Thursday, February 17, 2011

काले धन पर सफेद झूठ


काला धन वापस न ला पाने और जमाकर्ताओं के नाम उजागर न करने को बहाना बता रहे हैं ए. सूर्यप्रकाश
नवंबर 2010 में पश्चिम अफ्रीका स्थित आइवरी कोस्ट के राष्ट्रपति लारेंट ग्बोग्बो ने चुनाव के माध्यम से अपनी तानाशाही को कानूनी जामा पहनाने का प्रयास किया। हालांकि मतदाताओं ने उन्हें नकार कर उनके विरोधी एलेंजेंडरा उआट्टरा को चुन लिया। पिछले दिनों अरब देशों के दो अन्य तानाशाह ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति जाइन अल-अबीदाइन बेन अली और मिश्च के राष्ट्रपति होस्नी मुबारक को देश में हुए जनविद्रोह के कारण पद छोड़ने को मजबूर होना पड़ा। विश्व के इस भाग में तानाशाहों के खिलाफ लोगों के बढ़ते गुस्से के अलावा एक और पहलू समान है-स्विटजरलैंड सरकार द्वारा शासकों और उनके सहयोगियों के बैंक खातों के परिचालन पर रोक लगाना। इन फैसलों की घोषणा करते हुए स्विटजरलैंड की राष्ट्रपति मिशेलीन कैमी-रे ने कहा कि ये बैंक खाते शुरू में तीन साल के लिए फ्रीज किए जाएंगे ताकि इन देशों में अधिकारी संबंधित नेताओं के खिलाफ आपराधिक मामला चला सकें। संबंधित खातेदारों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने पर ही स्विस बैंक उन देशों को धन वापस लौटाने में सहायता प्रदान करता है, जहां के लोगों ने स्विस बैंकों में पैसा जमा किया है। यह महत्वपूर्ण है कि स्विटजरलैंड अपनी छवि को बदलना चाहता है कि वह दुनिया भर का काला अपने बैंकों में जमा करता है और खातेदारों का बचाव भी करता है। इसीलिए सरकार ने एक नया कानून पारित किया जिसके तहत स्विस सरकार को तानाशाहों की संपत्ति पर रोक लगाने का अधिकार मिल गया है। अरब जगत के घटनाक्रम को छवि चमकाने के अवसर के तौर पर लेते हुए स्विस राष्ट्रपति ने घोषणा की कि स्विटजरलैंड ऐसी वित्तीय व्यवस्था नहीं चाहता जिसमें गरीब देशों का काले धन जमा किया जाए। संदिग्ध खातों की निगरानी के बैंकों को निर्देश जारी कर दिए गए हैं और यह सुनिश्चित किया गया है कि खातेदार बैंक से पैसा न निकाल सकें। यूरोपीय संघ और अमेरिका भी ग्बोग्बो की संपत्ति पर रोक लगा चुका है। निश्चित तौर पर, इस घटनाक्रम ने भारत को भी सुअवसर प्रदान किया है कि वह स्विस बैंकों में काला धन जमा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करे। हालांकि स्विटजरलैंड, यूरोपीय संघ, ब्रिटेन और अमेरिका द्वारा की गई त्वरित कार्रवाई के विपरीत भारतीय खातेदारों के स्विस बैंकों और अन्य टैक्स हैवंन देशों में जमा कराए गए काले धन को वापस लाने में संप्रग सरकार का रवैया भयभीत करता है। स्वत: संज्ञान लेते हुए स्विस सरकार ने बेन अली समेत तीन तानाशाहों के खातों के परिचालन पर रोक लगा दी है किंतु मनमोहन सिंह हमें यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहे हैं कि हसन अली के आठ अरब डॉलर (करीब 35 हजार करोड़ रुपये) के खातों पर रोक लगाने में स्विस बैंक सहयोग नहीं कर रहा है। दूसरे शब्दों में, सूचना मात्र के आधार पर तीन तानाशाहों के बैंक खातों पर स्विस सरकार ने रोक लगा दी है, जबकि दूसरे सबसे बड़े देश और विश्व की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था भारत की अपील पर स्विटजरलैंड ध्यान नहीं दे रहा है। यह मनमोहन सिंह की कमजोरी ही है कि गुड़गांव से भी छोटा लिंचेस्टाइन भी सहयोग से इनकार कर हमारा मखौल उड़ा रहा है। निश्चित तौर पर कहीं न कहीं कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है। मनमोहन सिंह उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने के अनिच्छुक क्यों हैं, जिन्होंने देश को लूटा है। विदेशों में जमा काले धन पर भाजपा द्वारा गठित कार्य दल की रिपोर्ट के अनुसार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे वैश्विक संस्थानों का आकलन है कि 18,000 अरब डॉलर काला धन टैक्स हैवंस देशों में जमा है, इसमें से करीब पांच सौ अरब डॉलर की राशि भारतीयों की है। यह काला धन भारतीयों राजनेताओं, व्यापारियों, उद्यमियों और अन्य लोगों द्वारा भ्रष्टाचार, घूसखोरी, दलाली, कर चोरी और आपराधिक गतिविधियों से अर्जित किया गया है। अमेरिका और बहुत से अन्य देशों ने अपने देशवासियों द्वारा स्विस बैंकों में जमा कराए गए काले धन की जानकारी हासिल करने के लिए स्विटजरलैंड सरकार पर दबाव डाला था। उदाहरण के लिए अमेरिका ने बहला-फुसलाकर और यहां तक कि धमकी देकर यूबीएस बैंक को 4450 अमेरिकी खातेदारों की जानकारी देने को मजबूर किया था। जर्मनी ने लिंचेस्टाइन स्थित एलजीटी बैंक में जमा काले धन की जानकारी एक व्यक्ति से घूस देकर हासिल की। जर्मनी ने इस सूची में शामिल जर्मनवासियों के नाम पूरे देश के सामने उजागर किए और अन्य संबंधित देशों को खातादारों के नाम बताने की पेशकश की। अनेक यूरोपीय देशों ने इसका फायदा उठाते हुए काला धन जमा करने वालों के नाम हासिल किए और उनके खिलाफ कार्रवाई की। किंतु कुछ देशों में ऐसी सरकारें भी थीं, जो इस सूचना को प्राप्त करने के ख्याल से ही कांप उठी थीं। काला धन जमा करने वालों की सूची हासिल करने से घबराए देशों में भारत का स्थान सबसे ऊपर है। शायद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह सोचकर ही हालत खराब हो गई कि कहीं इस सूची में उनके आका या अन्य करीबियों के नाम न हों! सरकार द्वारा अपने पैर खींचने के बावजूद जर्मनी ने सरकार को सूची सौंप दी। इस घटना को लंबा अरसा बीत चुका है लेकिन भारत के लोगों को अब तक यह जानकारी नहीं दी गई है कि लिंचेस्टाइन में काला धन किसने जमा किया था। सरकार ने सार्वजनिक रूप से कहा कि यह सूचना गोपनीय है क्योंकि भ्रष्टाचारियों की गोपनीयता बनाए रखना सरकार का कर्तव्य है। इसके अलावा नाम इसलिए भी सार्वजनिक नहीं किए जा सकते क्योंकि मामला कोर्ट के अधीन है। हैरानी की बात है कि यद्यपि ये मामले काले धन से संबंधित हैं, फिर भी सरकार, जैसाकि हसन अली मामले में हुआ है, बता रही है कि मामले मात्र कर चोरी से जुड़े हैं। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है कि पिछले छह माह में केंद्र सरकार के पिटारे से भ्रष्टाचार के इतने कंकाल निकले हैं कि इससे संप्रग सरकार और संप्रग गठबंधन की अपूरणीय क्षति हुई है। पिछले दिनों मिश्च, ट्यूनीशिया और आइवरी कोस्ट के तानाशाहों के खातों पर रोक लगने से मनमोहन सिंह सरकार का काले धनवालों को बचाने का नकाब पूरी तरह उतर गया है। विदेशी बैंकों में भारतीयों द्वारा जमा काला धन देश में वापस लाने में अपनी अक्षमता जताने वाले उनके बहानों की कलई खुल गई है। जब तक सुप्रीम कोर्ट पहल करके सरकार को कार्रवाई करने पर मजबूर नहीं करता, भारत का स्वाभिमान खतरे में है। (लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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