काले धन पर केंद्र सरकार की नई पहल उतनी ही निराशाजनक है जितनी उच्चतम न्यायालय में उसकी ओर से दी गई दलीलें थीं। पहले उसने विदेशी बैंकों में काला धन जमा करने वालों के नाम उजागर करने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने के मामले में उच्चतम न्यायालय के समक्ष अंतरराष्ट्रीय संधि से बंधे होने का रोना रोया और जब वहां उसे फटकार पड़ी तो वह देश को यह समझाने की कोशिश कर रही है कि सख्त रवैया अपनाने से काले धन की वापसी होने वाली नहीं है। केंद्र सरकार ने काले धन को मुख्यधारा में लाने के लिए कर ढांचे में बदलाव करने और बेहिसाब संपत्ति की स्वैच्छिक घोषणा के लिए उपयुक्त माहौल बनाने के जो संकेत दिए उससे यह स्पष्ट है कि वह समस्या की गंभीरता समझने के बजाय देश का ध्यान मूल मुद्दे से भटकाना चाहती है। बेहतर हो कि केंद्र सरकार और उसके नीति-नियंता यह समझ लें कि समस्या यह नहीं है कि विदेशों में काला धन जमा करने वाले स्वेच्छा से इसके बारे में बता नहीं रहे। केंद्र सरकार काले धन की समस्या को जिस तरह सिर्फ टैक्स चोरी के रूप में देखने तक सीमित है उससे तो यह लगता है कि उसने अभी यह महसूस ही नहीं किया कि उससे उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की अपेक्षा की जा रही है जिन्होंने अनुचित तरीके से राष्ट्रीय संपदा लूटी है या फिर गैर कानूनी कार्यो में लिप्त होकर पैसा बटोरा है। केंद्र सरकार को इसकी अनुभूति होनी ही चाहिए कि यह काम भ्रष्ट व्यापारियों और उद्योगपतियों के बजाय नेताओं एवं नौकरशाहों ने अधिक किया है। ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार काले धन की समस्या पर विचार करते समय भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों पर ध्यान ही नहीं केंद्रित करना चाहती। यदि ऐसा नहीं है तो फिर क्या कारण है कि वह उच्चतम न्यायालय की फटकार के बावजूद टैक्स ढांचे में बदलाव करने अथवा व्यापारियों की टैक्स संबंधी समस्याओं का समाधान करने के ही जतन कर रही है? यदि इन कोशिशों के चलते कुछ व्यापारी अपने काले धन की स्वेच्छा से घोषणा करने के लिए आगे आ जाते हैं तो इससे बात बनने वाली नहीं है, क्योंकि एक बड़ी मात्रा में काला धन तो नेताओं और नौकरशाहों ने भ्रष्ट उपायों के जरिए अर्जित किया है-ठीक वैसे ही जैसे हाल के कुछ घोटालों के जरिए नेताओं और नौकरशाहों ने सार्वजनिक कोष के अरबों रुपये हड़प लिए। देश यह जानना चाहेगा कि जिन लोगों ने सार्वजनिक कोष को लूटा उनके खिलाफ वह क्या कदम उठाने जा रही है? केंद्र सरकार बड़ी चतुराई से यह भी संकेत दे रही है कि समस्या सिर्फ वह काला धन है जो वर्षो पहले विदेशी बैंकों में जमा किया गया। क्या वह यह दावा करने की स्थिति में है कि हाल के घोटालों के जरिए जो पैसा इधर-उधर हुआ वह विदेशी बैंकों तक नहीं पहुंच सका? सवाल यह भी है कि क्या उसने ऐसे उपाय कर लिए हैं जिससे कोई भी काला धन विदेशी बैंकों में जमा करने में सक्षम नहीं? चूंकि ये प्रश्न अनुत्तरित हैं इसलिए इस नतीजे पर पहुंचने के अलावा और कोई उपाय नहीं कि सरकार काले धन पर अंकुश लगाने के मामले में नए सिरे से हीलाहवाली ही कर रही है।
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