देश में बढ़ते भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए एक समग्र नीति की रूपरेखा पेश कर रहे हैं बीआर लाल
आम तौर पर हम काला धन, तस्करी और आतंकवाद जैसी समस्याओं को अलग-अलग मान लेते हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि ये सब एक ही श्रंृखला की कडि़यां हैं। इन परस्पर जुड़ी कडि़यों का मूल स्रोत है भ्रष्टाचार। इसलिए यह आवश्यक है कि देश में व्याप्त इन बुराइयों के उन्मूलन के लिए एक समग्र नीति बनाई जाए। इसके पहले चरण में कानून की ऐसी मजबूत आधारभूत संरचना बनाने की आवश्यकता है ताकि ऐसे अपराधों को करने से पहले भ्रष्ट तत्वों के मन में डर पैदा हो। भ्रष्टाचारियों को यह भी एहसास हो कि उनके द्वारा किए गए अपराध के परिणाम को किसी भी तरह छुपाना संभव नहीं होगा। इसके अलावा यह सुनिश्चित किए जाने की भी महती आवश्यकता है कि सरकारी तंत्र खासकर जांच एजेंसियां अपना काम स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से करें और उनके काम में किसी तरह का राजनीतिक हस्तक्षेप न हो। इस काम के लिए दृढ़ और ईमानदार राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है, क्योंकि केवल नियम अथवा कानून बना देने भर से भ्रष्टाचार खत्म नहीं होने वाला। इसके लिए सतत प्रयास और जनजागरूकता की आवश्यकता होगी, जिसमें विभिन्न संगठनों, दबाव समूहों, मीडिया और नागरिकों की भूमिका महत्वपूर्ण है। इसके लिए तात्कालिक तौर पर सात सूत्रीय कार्यक्रम हमारे लिए एक मार्गनिर्देशक का काम कर सकता है। सबसे पहले तो कर चोरी को एक संज्ञेय अपराध बनाया जाए। जो लोग टैक्स नहीं चुकाते हैं अथवा चोरी करते हैं उन्हें जेल भेजने का स्पष्ट प्रावधान होना चाहिए, क्योंकि यह देश की जनता के साथ किया जाने वाला छल और अपराध है। जहां तक जेल भेजने की अवधि का सवाल है तो यह टैक्स चोरी की राशि से जुड़ी होनी चाहिए। उदाहरण के तौर पर एक लाख तक की टैक्स चोरी के लिए एक साल सजा का प्रावधान हो। इसके अतिरिक्त टैक्स चोरी के लिए दंड शुल्क भी वसूल किया जाना चाहिए। इसी तरह जिसके पास भी अघोषित संपत्ति मिलती है उसे हर 50 लाख रुपये पर एक साल की जेल सजा का प्रावधान हो। जेल सजा की कोई अधिकतम सीमा नहीं होनी चाहिए। यह सौ साल तक भी रखी जा सकती है। इससे लोग टैक्स चोरी करने से बचेंगे। दूसरे, हमारी अर्थव्यवस्था में मुद्रा की मात्रा का अनुपात हमारी जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले बहुत ज्यादा है। दूसरे देशों में यह अनुपात दो से पांच प्रतिशत है, जबकि भारत में 14 से 15 प्रतिशत है। हमारी अर्थव्यवस्था में भी यह अनुपात दो से तीन प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो चाहिए। इस तरह करीब 9 लाख 40 हजार करोड़ रुपये की करेंसी आपूर्ति के बजाय आवश्यकता केवल 1.5 से 2 लाख करोड़ रुपये की है। शेष करीब 7.5 लाख करोड़ रुपये या तो काले धन के रूप में जमा होता है अथवा काले सौदों के लिए उपयोग में लाया जाता है। कोई हैरानी नहीं कि एक हजार और पांच सौ रुपये के नोटों की मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही है और जब कभी भी जांच एजेंसियां छापे मारती हैं तो छोटे-मोटे काले धन वाले लोगों के यहां भी करोड़ों की करेंसी मिलती है। बड़े नोटों को एक सुनियोजित ढंग से वापस लेने की जरूरत है। इसका विस्तार से वर्णन फाइनेंसियल टेररिज्म : ब्लैक मनी एंड इंडियाज ट्रेटर एलीट नामक पुस्तक में है। तीसरा कदम बेनामी संपदा हस्तांतरण रोकने के लिए स्पष्ट कानूनों के निर्माण का है। संपदा हस्तांतरण के नियम कड़े किए जाने चाहिए। साथ ही एनपीआर यानी नेशनल प्रॉपर्टी रजिस्टर बने ताकि हर व्यक्ति के प्रॉपर्टी हस्तांतरण और बैंक खातों आदि की पूरी जानकारी एक जगह आ सके। यह एनपीआर एक कंप्यूटर पर होगा, जिसमें भारत में प्रॉपर्टी का क्रय-विक्रय करने वाले सभी व्यक्तियों का नाम व फिंगर प्रिंट होंगे। यह कंप्यूटर फिंगर प्रिंट पर आधारित यूनिक आइडी से खुलेगा। इस तरह खरीद-विक्रय की जाने वाली संपत्तियों व खातों की समस्त जानकारी और ब्यौरा इसमें सीधे दर्ज होता रहेगा। इससे भ्रष्टाचार के एक बड़े क्षेत्र में पारदर्शिता आएगी। चौथा उपाय भ्रष्टाचार निरोधक कानून, 1988 में सुधार करके उसमें सजा कड़ी करने का है। फिलहाल भ्रष्टाचार की पुनरावृत्ति पर भी ज्यादा से ज्यादा सात साल की सजा का प्रावधान है, भले ही संबंधित व्यक्ति ने हजारों करोड़ का भ्रष्टाचार किया हो और अघोषित संपत्ति खरीदी हो। सजा का निर्धारण संपत्ति के मूल्य से होना चाहिए। इस कानून में एक और सुधार यह भी हो कि अभियोजन यानी मुकदमा चलाने के लिए किसी की अनुमति की आवश्यकता न रहे। इसलिए धारा 19 को समाप्त कर देना चाहिए। यदि यह धारा न होती तो थॉमस जैसे दागी सीवीसी न बन पाते। कई सालों से थॉमस के विरुद्ध मुकदमा शुरू करने का मामला सरकार के पास लंबित है। किसी भी वास्तविक जनतांत्रिक गणराज्य में कानून का राज्य होता है और यह धारा इसके खिलाफ है। सीवीसी एक्ट की धारा 26 खत्म करना पांचवा उपाय है। इसके तहत मुकदमा दर्ज करने के लिए इजाजत की आवश्यकता होती है। यह प्रावधान हवाला मामले में विनीत नारायण वाले फैसले के अलावा 1971 के सिराजुद्दीन के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के भी विरुद्ध है। इस नियम की आड़ में बड़े अधिकारी व मंत्री कानून के फंदे से बच निकलते हैं। छठवें सुधार के तौर पर जनप्रतिनिधित्व कानून में यह प्रावधान जोड़ा जाए कि किसी अपराधी के खिलाफ यदि चार्जशीट तैयार हो जाती है तो उसे न तो चुनाव लड़ने का हक हो और न ही उसे सरकार में कोई कार्यभार सौंपा जाए। इस क्रम में अंतिम और महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक स्वायत्त संस्था का गठन हो जो सरकार से पूर्णत: स्वतंत्र हो। इसे बहुत सशक्त और प्रभावी बनाया जाए, जिसके तहत लोकपाल, सीवीसी, सीबीआइ, ईडी जैसी जांच एजेंसियों के कार्यक्षेत्र आएं। इस बात को भी समझा जा सकता है कि कोई भी अपने खिलाफ किसी अपराध की जांच नहीं कर सकता और न ही करनी चाहिए। भ्रष्टाचार एक ऐसा अपराध है जो केवल सरकार में बैठे लोग ही करते हैं। इसलिए यह कहना बिल्कुल सही है कि सरकार के अंतर्गत रहते हुए कोई भी जांच एजेंसी सरकारी अफसरों या मंत्रियों की जांच स्वतंत्र और निष्पक्ष तौर पर नहीं कर सकती। यही कारण है कि आज तक एक भी घोटाले की जांच सिरे नहीं चढ़ी, जबकि 1948 से अब तक बड़े-बड़े घोटालों की संख्या दो सौ के आंकड़े की ओर तेजी से बढ़ रही है। (लेखक हरियाणा के पूर्व डीजीपी एवं सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेशक हैं)

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