भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पूर्व अधिकारियों की कंपनी देवास मल्टीमीडिया और एंट्रिक्स के बीच छह साल पुराने एस-बैंड स्पेक्ट्रम आवंटन करार को रद करने की कवायद बीते डेढ़ साल से चल रही थी। लेकिन, मामले पर मचे बवाल ने सरकार को जांच के लिए बनी चतुर्वेदी समिति की रिपोर्ट से पहले ही अनुबंध तोड़ने पर मजबूर कर दिया। कुछ इस तरह बढ़ी करार की कहानी :-
मार्च 2003 : डिजिटल मल्टीमीडिया सेवाओं की संभावना के लिए एंट्रिक्स ने अमेरिकी कंपनी फोर्ज एडवाइजर्स के साथ एमओयू किया। वर्ष 2004 में फोर्ज एडवाइजर ने देवास मल्टीमीडिया की स्थापना की।
दिसंबर 2004- देवास मल्टीमीडिया के साथ हुए करार मसौदे को एंट्रिक्स बोर्ड की मंजूरी
28 जनवरी 2005- स्पेक्ट्रम आवंटन के देवास-एंट्रिक्स करार पर दस्तखत। उपग्रह जीसेट-6 और जीसैट-6(ए) पर नब्बे फीसदी एस-बैंड स्पेक्ट्रम आवंटन पर समझौता।
दिसंबर 2005 - जीसेट-6 बनाने को मंत्रिमंडल की मंजूरी
अक्टूबर 2009- जीसेट-6(ए) निर्माण को अंतरिक्ष आयोग की मंजूरी
दिसंबर 2009- अनुबंध को लेकर शिकायतों के बाद इसरो ने बीएन सुरेश की अगुवाई में बनाई समिति
2 जुलाई 2010- अंतरिक्ष आयोग की बैठक में देवास के साथ हुए करार को खत्म करने की सिफारिश
नवंबर 2010- अंतरिक्ष विभाग ने प्रधानमंत्री कार्यालय को भेजा इस बाबत नोट
7 फरवरी 2011- स्पेक्ट्रम आवंटन के इस करार पर मीडिया में आई सीएजी की आपत्तियां
10 फरवरी 2011- करार पर उठे सवालों के बाद प्रधानमंत्री ने मामले की जांच के लिए पूर्व कैबिनेट सचिव बीके चतुर्वेदी की अगुवाई में बनाई समिति
17 फरवरी 2011- केंद्रीय मंत्रिमंडल की सुरक्षा संबंधी समिति ने रद्द किया करार

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