Friday, February 4, 2011

बहुत गहरी हैं उत्तर प्रदेश में एयरपोर्ट घोटाले की जड़ें


लखनऊ तथा वाराणसी एयरपोर्ट रनवे घोटाले की जड़ें बहुत गहरी हैं। इस घोटाले में कई बड़े नप सकते हैं। जैसे जैसे जांच की गति तेज हो रही है, वैसे-वैसे प्रभावशाली लोगों की कलई खुल रही है। फिलहाल सीबीआइ सबूत और तथ्य जुटाने में लगी है। सीमेंट की कीमतों में वृद्धि दिखा करीब 12 करोड़ रुपये का घोटाला किया गया है। उल्लेखनीय है कि सीबीआइ ने वाराणसी एयरपोर्ट मामले को छह जनवरी को पंजीकृत करने के बाद प्रारम्भिक जांच शुरू की। सूत्रों के मुताबिक प्रोजेक्ट में 15 मई 2008 को 23.66 करोड़ का टेंडर खोला गया। मई 2008 में चार हजार रुपये प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से सीमेंट का भाव था, लेकिन 5611 रुपये प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से टेंडर स्वीकार किया गया और कीमतों में हेरफेर करके 1.93 करोड़ का गोलमाल किया गया। इसके पहले सीबीआइ ने वर्ष 2010 की शुरूआत में लखनऊ एयरपोर्ट रनवे घोटाले की प्रारम्भिक जांच शुरू की। लंबी छानबीन के बाद सीबीआइ ने पाया कि लखनऊ एयरपोर्ट पर रनवे की 39 करोड़ की परियोजना के लिए 17 अगस्त 07 को टेंडर डाले गए। करोड़ों की कमाई के लिए सीमेंट की कीमतों में खेल किया गया। तब सीमेंट की 4009 रुपये प्रति मीट्रिक टन की खरीद को बढ़ाकर 5680 रुपये प्रति मीट्रिक टन से टेंडर स्वीकार किया गया। उस समय बड़ौदा एयरपोर्ट पर निर्माण कार्य में 3810 रुपये मीट्रिक टन की दर से सीमेंट की खरीद हुई थी और तब भारत सरकार के होल सेल प्राइज इण्डेक्स में सीमेंट की दर 3700 रुपये प्रति मीट्रिक टन थी। लखनऊ एयरपोर्ट पर इंटीग्रेटेड टर्मिनल बिल्डिंग प्रोजेक्ट में भी सितम्बर 2007 को मैनेज्ड टेंडर डाले गये और 56800 रुपये मीट्रिक टन की दर से निविदा टेंडर से निविदा स्वीकार की गयी। सीबीआइ की टीम ने जांच के दौरान यह पाया कि गड़बड़झाला में एयरपोर्ट अथारिटी के मैनेजर इंजीनियर पीके जैन, अलोकेश विश्र्वास और सीनियर मैनेजर अनुपम वर्मा की भूमिका है। सीबीआइ ने 17 अक्टूबर 2010 को इनके खिलाफ मुकदमा पंजीकृत किया।


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