Friday, February 18, 2011

अंतरिक्ष प्रशासन की प्राइवेट कंपनी जैसी है एंट्रिक्स


अंतरिक्ष आयोग, अंतरिक्ष विभाग और इसरो सहित पूरा अंतरिक्ष प्रशासन अपारदर्शी कामकाज में किसी भी सरकारी एजेंसी से होड़ कर सकता है। एंट्रिक्स अनोखी सरकारी कंपनी है जो 18 साल से संचालन नियमों के बगैर चल रही है। अंतरिक्ष सचिव (जो इसरो व अंतरिक्ष आयोग के मुखिया भी हैं) सहित अंतरिक्ष विभाग के तमाम बड़े अधिकारी अंशकालिक तौर पर एंट्रिक्स के निदेशक हैं। कंपनी के निदेशक मंडल में रतन टाटा और आदि गोदरेज की मौजूदगी से पता नहीं कितनी पारदर्शिता आई, लेकिन यह जरुर है कि एंट्रिक्स से रियायत पाने वाली कंपनियों में टाटा समूह की कंपनी टाटा स्काई भी है। टाटा स्काई को एंट्रिक्स से 2004 में अपारदर्शी ढंग से बिन मांगी रियायत मिली। 12 ट्रांसपोंडर का लीज अनुबंध होने के बाद टाटा स्काई के लिए लीज दर घटा दी गई, जिससे सरकार को हर साल 4.8 करोड़ का नुकसान हुआ। एंट्रिक्स का पूरा ढांचा इसका प्रमाण है कि एंट्रिक्स-देवास करार अंतरिक्ष प्रशासन के हर बड़े अधिकारी की जानकारी में था। इसलिए छह साल तक उस पर पर्दा पड़ा रहा और खुलासे के बाद उसे तत्काल रद करना पड़ा। अगर फाइलों में बंद यह घोटाला न खुलता तो इसरो के अध्यक्ष, अंतरिक्ष सचिव और अंतरिक्ष आयोग के चेयरमेन के.राधाकृष्णन शायद इस सरकारी उपक्रम के पुनर्गठन की घोषणा न करते। प्रधानमंत्री के मातहत अंतरिक्ष प्रशासन में विभाग व संस्थाएं भले अलग-अलग हों, मगर नीति निर्धारण, उपग्रह संचालन और अंतरिक्ष सेवाओं की मार्केटिंग आला अधिकारियों की एक ही टीम के हाथ में हैं। दैनिक जागरण के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि इस अपारदर्शिता की जानकारी सरकार को वर्षो से है, लेकिन एंट्रिक्स नियम-कानून वाली सरकारी कंपनी नहीं बन सकी। एंट्रिक्स के संचालन, निवेश और नियुक्तियों के नियम अब तक नहीं बने है। सरकारी दस्तावेजों में एंट्रिक्स अंतरिक्ष विभाग की कांट्रैक्ट मैनेजर है यानी ट्रांसपोंडर के वाणिज्यिक इस्तेमाल अनुबंधों का प्रबंधन करती है, लेकिन इसके लिए अंतरिक्ष विभाग व एंट्रिक्स के बीच कोई स्पष्ट अनुबंध अर्से तक नहीं रहा। कंपनी अंतरिक्ष विभाग को दिया जाने वाला राजस्व इसरो को देती है। अंतरिक्ष विभाग के अधिकारी एंट्रिक्स में अंशकालिक तौर पर काम करते हैं और अपने वेतन का एक हिस्सा अंतरिक्ष विभाग से भी लेते हैं। सीएजी ने दो साल पहले सरकार को बताया था कि कंपनी में वित्तीय कामकाज, विशेष परियोजना, कानूनी मामले और मार्केटिंग जैसे महत्वपूर्ण काम इसरो के अधिकारी पदेन (एक्स ऑफिशियो) आधार पर संभालते हैं। यही वजह है कि देवास-एंट्रिक्स करार फाइलों में दबा रहा।


No comments:

Post a Comment