिम एवं अकाट्य निर्णय लेती हैं। यही भूमिका कांग्रेस को सारे सकारात्मक निर्णयों का श्रेय लेने की जमीन बनाती है। अब इस काम में जाने-अनजाने अन्ना हजारे ने भी कदम आगे बढ़ाया है। जब दिग्विजय सिंह और कपिल सिब्बल ने अन्ना हजारे और उनके आंदोलन पर हमला तेज किया तो अन्ना ने सोनिया गांधी को शिकायती पत्र लिखकर मामले में दखल देकर सुलह की अपील की। यही इस नए दौर के गांधी की त्रासदी है कि उससे भी बड़ा कोई गांधी देश में है, जिसे पत्र लिखकर गुहार करते हुए उसे इस गांधी ने अपने नेता के रूप में स्थापित करके अंतिम श्रेय का रास्ता दे दिया है। अब दूसरी तरफ अन्ना की मुहिम पर विवाद गहराता जा रहा है तो अन्ना हजारे के तल्ख सुरों में बदलाव आ रहा है। कल तक देश की राजनीति को कलुषित घोषित करते हुए पूरी राजनीति को खारिज करने वाले अन्ना अचानक संसद के प्रति सम्मान जाहिर करते हुए संसद के निर्णय को स्वीकार करने लेने की बात कहने लगे हैं। इसके अलावा भी अन्ना के आंदोलन और उनके विचारों के विरोधभास भी जग जाहिर हो रहे हैं। नरेंद्र मोदी पर विवादास्पद बयान देकर जहां अन्ना ने सिविल सोसाइटी में अपना एक विरोधी तबका तैयार कर लिया है तो वहीं राज ठाकरे से उनकी नजदीकियां भी उनके विरोधी तबके का आकार बढ़ाएंगी। खासतौर पर हिंदीभाषी राज्यों में। वहीं पुणे के एक गैर सरकारी संगठन ने अन्ना हजारे के ट्रस्ट हिंद स्वराज की अनियमितताओं के खिलाफ याचिका दायर की है तो अंग्रेजी की एक पत्रिका ने अन्ना के गांव में लागू उनके निरंकुश नियमों पर सवाल खडे़ किए हैं। वास्तव में पूरी राजनीति को खारिज करने के अन्ना हजारे के बयान ने तमाम राजनीतिक हलकों में उनके आंदोलन के विरुद्ध एक स्वाभाविक माहौल तैयार कर दिया है। लेकिन वास्तविकता यह है कि खराब राजनीति का विकल्प कोई बेहतर राजनीति ही हो सकती है। राजनीति की केवल आलोचना करने वाली सिविल सोसाइटी बगैर राजनीति में पदार्पण के कोई विकल्प नहीं दे सकती है। इसके अलावा भारतीय राजनेताओं को भी समझना होगा कि यह सिविल सोसाइटी कोई राशन की लाइन में खडे़ गरीबों, सड़क पर सोते बेघरों या किसानों का प्रतिनिधित्व नहीं करती है और न ही इसका नेतृत्व किसी अधनंगे फकीर नुमा महात्मा के पास है। तमाम साधन संपन्न इस कथित सिविल सोसाइटी का भी एक वर्ग चरित्र है, जो आज देश की सत्ता और संसाधनों में अपनी हिस्सेदारी चाहता है। अब इन वास्तविकताओं को समझकर ही यदि अन्ना हजारे और उनके सहयोगी अपनी अगली रणनीति तैयार करते हैं तो ही किसी बेहतर एवं तार्किक लोकपाल कानून बनवाने में कामयाब हो पाएंगे। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं).
सामाजिक योजनाओं में भ्रष्टाचार के दीमक चाट गए सपने
महामाया गरीब आर्थिक मदद योजना के सहारे प्रदेश में गरीबों ने जो ख्वाब बुने, उन्हें बिखरने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। पात्र होने के लाख सबूत भी दिल नहीं पिघला पाए। विभिन्न जिलों में उभरी तस्वीरों से यह साफ है कि सरकार के चाहने से क्या होगा, जब तक कर्मचारी न चाहें। मेरठ मंडल में महामाया आर्थिक मदद योजना के अंतर्गत पहले चरण के सत्यापन में 606 परिवार फर्जी निकले। मेरठ में 252715 गरीब परिवार चिन्हित हुए, जिसमें शहरी क्षेत्र के परिवार 114395 हैं। इनमें से कुल 16276 को ही यह लाभ दिया जा रहा है। सहारनपुर मंडल में यह योजना गरीबों के ख्वाब को साकार नहीं कर पाई। मुरादाबाद मंडल में मुरादाबाद से 54500, जेपीनगर में 21701, बिजनौर से 87506 व रामपुर से 36897 लाभार्थियों के नामों की सूची संबंधित जिलाधिकारियों ने शासन को भेजी। खाता खुलवाने के दौरान पता चला कि कई लाभार्थियों फर्जी हैं और कई ने अपने नाम दो-तीन स्थानों से दर्ज कराए हैं। फर्जी नाम काटने के बाद जेपीनगर में 18687, बिजनौर में 70347, मुरादाबाद में 47300 व रामपुर में 25012 लाभार्थी ही रह गए थे। बरेली मंडल मुख्यालय में ही पहले चरण में 27 हजार लोग लाभान्वित हुए। दूसरे चरण में सिर्फ नौ हजार लोगों को पैसा मिला। बदायूं में चयनित 52 हजार लाभार्थियों को पेंशन की पहली किश्त मिल चुकी है। पहले चक्र में जिले में 70 हजार लोगों का सर्वे कराया गया था। शिकायतें मिलने के बाद दोबारा सर्वे हुआ तो 52 हजार का चयन कर किया गया। अलीगढ़ मंडल के गरीबों के साथ खूब छलावा हुआ। शासन ने 36,595 गरीबों का लक्ष्य तय किया था। इनके सर्वे में 12 हजार अपात्रों के नाम शामिल कर दिए। सरकारी सेवाओं में कार्यरत लोग भी इसमें शामिल थे। 44 गांवों और 56 वार्डो को गरीब विहीन बता दिया गया। पुन: जांच हुई तो असलियत सामने आई। फर्जीवाड़े की गूंज लखनऊ तक पहुंची तो लाभार्थियों की संख्या 36 हजार से घटाकर 24500 कर दी। आगरा मंडल के आगरा, फीरोजाबाद, मथुरा और मैनपुरी जिलों में कुल 1416.25 लाख रुपये की धनराशि उपलब्ध कराई गई थी। शासन स्तर से सख्ती होने पर आनन-फानन में लाभार्थियों का चयन हुआ और धड़ाधड़ खाता नंबरों की फीडिंग कर धनराशि भेजने की कागजी कार्रवाई पूरी कर ली गई। मैनपुरी को छोड़ अन्य जिलों ने मार्च में ही लक्ष्य को सौ फीसदी दर्शा दिया। सूत्रों के मुताबिक आगरा में करीब 12 प्रतिशत, फीरोजाबाद में 18 प्रतिशत और मथुरा में लगभग 30 प्रतिशत खाता नंबर गलत फीड किए गए थे। ऐसे में बैंकों ने धन वापस कर दिया।लखनऊ नगर निगम की ओर से भेजी गई पात्र सूची में दलालों ने सैकड़ों नाम गायब कर फर्जी नाम जोड़ समाज कल्याण विभाग को भेज दिये। गोरखपुर, वाराणसी आदि मंडलों की भी कमोवेश यही तस्वीर है। सच यह है कि हजारों लोग अर्जी डालकर चार सौ रुपये मासिक के लिए एक साल से मदद की आस में हैं। विभागीय आंकड़ों में तो सब कुछ ठीक ठाक है।
Subscribe to:
Comments (Atom)
