Friday, February 18, 2011

हरे-भरे मॉरीशस से काली कमाई


भारत सरकार ने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश संवद्र्घन बोर्ड (एफआईपीबी) को मॉरीशस से मिलने वाले प्रत्यक्ष निवेश के सभी प्रस्तावों की करीबी जांच करने का निर्णय लिया है। आयकर विभाग से कह दिया गया है कि वह इन निवेश प्रस्तावों की बारीकी से जांच-पड़ताल शुरू कर दे। वित्त मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, मॉरीशस से होने वाले निवेश की जांच बढ़ाई जा रही है। भारत में विदेशी निवेश के लिए दरवाजा खोलने के बाद से यहां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में मॉरीशस की हिस्सेदारी 40 फीसदी से ज्यादा रही है। इस बात के आरोप हैं कि भारत का पैसा खासकर काला धन मॉरीशस के रास्ते वापस भारत में आ रहा है। रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में इस तरह के निवेश का संदेह है। सूत्रों ने बताया कि आयकर विभाग ने भारत में निवेश होने वाले फंड के बारे में जानकारी जुटाने के लिए एक अधिकारी मॉरीशस में तैनात किया है। यह अधिकारी वहां की सरकार और राजस्व अधिकारियों से बातचीत करेगा। आयकर विभाग उन मामलों की सघन जांच और विशेष ऑडिट करेगा, जिनमें ऑटोमैटिक रूट के तहत आने वाले सेक्टर से संबंधित कंपनी में मॉरीशस के रास्ते निवेश किया गया है। 

इस मामले की जानकारी निजी बाजार सर्वेक्षण कंपनी अर्न्‍स्ट एंड यंग ने भी दी है। इस कंपनी के के टैक्स मार्केट लीडर सुधीर कपाड़िया ने बताया कि गड़बड़ी का पता लगाने के लिए ऑडिट जरूरी होगा। भारत में निवेश करने वाले लोगों के लिए मॉरीशस पसंदीदा देश रहा है, क्योंकि भारत-मॉरीशस टैक्स समझौते के तहत सिक्योरिटी यानी प्रतिभूतियों की बिक्री से भारत में होने वाले पूंजीगत लाभ पर सिर्फ मॉरीशस में टैक्स लगाया जा सकता है। वहीं, मॉरीशस कैपिटल गेंस पर टैक्स नहीं लगाता। मॉरीशस की सरकार ने कहा है कि उसके यहां से काले धन का निवेश भारत में न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए उसने जरूरी उपाय किए हैं तथा रेजिडेंसी सर्टिफिकेट के नियमों को सख्त बनाया है। इससे कंपनियों के लिए बोर्ड की बैठक बुलाना और मॉरीशस में ही बैंक खातों के जरिए लेन-देन करना अनिवार्य हो गया है। भारत या अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे पर्याप्त नहीं मानता है। वित्तीय मामलों के जानकारों का कहना है कि काले धन का निर्माण रोकने के लिए कानूनी प्रारूप में मॉरीशस ने कई जरूरी बातें शामिल नहीं की हैं। इनमें कुछ ऑफशोर कंपनियों के खातों के बारे में जानकारी शामिल हैं। कानूनी प्रारूप में आयकर अधिकारियों को खास तौर पर बैंकों से संबंधित जानकारियां उपलब्ध करवाने के लिए मॉरीशस सरकार को काफी कुछ करना है। बताया जाता है कि वोडाफोन और हच के बीच हुए सौदे के बाद भारतीय अधिकारी मॉरीशस के साथ हुए समझौते में सुधार को जरूरी मान रहे हैं। इस सौदे में सारा लेन-देन मॉरीशस और केमैन आइलैंड में पंजीकृत सहायक कंपनियों के जरिए हुआ था। इस मामले में भारतीय आयकर विभाग ने करीब 1.7 अरब डॉलर आयकर की मांग की है। लेकिन, सरकार कूटनीतिक कारणों और मॉरीशस के साथ ऐतिहासिक संबंधों के मद्देनजर भारत सरकार मॉरीशस के साथ सख्त समझौता नहीं करना चाहती। उसे उम्मीद है कि अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाकर वह फंड के स्रोतों का बेहतर पता लगा सकती है। भारत आयकर से जुड़ी जानकारियों के लिए ग्लोबल फोरम ऑन ट्रांसपरेंसी एंड एक्सचेंज ऑफ इफॉर्मेशन पर ग्लोबल फोरम के स्टीयरिंग समूह का सदस्य रहा है। इसके अलावा वह इस आंकलन से संबंधित पीयर रिव्यू समूह का उपाध्यक्ष भी है .

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