प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा विवादास्पद एंट्रिक्स-देवास समझौते के बारे में बहुत सफाई देने के अगले ही दिन इस करार को रद्द करने की घोषणा कई मामलों में सुखद, तो कुछ मामलों में हैरान करने वाली भी है। माना जा रहा है कि उपग्रह संचार वाले एस-बैंड की बिक्री से सरकारी खजाने को करीब दो लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता था, हालांकि इस अनुमान पर कैग जैसी किसी संस्था की मुहर लगनी बाकी है। जैसे ही इसे एक अखबार ने उजागर किया, पूरी सरकार सक्रिय हो गई। संसद का बजट सत्र शुरू होने से पहले बुधवार को जब प्रधानमंत्री ने कुछ टीवी संपादकों से बातचीत की, तो उसमें भी यह मामला उठा और उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि अंतरिक्ष आयोग ने जुलाई, 2010 में ही इस करार को रद्द करने का फैसला किया था और हमें नवंबर में इस बारे में सूचना मिली थी। हम कानूनी सलाह करके इस पर अंतिम फैसला करेंगे। पर अगले ही दिन करार रद्द करने का फैसला थोड़ा हैरान भी करता है। इससे यह ध्वनि भी आती है कि बुधवार की वार्ता में सवाल उठने पर ही फैसला हुआ है-जुलाई में इसरो द्वारा लिए गए फैसले का पता भी एस-बैंड करार की गड़बड़ संबंधी रिपोर्ट मीडिया में आने के बाद ही चला। हैरानी और खुश होने वाली एक और बात यह है कि देवास कंपनी की प्रतिक्रिया के बाद फैसला लिया गया है। अगर दो लाख करोड़ कमाई (बीस वर्षों में) वाला सौदा एक हजार करोड़ में मिल जाए, तो कोई भी कंपनी खुश होगी। ऐसे में हुआ करार हाथ से छिन जाए, तो किसी को भी अफसोस होगा। उस कंपनी के रिश्ते अंतरिक्ष अनुसंधान और प्रशासन के बड़े लोगों से हैं। जुलाई में इसरो द्वारा करार से हाथ खींचने का फैसला करने के बाद कंपनी के लोग सत्ता के गलियारे में ‘बैकरूम’ खुसुर-फुसुर में लगे हों या नहीं, पर बुधवार को प्रधानमंत्री की घोषणा के तत्काल बाद उसकी तरफ से धमकी आई थी कि अगर सरकार समझौता रद्द करेगी, तो हम अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। धमकी के बावजूद इतनी तेजी से फैसला करना सुखद है। इस सौदे के तकनीकी पक्ष क्या हैं, इस बारे में ज्यादा विवरणों में जाए बगैर यह कहना अनुचित नहीं है कि दूरसंचार ने अगर हमारे-आपके जीवन में भारी बदलाव ला दिया है, तो इस क्षेत्र को निजी क्षेत्र के लिए खोलने से कुशलता के साथ लूट का खेल भी शुरू हुआ है। जो इसकी संभावनाओं और लाभ को जानते थे, उन्होंने आंखों में धूल झोंककर लाखों करोड़ बनाए हैं। और नौकरशाह हों या नेता, वे अपने निजी स्वार्थों के लिए देश में खुली लूट की छूट देते रहे हैं। अब चाहे देर से ही सही, सबकी नींद खुली है, तो उसका स्वागत है।
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