बहुत अच्छा हुआ कि सरकार ने आननफानन में निजी कंपनी देवास मल्टीमीडिया को कौड़ियों के भाव मिलने वाला दुर्लभ एस बैंड स्पेक्ट्रम का करार रद्द कर दिया। जाहिर है सौदा सरकार ने एकतरफा तोड़ा है इसीलिए पीड़ित कंपनी कोर्ट जा सकती है और करार की शतरे के अनुरूप उचित हर्जाने की मांग भी कर सकती है। अब कंपनी को हर्जाने का हक बनता है या नहीं या हर्जाने की रकम कितनी बनती है यह तो समय बताएगा। कम से कम देश की चिंता इस मामले में तो खत्म हो गई और टू-जी जैसा या उससे भी बड़ा एक और घोटाला होते-होते बच गया। लेकिन इस महाघोटाले की दुर्गध ने ऐसे गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं कि दूसरी तरह की चिंताओं ने देश को घेर लिया है। क्या देश को चलाने वाले प्रधानमंत्री कार्यालय या पीएमओ में भी कहीं कोई ऐसा छेद है जो देश को लूटने वाले सफेदपोश गिरोहों की निगहबानी कर रहा है ! यह सौदा देश के सबसे संवेदनशील विभाग भारतीय अंतरिक्ष रिसर्च संगठन यानी इसरो के कमर्शियल चेहरे अंतरिक्ष ने किया था। यह विभाग सीधे प्रधानमंत्री की देख-रेख में मतलब पीएमओ के हवाले है। सौदे पर बवाल मचने के बाद सरकार कहती है कि इसरो को तो इस बैंड पर सौदा करने का अधिकार ही नहीं है। अगर ऐसी बात थी तो पांच साल पहले इसरो ने कैसे महज डेढ़ हजार करोड़ में किसी निजी कंपनी से यह सौदा कर लिया कि वह उसके लिए दो सेटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित करेगी और बारह वर्षो तक वह उनके ट्रांसपोंडरों का इस्तेमाल करता रहेगा। इन ट्रांसपोंडरों के जरिए ही वह कंपनी एस बैंड के दुर्लभ स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल करती रहती। इस सौदे में इसरो के ही पूर्व अधिकारियों का शामिल होना और गंभीर बात है। क्या इन इसरो वैज्ञानिकों का इस्तेमाल महज फ्रंट या चेहरे के रूप में हो रहा था! देश के सबसे संवेदनशील वैज्ञानिक प्रतिष्ठान से जुड़े लोगों का ऐसा इस्तेमाल क्या देश की सुरक्षा को लेकर आपकी चिंता नहीं जगा रहा है! 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले की सारी कहानी ऐसे ही चेहरों या फ्रंट के इर्दगिर्द बुनी गई है और आरोप तो यहां तक लग रहे हैं कि कहीं न कहीं इस खेल के तार कुख्यात माफिया और भारत विरोधी दाऊद इब्राहिम से भी जुड़ते हैं। इसरो से जुड़े इस सौदे को महज एक गलती बता कर इसे रद्द करने से बात नही बनती। ऐसी गलतियां कभी खतरनाक रूप भी ले सकती हैं। इसलिए, प्रधानमंत्री का दायित्व बनता है कि वह इस सौदे की तह तक जाएं और देखे कि उनके आसपास भी कहीं काली भेड़ें तो नहीं घुस आई हैं। उतना ही गंभीर मामला यूपीए सरकार की कार्यशैली और संस्कृति का भी बन जाता है। एस बैंड को दुर्लभ संसाधन माना जाता है और इसका उपयोग सीधे देश की सुरक्षा से जुड़ा है। भारतीय सेना, अर्धसुरक्षा बल और रेलवे जैसे संवेदनशील विभागों की जरूरतों से सीधी जुड़ी हुई है यह आधुनिक तकनीक। तब ऐसे सौदे देश के रक्षामंत्री तक से अगर छुपाए जाने लगें तो इसका मतलब क्या यह नहीं कि दाल में कुछ काला है! रक्षामंत्री एके एंटोनी अगर प्रतिक्रिया में इस मामले को दुर्भाग्यपूर्ण और गलती बता रहे हैं तो क्या इसे हल्के में लिया जाना चाहिए। एंटोनी जैसे वरिष्ठ मंत्री को भी ऐसे नीतिगत सौदे की जानकारी का नहीं होना मंत्रिमंडल की कार्य पण्राली को घेरता है।
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