Friday, February 11, 2011

स्पेक्ट्रम का जाल


2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में बुरी तरह फंसी केंद्र सरकार जिस तरह एक और स्पेक्ट्रम आवंटन विवाद में उलझ गई है उसके लिए वह खुद ही जिम्मेदार है। भले ही एस बैंड स्पेक्ट्रम आवंटन में दो लाख करोड़ रुपये की राजस्व क्षति न हुई हो, लेकिन खुद सरकार का आचरण इसकी पुष्टि कर रहा है कि कहीं कुछ गलत हुआ है। यदि कुछ गड़बड़ी नहीं हुई तो इस मामले की जांच कराने की जरूरत क्यों पड़ रही है? इससे भी गंभीर सवाल यह है कि केंद्र सरकार तब क्यों जागी जब यह शोर मच गया कि एक और स्पेक्ट्रम घोटाले को अंजाम दे दिया गया? भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो की वाणिज्यिक शाखा एंट्रीक्स कॉरपोरेशन और एक निजी कंपनी देवास मल्टीमीडिया के बीच जो करार हुआ वह अनेक गंभीर सवाल खड़े करता है। यह तो समझ आता है कि 2005 में प्रतिस्प‌र्द्धी कंपनियों और नीलामी प्रक्रिया के अभाव में इसरो के पूर्व वैज्ञानिक सचिव एमजी चंद्रशेखर के स्वामित्व वाली देवास मल्टीमीडिया के साथ करार करना उपयुक्त पाया गया, लेकिन आखिर इतने दुर्लभ स्पेक्ट्रम के 70 मेगा हर्ट्ज के 20 वर्ष तक के अनियंत्रित इस्तेमाल करने की रियायत का क्या मतलब? क्या केंद्र सरकार में कोई भी यह नहीं समझ सका कि ऐसे करार से देवास मल्टीमीडिया को एक तरह से सोने का अंडा देने वाली मुर्गी मिल जाएगी? क्या यह माना जाए कि केंद्र सरकार के अंतरिक्ष विभाग में गूढ़ तकनीकी एवं वैज्ञानिक मामलों की समझ रखने वाले लोग नहीं हैं? इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि केंद्र सरकार इसरो की वाणिज्यिक शाखा और देवास मल्टीमीडिया के बीच हुए करार को रद्द करने पर विचार कर रही है और करार की जांच के लिए पूर्व कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक समिति भी बना दी गई है। आखिर यह काम समय रहते क्यों नहीं किया गया और वह भी तब जब कानून मंत्रालय ने उक्त करार को रद्द करने का सुझाव बहुत पहले दे दिया था? यदि प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत काम करने वाले अंतरिक्ष विभाग को कानून मंत्रालय की राय रास नहीं आई थी तो फिर इसे स्पष्ट किया जाना चाहिए था। कानून मंत्रालय की राय पर जिस तरह चुप्पी साध ली गई और कोई निर्णय भी नहीं लिया गया उससे न केवल सरकार के इरादों के प्रति संदेह पैदा होता है, बल्कि उसके काम-काज की शैली पर प्रश्नचिह्न भी लगते हैं। आखिर यह कैसी सरकार है जो अनुचित मामलों में भी तत्परता का परिचय देने से इंकार करती है? इस मामले में इसरो की यह सफाई भी समझ से परे है कि देवास मल्टीमीडिया के साथ हुए सौदे के बारे में न तो अंतरिक्ष आयोग को कोई जानकारी दी गई और न ही केंद्रीय मंत्रिमंडल को। क्या कोई बताएगा इतने महत्वपूर्ण मामले में भी अंतरिक्ष आयोग को अंधेरे में रखने का क्या मतलब? इसरो के विचित्र स्पष्टीकरण के बाद इस सवाल का जवाब सामने आना और भी आवश्यक हो जाता है कि केंद्र सरकार ने इस संदिग्ध करार को रद्द करने में तत्परता दिखाने के बजाय हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहना उचित क्यों समझा? क्या वह घोटाला होने अथवा मीडिया में शोर मचने का इंतजार कर रही थी? नि:संदेह ये वे सवाल हैं जो घपलों-घोटालों में डूबी केंद्र सरकार की बची-खुची प्रतिष्ठा का हरण करने वाले हैं।


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