Wednesday, February 23, 2011

भ्रष्टाचार से लड़ता बिहार


भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार को बिहार से सबक लेने की सलाह दे रहे हैं लेखक
उम्मीद थी कि संपादकों के साथ मुलाकात में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के कुछ उपायों की घोषणा करेंगे, लेकिन इसके बजाए एक तरह से वह भ्रष्टाचार पर अपनी सफाई देने की मुद्रा में नजर आए। ऐसे में मगध साम्राज्य के बिखरने के बाद अब एक बार फिर से लगने लगा है कि हिंदुस्तान की एक नई राजनीतिक संस्कृति का नेतृत्व करने के लिए बिहार खुद को तैयार कर रहा है और यह तैयारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में हो रही है। पिछले दस सालों में भारत की चुनावी रणनीति के आधार ने तेजी से करवट बदली है। जाति, धर्म और धन के आधारों को किनारे ठेलकर अब विकास का तत्व डटकर सामने आ खड़ा हुआ है, जिसकी शुरुआत नरेंद्र मोदी ने गुजरात में की थी। इसे नीतीश कुमार ने समझा और लागू करके भारी बहुमत के साथ दूसरी बार सत्तारूढ़ हुए। जिस बिहार को लालू यादव ने राजनीतिक स्वांग में बदल दिया था, उसे अब देश भविष्य के एक सशक्त राज्य के रूप में देखने लगा है। पिछले तीन-चार महीनों से देश में हो रही गतिविधियों को केंद्र में रखकर यदि लोगों से पूछा जाए कि अभी देश के नेताओं से उनकी सर्वोपरि अपेक्षा क्या है, तो उन्हें यह उत्तर देने में एक सेकेंड भी नहीं लगेगा-भ्रष्टाचार के रावण का अंत। तो क्या इस अंत की शुरुआत के लिए भी हम बिहार की ओर देख सकते हैं, उस बिहार की ओर, जो स्वयं कभी इसका गढ़ रह चुका है। मुख्यमंत्री बनते ही नीतीश कुमार ने जो कदम उठाए हैं, उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ उठाए गए कदमों का नवाचार कहा जा सकता है। कल्पना कीजिए, यदि ये कदम उस वर्ग के विरुद्ध हों, जिस पर पूरी राजनीति और पूरे प्रशासन का दारोमदार हो, तो आप ऐसे कदमों को किस श्रेणी में रखेंगे? दोबारा मुख्यमंत्री बने हुए कुछ ही दिन हुए थे कि नीतीश कुमार ने अपनी संपत्ति का खुलासा कर दिया। उनकी देखादेखी उनके मंत्रियों को भी यही करना पड़ा। अब वह चाहते हैं कि उनके विधायक भी ऐसा करें। ऐसा करके उन्होंने अन्य राज्यों और यहां तक कि केंद्रीय मंत्रियों तक पर नैतिक दबाव डाल दिया है कि वे भी इस दिशा में सोचें। ऐसा नहीं है कि इंजीनियर रहे नीतीश कुमार यह नहीं जानते कि इससे भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, लेकिन इतना तो है ही कि आखिर पहल कहीं न कहीं से तो करनी ही थी। दूसरी पहल के रूप में बिहार के इस सक्रिय मुख्यमंत्री ने अपने राज्य के सभी आइएएस अफसरों से कहा है कि वे अपनी व अपने परिजनों की संपत्तियों का ब्यौरा सार्वजनिक करें। इस बात का खात्मा यहीं नहीं कर दिया गया है। राज्य ने भ्रष्टाचारियों पर शिकंजा कसने के लिए एक नया कानून बना दिया है। इस संदर्भ में विशेष न्यायालय कानून लागू किया गया ताकि अधिकारियों द्वारा ज्ञात श्चोत से अधिक धन रखने वाले मामलों की सुनवाई जल्द हो सके। मुझे तो भ्रष्टाचार का कोई ऐसा बड़ा मामला याद नहीं आ रहा, जिसमें किसी को सजा हुई हो। फिर चाहे मामला नौकरशाहों से जुड़ा हो या राजनेताओं से। यदि आप लोगों से पूछेंगे कि ए. राजा, सुरेश कलमाड़ी और टीनू जोशी दंपत्ति का अब क्या होगा, तो यही सुनने को मिलेगा कि कुछ नहीं होगा। उनके इस उत्तर में अतीत का उनका निराशाजनक अनुभव और कुछ भी न कर पाने की बेचारगी, दोनों शामिल हैं। शायद बिहार के विशेष न्यायालय का यह प्रावधान लोगों को हताशा के गर्त से थोड़ा ऊपर खींच सके। इसका असर देखिए। यह घटना अविश्वसनीय सी है। मधेपुरा में मदनपुर के एक पंचायत सेवक ने 58 हजार रुपये की वह राशि अंचलाधिकारी को लौटा दी, जो बाढ़ पडि़तों को देने की बजाय उसने खुद रख ली थी। हुआ यों कि बिहार सरकार ने भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू की। इस कार्रवाई में औरंगाबाद के मोटरवाहन निरीक्षक रघुवंश कुंवर चपेट में आ गए और उनकी संपत्ति की जब्ती के तत्काल आदेश दे दिए गए। इस आदेश ने लड्डू शर्मा नाम के इस पंचायत सेवक की नींद उड़ा दी। भयभीत होकर उसने हड़पा हुआ धन वापस कर दिया। सच यही है कि यदि किसी की सजा में नसीहत बनकर भविष्य में होने वाले अपराधों पर नियंत्रण रख पाने की ताकत नहीं है, तो वह सजा कम, प्रतिशोध अधिक है। इसी तरह, बिहार के स्पेशल कोर्ट एक्ट 2009 के तहत विजिलेंस की विशेष अदालत ने आय से अधिक संपत्ति रखने के दोषी पाए गए सरकारी कर्मचारी रघुवंशी कुंवर की संपत्ति को जिलाधिकारी के हवाले करने के आदेश दिए। अब शासन की घोषणा के तहत रघुवंशी के घर में स्कूल खोला जाएगा। जाहिर है कि अब वहां की जनता इस सत्य को खुलेआम देखेगी कि भ्रष्टाचार का नतीजा क्या निकलता है। बिहार के मुख्यमंत्री के पास ऐतिहासिक मौका है कि भ्रष्टाचार की नाक में नकेल डालने की जो पहल उन्होंने की है, उसे अंतिम परिणति तक पहुंचा कर देश के राजनीतिक इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा लें। हालांकि उन्होंने शुरुआत तो कर दी है, लेकिन इसकी गति को बनाए रखना उतना आसान नहीं है, जितना फिलहाल दिखाई दे रहा है। इसका कारण है सत्ता में राजनेताओं और नौकरशाहों का गठजोड़। पिछले साल बिहार में हुए चुनाव में विधायकों की जो पृष्ठभूमि उभरकर सामने आई है, वह इस आशंका को पुख्ता करने के लिए पर्याप्त है। इस बार के बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि दागी छवि वाले सदस्यों की संख्या पिछली बार की तुलना में काफी बढ़ोतरी हुई है। करोड़पति सदस्यों की संख्या भी खासी बढ़ी है। यह बात गौर करने की है कि इस बार विधानसभा के 59 प्रतिशत सदस्यों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। ऐसे सदस्यों की कुल संख्या 141 है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि इन 141 सदस्यों में से 85 ऐसे हैं, जिन पर हत्या और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आपराधिक माामले लंबित हैं। ये सदस्य किसी पार्टी विशेष से संबद्ध नहीं हैं। जनता दल (यू) और भारतीय जनता पार्टी में भी ऐसे सदस्यों की भरमार है। जहां तक करोड़पति सदस्यों की संख्या का सवाल है, वर्तमान विधानसभा में लगभग छह सौ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। पिछली बार इनकी संख्या केवल आठ थी, जो इस बार बढ़कर 47 हो गई है। सवाल यह है कि नीतीश कुमार ऐसे सदस्यों से निपटेंगे कैसे? निश्चित रूप से चाहे वह आपराधिक गठजोड़ों की बात हो या पूंजीवादी दबावों की, इनसे निपटना मुख्यमंत्री के लिए आसान नहीं होगा। (लेखक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं)

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