हमारे सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी आज डायनासोर हो गई है
कोई माने या न माने, भारतीय राजनीति की कुंडली में इन दिनों बुरे ग्रहों का योग चल रहा है। कभी मनमोहन सिंह की व्यक्तिगत ईमानदारी को अपनी सरकार और पार्टी की ईमानदारी के रूप में पेश करने वाली कांग्रेस आज ‘राजा नंगा है’ वाली कहानी का उदाहरण बनकर खड़ी है। कितनी दयनीय स्थिति है कि अपने ही मंत्री को गिरफ्तार करवाकर कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि हम भ्रष्टाचार से जी-जान से लड़ रहे हैं! लेकिन कोई पूछे इनसे कि जब राजा बनाने का खेल चल रहा था, तब कांग्रेस और उनके प्रधानमंत्री मूक बने क्यों बैठे थे?
अगर प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और विपक्ष की नेता की कमेटी सतर्कता आयोग का मुखिया चुनते वक्त यह देखने की जरूरत नहीं समझती कि उनके पास इस आदमी के बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध है या नहीं, तो उसमें और नौकरशाही के एक छोटे-से पुरजे में फर्क ही क्या है? पीजे थॉमस इस पद के योग्य हैं या नहीं, इस बहस को एकदम दरकिनार कर बहस इस पर हो रही है कि उनके चयन की प्रक्रिया में कोई गड़बड़ हुई है क्या। भारतीय जनता पार्टी की सबसे प्रगल्भ नेता सुषमा स्वराज आज जितना शोर कर रही हैं, उसका चौथाई भी तब क्यों नहीं किया था, जब उनकी राय न मानकर मनमोहन सिंह और पी चिदंबरम ने थॉमस को इस ऊंची कुरसी पर बिठा दिया था? यह तो तुम्हारी भी चुप्पी, हमारी भी चुप्पी जैसा समझौता हुआ न! भारत सरकार के महाधिवक्ता वाहनवती ने थॉमस के चयन का बचाव करते हुए काफी पहले सार्वजनिक रूप से कहा था कि अगर योग्यता की जांच सही अर्थों में की जाने लगे, तो देश में कोई भी रिक्त पद भरा नहीं जा सकेगा। मतलब सीधा है कि हमारे राजनीतिक-प्रशासनिक दायरे में ईमानदारी डायनासोर की तरह हो गई है। यानी जिसकी चर्चा कहीं है ही नहीं, उसकी खोज आप क्यों रहे हैं? शासन-प्रशासन की कुरसियां भरनी हैं, तो भरिए न, ईमानदारी-योग्यता जैसी चीज की खोज-खबर भला क्यों ले रहे हैं?
2 जी घोटाले के बाद यदि सरकार में थोड़ी भी नैतिकता होती, तो वह चुप लगाकर, सिर झुकाकर अपनी गलतियां ठीक करने में जुट जाती। गलती को स्वीकार कर क्षमाप्रार्थी होना गलती को ठीक करने और आगे गलती से बचने की दिशा में पहला कदम होता है। यहां सरकार ने यह किया कि कपिल सिब्बल को राजा बना दिया। नए दूरसंचार मंत्री को लगता है कि उनकी वकालत और उनके मंत्री होने में फर्क इतना ही कि यहां काला कोट पहनने की बाध्यता नहीं है। सो काला कोट किनारे रखकर वह मंत्री बन गए और कहा कि 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले में कुछ नुकसान नहीं नजर आता। हमारे नियंत्रक और महालेखा परीक्षक में बला का धैर्य है और अपने काम की गहरी समझ भी। तभी तो उन्होंने दूरसंचार मंत्री कपिल सिब्बल से कुछ न कहकर सीधे देश से कहा कि हमारे आंकड़े बिलकुल सही हैं।
खेल के मैदान की तरफ देखिए, तो वहां सुरेश कलमाडी खड़े है, और प्रसार भारती की तरफ देखें, तो वहां बीएस लाली खड़े हैं। खेलों के आयोजनों से और उनके प्रसारणों से खासी कमाई की जा सकती है, यह तो हम देखते-जानते ही रहे हैं, लेकिन इनसे व्यक्तिगत धन भी निचोड़ा जा सकता है, यह साबित करने के लिए हमें इनका आभारी होना चाहिए। अलबत्ता इन नामों के पीछे भी पूरी एक फौज खड़ी है, जिसमें अधिकारी, नौकरशाही, ठेकेदार और राजनेता सभी सावधानी व कुशलता से अपनी-अपनी भूमिका निभाते मिलते हैं। जब फौज की बात चली है, तो हम यह भी देख लें कि हमारी अपनी फौज भी कहीं अलग नहीं खड़ी। वह आदर्श हाउसिंग घोटाले में भी खड़ी है और रक्षा विभाग की दूसरी जमीनों के बेचने के मामले में भी। पुणे में थलसेना के दो कमांडरों ने कोई 30 करोड़ रुपयों की सेना की जमीन एक निजी बिल्डर को दे दी। बदले में किसने, क्या पाया, इसकी कहानी अभी खुल रही है। लेफ्टिनेंट जनरल पीके रथ पश्चिम बंगाल में जमीन बेचने के मामले में अपराधी साबित हुए हैं और उनका कोर्ट मार्शल हुआ है।
विदेशी बैंकों में धन जमा करने का मामला भी नई तरह से उजागर हुआ है। सरकार की पूरी कोशिश है कि यह मामला उजागर न होने पाए। वह कह रही है कि जिन बैंकों से उसे भारतीय खातेदारों के नाम मिले हैं, उन बैंकों ने शर्त लगाई है कि सरकार इन नामों को सार्वजनिक नहीं करेगी। कोई पूछे कि ऐसी शर्त के साथ नामावली लेने का तुक क्या था? वह कोई विष्णु सहस्रनाम तो है नहीं, जिसका पाठ करते रहें तो पुण्य होगा। वह तो राष्ट्र के प्रति अपराध करने वालों की सूची है, जिसका पूरा खुलासा हो, तभी उसका कोई मतलब है। हमें इससे क्या मतलब कि वह सूची स्विस बैंक वालों के पास गुप्त रहती है या अपनी सरकार के पास! इसलिए अदालत ने ठीक ही पूछा है कि इस सूची को गुप्त रखने के पीछे सरकार का नजरिया क्या है?
क्या ऐसा नहीं लगता है कि हमारा सारा का सारा देश नगरपालिका की ऐसी सड़क में बदल गया है, जिस पर मनमाना चलने, थूकने, कचरा फेंकने और गाड़ी दौड़ाने का अधिकार हर किसी को है, लेकिन जिसकी साफ-सफाई, देखभाल से किसी को कोई मतलब नहीं है? देश को घर की तरह होना चाहिए, लेकिन जब उसे सड़क की तरह बना दिया जाए, तो समझिए कि उसका अंत निकट आ गया है। क्या अंत से पहले हम इस खतरे को भांपकर कोई दूसरा रास्ता बना सकेंगे? नहीं तो दुष्यंत कुमार बता ही गए हैं, खास सड़कें बंद हैं, कब से मरम्मत के लिए। यह हमारे वक्त की सबसे सही पहचान है।

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