Monday, February 21, 2011

रामदेव का रास्ता


भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहा है एक और अभियान
भ्रष्टाचार और काले धन के पीछे आजकल बाबा रामदेव लाठी लेकर पड़े हैं, जिससे उनके अनुयायियों में भी बहुत उत्साह है। मीडिया का एक हिस्सा भी योगगुरु के इस नए अवतार से खुश है। हालांकि राजनीतिक चिंतक, विश्लेषक और मुख्यधारा का मीडिया बाबा को गंभीरता से नहीं ले रहा। वैसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन के कई दौर आ चुके हैं। सबसे पहला दौर जयप्रकाश नारायण का था, जो 1974 में शुरू हुआ। केवल उत्तर भारत में उसका असर रहा और आपातकाल के रास्ते जनता दल के गठन तक उसकी परिणति हो गई। भ्रष्टाचार जस का तस रहा।
दूसरा दौर विश्वनाथ प्रताप सिंह का था, जो 1987 में शुरू हुआ। वर्ष 1989 में राजीव गांधी को हटाकर वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। पर 1990 में उनका भी बंटाधार हो गया। तीसरा दौर 1993 में शुरू हुआ, जब मैंने 115 ताकतवर नेताओं और अफसरों के खिलाफ जैन हवाला कांड को लेकर संघर्ष शुरू किया और 1996 में इन सबके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करवाकर दम लिया। आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ। उसके बाद दर्जनों दल मिलकर सरकार बनाते रहे और हवाला आरोपी फिर से निकल भागे। अब यह चौथा दौर शुरू हुआ है। अगर बाबा रामदेव और उनके अनुयायी अपने उद्देश्य में सफल होते हैं, तो यह देश का सौभाग्य होगा।
मानना पड़ेगा कि बाबा रामदेव ने बड़ी सूझ-बूझ, दूरदृष्टि और व्यावसायिक प्रबंधन के साथ अपना तंत्र खड़ा किया है, जिसके सहारे अब वह राजनीतिक परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं। दरअसल यश और धन प्राप्त होने के बाद व्यक्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग उठती है। अगर यही बात बाबा रामदेव पर लागू है, तो उनके प्रयास बहुत दूर तक सफल नहीं हो पाएंगे। लेकिन अगर उनका मनोरथ देश का सुधार करना है, तो यह सौभाग्य की बात है।
शास्त्रों में एक उक्ति है, फलेन परिचयेत यानी फल से परिचय मिलता है। जिस लगन, समर्पण और उत्साह से बाबा रामदेव भारत स्वाभिमान ट्रस्टके लिए जनजागरण करने निकले हैं, उससे दिख भी रहा है कि वह वास्तव में अपने आदर्शों के लिए जी-जान से जुटे हैं। जिस तरह उन्होंने योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और भारतीय संस्कृति के पुनरोद्धार का बीड़ा उठाया है, उससे देश के करोड़ों लोगों को लाभ पहुंचा है। सफल व्यक्तित्व के निंदक भी पैदा हो ही जाते हैं, जिसकी उन्हें परवाह नहीं। संत समाज में ही मेंढकों की-सी प्रवृत्ति होती है, जो आगे बढ़ने के बजाय टांग खींचने में विश्वास रखते हैं।
बाबा रामदेव के राजनीतिक अभियान को लेकर पहले बहुतेरे लोग सशंकित थे, लेकिन अब ऐसा लगता है कि उनकी भावना काफी प्रबल है। पर राजनीतिक धरातल की सचाइयां भावना के क्षेत्र से बहुत तालमेल नहीं रखतीं। उसके लिए एक दूसरे किस्म के कौशल की आवश्यकता होती है। वैसे भी हमारी सनातन परंपरा में चार प्रकार की सत्ताओं का महत्व बताया गया है, धर्म सत्ता, राजसत्ता, समाज सत्ता और परिवार सत्ता। इस दृष्टि से अगर देखें, तो समाज को खोए हुए जीवन मूल्यों की ओर लौटाने का बाबा रामदेव का अथक प्रयास और जीवट अनुकरणीय है।
पर यह ऐतिहासिक तथ्य है कि चारों में से किसी एक सत्ता ने जब दूसरी सत्ता के क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयास किया, तो समाज का संतुलन बिगड़ गया। बाबा रामदेव और उनके अनुयायी अन्यथा न लेकर इसे सही परिप्रेक्ष्य में देखें, तो उन्हें लाभ ही होगा। आज उनके पास साधन, पहचान और विचार, तीनों हैं, पर इतने नहीं कि सैकड़ों वर्षों की भारतीय व्यवस्थाओं को रातोंरात बदला जा सके।
इस देश में राजनीतिक चिंतन करने वाले ऐसे तमाम लोग हैं, जिनकी बुद्धि, विचार, आचरण और अनुभव इस अभियान के लिए बहुमूल्य हैं। साधनों के अभाव में वे अलग-थलग पड़े हैं। ऐसे लोगों को साथ जोड़कर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का अगुवा उन्हें बनाना चाहिए। इससे समाज का विश्वास बढ़ेगा। कोई व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, उसे परिवर्तन का अगुवा बनाने में समाज को तब तक संकोच होता है, जब तक उसके कृतित्व सामने न आ जाएं। अपने चैनल पर लगातार खुद छाए रहकर और अपने ही सहायकों को बार-बार बैठाकर जो प्रस्तुति बाबा रामदेव करते हैं, वह उनके अनुयायियों को भले बहुत अच्छी लगती हो, पर बहुसंख्यक समाज को वह रटी-रटाई, उबाऊ और रसहीन प्रतीत होती है। ऐसे में बाबा रामदेव को चाहिए कि वह अपने टीवी चैनल को व्यक्ति केंद्रित न रखकर राष्ट्र केंद्रित करें।
इसके अलावा उन्हें मध्यवर्गीय समाज और मीडिया के प्रचार तंत्र के शिकंजे से बाहर निकलकर सही लोगों को ढूंढने और अपने साथ जोड़ने का प्रयास करना होगा। क्योंकि मीडिया और मध्यवर्गीय समाज के लोग प्राय: जिन्हें धर्मयोद्धा बनाकर पेश करते हैं, वे असल में कागज के शेर होते हैं। जाहिर है, असली शेरों को लाकर वे अपने अस्तित्व के लिए खतरा पैदा नहीं करना चाहते। इसीलिए उनके हर प्रयास चर्चा में तो खूब रहते हैं, पर परिणाम तक नहीं ले जा पाते। परिणाम तक ले जाने का न तो उनका इरादा होता है और न ही जीवट। इसलिए वे लोग लड़ाई में कूदते नहीं, उसकी चर्चा भर करते हैं। शायद बाबा रामदेव इस तथ्य से परिचित नहीं। इसलिए प्राय: उनके मंचों पर वही चर्चित चेहरे दिखाई पड़ते हैं, जो टीवी चैनलों की बहसों में दिखते हैं। इन चेहरों का पेशा ही चर्चा में बने रहना है। किसी मुद्दे के प्रति समर्पण नहीं, पर हर मुद्दे पर राय देने को तैयार। बाबा रामदेव अगर धर्मसत्ता के ही दायरे में सीमित रहें और राजसत्ता, परिवार सत्ता और समाज सत्ता को मजबूत करने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाएं, तो इस युग के इतिहास पुरुष बन सकते हैं।
बेहतर हो कि वह धर्मसत्ता के दायरे में रहकर ही राजसत्ता को मजबूत करने में उत्प्रेरक की
भूमिका निभाएं।

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