100 रुपए में होने वाला एक्सरे शताब्दी अस्पताल में 400 रु
लखनऊ। केस..1 कुशीनगर निवासी जितेन्द्र चार माह पहले चिविवि में पैर का ऑपरेशन हुआ था लेकिन गुरुवार को जब मरीज का फॉलोअप में आया तो डॉक्टर चिविवि में नहीं थे। जिसके बाद उसे एक रुपए के पर्चे के बजाए 350 रुपए फीस देकर में शताब्दी अस्पताल में दिखाना पड़ा।
केस.. 2 रायबरेली निवासी प्रतिमा गुरुवार क्वीनमैरी में अपनी डॉक्टर को ओपीडी में दिखाने पहुंची। काफी देर डॉक्टर से न मिलने के बाद एक गार्ड ने प्रतिमा को बताया कि डॉक्टर साहिबा शताब्दी अस्पताल में है। वहीं जाकर मिलो डॉक्टर ने अपने मरीजों को वहीं देखना शुरु किया है।
यह तो उदाहरण मात्र है। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। आज तक गरीबों को आसानी से मिलने वाले चिकित्सकों को तलाशने के लिए शताब्दी अस्पताल तक का सफर तय करना पड़ रहा है। शताब्दी अस्पताल उच्च वर्गीय मरीजों के लिए खोला गया था लेकिन प्रशासन गरीबों का ही शोषण करने में लग गया है।
कुशीनगर निवासी राम ने बताया कि उनके पुत्र जितेन्द्र (35) ने बताया कि सड़क दुर्घटना में उसके पैर की नस कट गई थी। जिसके बाद प्लास्टिक सर्जरी विभाग में 25 अक्टूबर को ऑपरेशन हुआ। डॉक्टर ने फॉलोअप के लिए 26 जनवरी को बुलाया था उस दिन अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि छुट्टी थी। सोचा कि 27 को डॉक्टर को दिखा देगें और रात काटने के लिए रैन बसेरे में रुक गए। 27 को ओपीडी में पुहंचे तो पता चला कि डॉक्टर शीतकालीन की छुट्टी पर गए हैं। विभाग के गार्डो ने बताया कि डॉक्टर साहब फरवरी में मिलेंगे। जिसके बाद वापस कुशीनगर चले गए। आज दोबारा ओपीडी में आए तो पता चला कि डॉक्टर साहब शताब्दी अस्पताल में बैठे हैं। विभाग के कर्मचारियों ने बताया कि डॉक्टर साहब ने कहा है कि यहां आने वाले सारे मरीजों को शताब्दी अस्पताल में भेज देना। राम ने बताया कि जितेन्द्र के पैर में चोट के कारण चिविवि की ओपीडी से रिक्शा करके शताब्दी अस्पताल पहुंचे। वहां पता चला कि डॉक्टर को दिखाने के लिए 50 रुपए रजिस्ट्रेशन फीस और 300 रुपए देने पड़ेंगे। उन्होंने बताया कि उनके पास कुशीनगर जाने के लिए जेब में सात सौ रुपए ही पड़े थे लेकिन दिखाना भी जरुरी था इसलिए 350 रुपए देकर दिखाया। जिसके बाद डॉक्टर ने एक्सरे करवाने को लिख दिया। जिसके वहां उन्हें चार सौ रुपए देने पड़े और मरीज को फिर से रिक्शे से चिविवि तक ले जाना पड़ा। पहले चिविवि में मात्र सौ रुपए में ही एक्सरे हो जाता था। एक्सरे करवाने के बाद फिर से शताब्दी पहुंचे तो डॉक्टर साहब ने एक माह की दवा लिखी। जिसे लेने के लिए चिविवि के मेडिकल स्टोर पर फिर से जाना पड़ा। अभी तक डॉक्टर को दिखाने के लिए एक रुपए का पर्चा बनवाना पड़ता था। इस समस्या का सामना ज्यादातर मरीजों को करना पड़ रहा है।
चिविवि में आने वाले मरीज दूर दराज इलाकों से आते हैं। अभी तक सभी को डॉक्टरों के शताब्दी अस्पताल में बैठने का दिन नहीं पता है। जिसके कारण वह डॉक्टर को चिविवि में तलाशते हैं लेकिन वहां न मिलने पर उन्हें शताब्दी अस्पताल की राह दिखा दी जाती है। कुलपति प्रो. सरोज चूड़ामणि गोपाल ने बताया कि गरीब मरीजों को महंगे अस्पताल में दिखाने के लिए बाधित नहीं किया जा रहा है। अगर कोई अपने आप ही चला जाए तो क्या करें।
लखनऊ। केस..1 कुशीनगर निवासी जितेन्द्र चार माह पहले चिविवि में पैर का ऑपरेशन हुआ था लेकिन गुरुवार को जब मरीज का फॉलोअप में आया तो डॉक्टर चिविवि में नहीं थे। जिसके बाद उसे एक रुपए के पर्चे के बजाए 350 रुपए फीस देकर में शताब्दी अस्पताल में दिखाना पड़ा।
केस.. 2 रायबरेली निवासी प्रतिमा गुरुवार क्वीनमैरी में अपनी डॉक्टर को ओपीडी में दिखाने पहुंची। काफी देर डॉक्टर से न मिलने के बाद एक गार्ड ने प्रतिमा को बताया कि डॉक्टर साहिबा शताब्दी अस्पताल में है। वहीं जाकर मिलो डॉक्टर ने अपने मरीजों को वहीं देखना शुरु किया है।
यह तो उदाहरण मात्र है। यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। आज तक गरीबों को आसानी से मिलने वाले चिकित्सकों को तलाशने के लिए शताब्दी अस्पताल तक का सफर तय करना पड़ रहा है। शताब्दी अस्पताल उच्च वर्गीय मरीजों के लिए खोला गया था लेकिन प्रशासन गरीबों का ही शोषण करने में लग गया है।
कुशीनगर निवासी राम ने बताया कि उनके पुत्र जितेन्द्र (35) ने बताया कि सड़क दुर्घटना में उसके पैर की नस कट गई थी। जिसके बाद प्लास्टिक सर्जरी विभाग में 25 अक्टूबर को ऑपरेशन हुआ। डॉक्टर ने फॉलोअप के लिए 26 जनवरी को बुलाया था उस दिन अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि छुट्टी थी। सोचा कि 27 को डॉक्टर को दिखा देगें और रात काटने के लिए रैन बसेरे में रुक गए। 27 को ओपीडी में पुहंचे तो पता चला कि डॉक्टर शीतकालीन की छुट्टी पर गए हैं। विभाग के गार्डो ने बताया कि डॉक्टर साहब फरवरी में मिलेंगे। जिसके बाद वापस कुशीनगर चले गए। आज दोबारा ओपीडी में आए तो पता चला कि डॉक्टर साहब शताब्दी अस्पताल में बैठे हैं। विभाग के कर्मचारियों ने बताया कि डॉक्टर साहब ने कहा है कि यहां आने वाले सारे मरीजों को शताब्दी अस्पताल में भेज देना। राम ने बताया कि जितेन्द्र के पैर में चोट के कारण चिविवि की ओपीडी से रिक्शा करके शताब्दी अस्पताल पहुंचे। वहां पता चला कि डॉक्टर को दिखाने के लिए 50 रुपए रजिस्ट्रेशन फीस और 300 रुपए देने पड़ेंगे। उन्होंने बताया कि उनके पास कुशीनगर जाने के लिए जेब में सात सौ रुपए ही पड़े थे लेकिन दिखाना भी जरुरी था इसलिए 350 रुपए देकर दिखाया। जिसके बाद डॉक्टर ने एक्सरे करवाने को लिख दिया। जिसके वहां उन्हें चार सौ रुपए देने पड़े और मरीज को फिर से रिक्शे से चिविवि तक ले जाना पड़ा। पहले चिविवि में मात्र सौ रुपए में ही एक्सरे हो जाता था। एक्सरे करवाने के बाद फिर से शताब्दी पहुंचे तो डॉक्टर साहब ने एक माह की दवा लिखी। जिसे लेने के लिए चिविवि के मेडिकल स्टोर पर फिर से जाना पड़ा। अभी तक डॉक्टर को दिखाने के लिए एक रुपए का पर्चा बनवाना पड़ता था। इस समस्या का सामना ज्यादातर मरीजों को करना पड़ रहा है।
चिविवि में आने वाले मरीज दूर दराज इलाकों से आते हैं। अभी तक सभी को डॉक्टरों के शताब्दी अस्पताल में बैठने का दिन नहीं पता है। जिसके कारण वह डॉक्टर को चिविवि में तलाशते हैं लेकिन वहां न मिलने पर उन्हें शताब्दी अस्पताल की राह दिखा दी जाती है। कुलपति प्रो. सरोज चूड़ामणि गोपाल ने बताया कि गरीब मरीजों को महंगे अस्पताल में दिखाने के लिए बाधित नहीं किया जा रहा है। अगर कोई अपने आप ही चला जाए तो क्या करें।

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