Monday, February 7, 2011

मिस्र के सबक से सीख लें


शीर्ष पदों पर चल रहे महाभ्रष्टाचार के खेल से देशभर में फैली चिंता और गुस्से की लहर का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसके खिलाफ मिस्र जैसी बगावत अपने देश में भी शुरू होने की चेतावनी अब दी जाने लगी है। इस चेतावनी को हलके में लेना बुद्धिमानी नहीं होगी क्योंकि मिस्र या अरब के अन्य देशों में उठे जन तूफान के पीछे वहां की तानाशाही व्यवस्था के खिलाफ असंतोष सिर्फ एक कारण है। सत्ता की जड़ों में व्याप्त भ्रष्टाचार और इसके कारण बढ़ती गरीबी, बेरोजगारी वह बड़ी वजह है जो आम आदमी को सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतार लायी है। तीन दशकों से भी अधिक समय से मिस्र को अपने मिजाज पर हांकते हुस्नी मुबारक की खुद की सम्पत्ति अरबों- खरबों में आंकी जा रही है। जाहिर है कि अकूत दौलत उन्हें देश की सेवा की एवज में पारिश्रमिक के रूप में तो मिली नहीं होगी। कमोबेश यही हालत अरब के अधिकतर देशों की है जहां तानाशाह व्यवस्था देश के संसाधनों को लूटने का सबसे बड़ा माध्यम बनी हुई है। दुर्भाग्यवश अपने देश में लोकतंत्र व्यवस्था ही लूट का माध्यम बनी हुई है और पंचायत स्तर से मंत्रीस्तर तक देश के संसाधनों को लूटने का सिलसिला लगातार चल रहा है। इस लूट का बडा़ हिस्सा विदेश के उन बैंकों में जमा हो जाता है जो ग्राहकों के नाम गुप्त रखने और पैसों के स्रेत पर कोई सवाल नहीं पूछने की नीति पर चलते हैं। भ्रष्टाचार पर मचे भारी बवाल और समाज के बढ़ते दबाव के बाद अब ऐसे खातों का राज खुलने के आसार बन रहे हैं। ऑस्ट्रिया व जर्मनी के बीच मौजूद एक लघु देश लीचटेंस्टाइन के बैंकों में जमा भारत के ऐसे कालेधन का राज खुलने लगा है। सरकार ने दावा किया है कि उसने ऐसे सत्रह भारतीयों और संस्थाओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। ध्यान रहे कि इनमें से अधिकतर लोग व्यापारी हैं और इनके नाम भी हमारी सरकार की कोशिशों से नहीं बल्कि जर्मनी की पहल पर मिले हैं। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि सरकार इन मामलों को महज करवंचना बता कर और चंद करोड़ के टैक्स वसूलने को अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री समझ रही है। सरकार के इस रवैये पर सुप्रीमकोर्ट ने तेवर कड़े करते हुए पूछा है कि देश के संसाधनों की खुली लूट को क्या महज टैक्स लेकर माफ कर दिया जा सकता है। भ्रष्टाचार के पैसों से मॉरीशस, जर्मनी, स्विटजरलैंड जैसे देशों के बैंक चलते हैं यह कोई छिपा रहस्य नहीं है। पुणो के व्यापारी हसन अली खान ने छत्तीस हजार करोड़ रुपये स्विस बैंकों में अपनी बीवी के नाम जमा करवाये हैं। सरकार सब जानती है लेकिन हसन आज कहां है, इसका कोई अता-पता उसके पास नहीं है। विभिन्न देशों से हुई संधियों की आड़ लेकर सरकार ऐसे कालेधन जमा करने वालों का नाम या अन्य व्योरा देने से इनकार कर रही है। पर सच्चाई यह है कि देश के संसाधनों की लूट से जमा पैसे का ब्योरा आज की तारीख में कोई देश छुपाने की ताकत नहीं रखता। आज की पहली जरूरत है कि ऐसे तमाम नामों को खंगाल कर कार्रवाई शुरू कर दी जाए।

No comments:

Post a Comment