विदेशी खातों की बात कह असल मुद्दे से ध्यान भटकाया जा रहा है
विदेशों में जमा देश के काले धन को राजनेताओं, स्वामियों तथा बाबाओं के स्तर पर देश का ज्वलंत मुद्दा बना देना अनेक गंभीर सवाल पैदा करता है। अरबों-खरबों रुपयों का जखीरा कुछ लोग विदेशों में रखें और हमारी आर्थिक-वित्तीय नीतियां निवेश की दर बढ़ाने के लिए हाथ-पैर मारती रहें, यह एक अस्वाभाविक और असहनीय स्थिति है। हमारी बचत का रंग श्वेत-श्याम जो भी हो, लेकिन हमारे विकास अभियान के लिए वह उपलब्ध न रहे और अन्य देशों, खासकर विकसित मुल्कों, के काम आए, यह सचमुच एक त्रासद विसंगति है। खासकर इसलिए कि हम विदेशी निवेश को लुभाने के लिए बहुत रियायतें देने को मजबूर होते हैं। इस तरह देखा जाए, तो हम ‘अपनी’ पूंजी को ही दूसरों के नाम से मंगाने के लिए अब तक भारी लागत का बोझा उठाते रहे हैं।
विदेशों में छिपी काली पूंजी का मूल उद्गम दरअसल देश के अंदर ही होता है। काली अर्थव्यवस्था कितनी विशाल और हर क्षेत्र में व्याप्त हो चुकी है, इसे देश के बाहर जमा राशियों से प्रमाणित किया जा सकता है। महज एक व्यक्ति की भगोड़ी पूंजी का आंकड़ा लगभग आठ अरब डॉलर बताया जा रहा है और उसकी बकाया कर देनदारी इससे 40 हजार करोड़ रुपये आंकी गई है। स्पष्ट है, अन्य बड़े व्यवसायियों, राजनेताओं और नौकरशाहों की ऐसी कुल कलुषित संपत्ति और सालाना सक्रिय तथा प्रवाहरत काली राशियां कुल मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख अंग बन चुकी हैं। इस स्थिति के कुछ निहितार्थों पर गौर करके ही विदेशों में जमा राशियों पर चल रहे व्यापक अभियानों के असली चरित्र को पहचाना जा सकता है। इनके आधार पर जो निष्कर्ष बनते हैं, वे इस तरह हैं : देश में असमानताएं किसी भी आधिकारिक आकलन से कई गुना ज्यादा हैं, क्योंकि उनमें इस छद्म अघोषित काले धन या संपत्ति को शामिल नहीं किया जाता है। विदेशों में ऐसे खाते केवल बड़े मगरमच्छ ही खोल सकते हैं। इसी तरह, बाहर जमा राशि किसी भी ऐसे गैर कानूनी जमाकर्ता की कुल आय और संपत्ति का मुख्य हिस्सा शायद ही कुछ मामलों में हो। ऐसी जमा राशियां निष्क्रिय या सुप्त खातों में कतई नहीं पड़ी रहतीं, बल्कि उनका उपयोग, निवेश आदि लगातार होता रहता है और उनमें बढ़ोतरी के बाहरी स्रोत भी हैं। काले धन को बाहर जमा करने के बाद ऐसी आय और संपत्ति का निर्माण देश के भीतर रुक नहीं जाता, बल्कि वह और तीव्र गति से चलता रहता है। यह भी कि देश के भीतर और बाहर की गतिविधियों द्वारा मिले-जुले रूप में संचालित काली अर्थव्यवस्था का यह सुदृढ़ तंत्र बिना सरकार यानी नेताओं और अफसरशाही की मिली-भगत के चल ही नहीं सकता।
राजनीति, व्यवसाय, प्रशासन, कानूनी-आर्थिक गतिविधियां तथा इन सबमें रची-बसी विशुद्ध आपराधिक गतिविधियां आपस में मिश्रित हो गई हैं, फलत: उनकी कार्यवाही और कार्यवाहकों की अलग-अलग पहचान ऐसे अपवाद होंगे, जो इस कथन की सत्यता को रेखांकित करेंगे। कोई इस बात का दावा नहीं कर सकता कि वह पाक-साफ है और काली अर्थव्यवस्था के रोगाणुओं से मुक्त है। यही बात राजनीति और प्रशासन के लिए भी सही है। कोई भी बड़ा या महत्वपूर्ण राजनीतिक पदाधिकारी काली अर्थव्यवस्था के साये में आने से बच गया हो, यह मानना मुश्किल है। काले धन से जुड़ी सचाई से हर कोई वाकिफ है और इसके खिलाफ कार्रवाई का कोई ठोस संकेत नहीं मिल रहा। अत: सरकार और प्रशासन का सीधे तौर पर ऐसे काले गोरखधंधों में लिप्त नहीं होना, उन्हें उनकी आपराधिक जिम्मेदारी से बरी नहीं कर सकता। इसे सत्ता की मजबूरी मानना भी, चाहे वह गठबंधन के चलते हो या अगले चुनाव के लिए धन जुटाने के लिए, निर्दोषिता का आधार नहीं बन सकता। खास तौर पर इन कामों का लोकतंत्र-विरोधी रूप तब और ज्यादा मुखर व स्पष्ट हो जाता है, जब व्यवसाय की तरह ही राजनीति पर भी पारिवारिक आधिपत्य जमाए रखना घोषित-अघोषित लक्ष्य बना लिया जाता है।
काले धन का इस्तेमाल अकसर लौकिक यश और सामाजिक ‘प्रतिष्ठा’ के लिए भी किया जाता है। यह मकसद सीधे धार्मिक-आध्यात्मिक कहे जाने वाले कामों से जुड़ जाता है। राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर धार्मिक स्वामियों की भरमार तथा उनके व्यवसाय, राजनीति और प्रशासन से जुड़ते तारों के कारण आश्रम, संत, धार्मिक स्थल और अनुष्ठानों का इस काली अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ाव दिनोंदिन जगजाहिर होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में विदेशी बैंकों में छिपाकर रखे गए काले धन के सवाल को सामने लाना इस अर्थ में तो उचित है ही कि यह कई मायनों में खतरनाक स्थिति का खुलासा है। लेकिन यह साफ लगता है कि काले धन की देशी और आंतरिक जड़ों से नजरें चुरा ली गई हैं। देश के भीतर व्याप्त काले धन पर प्रहार करने और उसे रोकने की कोई चर्चा तक नहीं हो रही है। यह ऐसा ही है, जैसे बुराई की जड़ों को यथावत छोड़कर मात्र कुछ डालियों को काटकर बुराई से मुक्ति पाने की बात कही जा रही है। देश के अंदर व्याप्त और चलनरत काले धन पर आक्रमण और उसका खुलासा बाहर जमा धन पर प्रहार से बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण और उससे कम मुश्किल काम है। लेकिन इसे छोड़कर अति दुरूह काम पर ध्यान केंद्रित करवाने से राजनीति और तथाकथित सामाजिक, आर्थिक तबकों की प्रतिबद्धता पर ही सवालिया निशान लग जाते हैं। इस तरह से गोपनीय स्विस बैंकों में कुछ भारतीय खातेदारों के नाम भले सामने आएं, काले धन की अर्थव्यवस्था पर निर्णायक प्रहार कतई संभव नहीं है।
काले धन पर अगर सचमुच अंकुश लगाना है, तो देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के विशाल तंत्र
को निश्चय ही तोड़ना होगा।

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