Friday, February 18, 2011

प्रमुख सचिव के संरक्षण में हुआ 10 करोड़ का घोटाला


रायबरेली।स्थानान्तरित जिला पंचायत राज अधिकारी हरीशंकर मिश्र ने तत्कालीन डीएम चरनजीत सिंह बख्शी की मिलीभगत से दस करोड़ रुपए का घोटाला किया लेकिन इस घोटाले के असली संरक्षक प्रदेश के तत्कालीन प्रमुख सचिव पंचायतीराज शर्मा थे ।

जो पता नहीं किस कारण डीपीआरओ हरीशंकर मिश्र पर इस कदर मेहरबान थे कि डीपीआरओ द्वारा डीएम के निर्देशों को धता बताने शासकीय निर्देशों की धज्जियां उड़ाने पंचायतीराज निदेशक पर दबाव डालने जैसी हिमाकत करने के अलावा सीडीओ को सह खातेदारी हटवाने जैसे कारनामे यह अंजाम दिए और यह सब उस भ्रष्ट अधिकारी ने प्रमुख सचिव आर के शर्मा के संरक्षण के बलबूते पर किया और प्रमुख सचिव ने डीपीआरओ को इतना आगे बढ़कर संरक्षण दिया जैसे वे कैबिनेट और सरकार से भी ऊपर हों। उन्होंने अपने स्तर से सिर्फ रायबरेली के लिए सीडीओ से वित्तीय अधिकार हटाकर डीएम को कर दिया और इस तरह शौचालय सीटों के क्रय में करोड़ों की हेराकेरी का मार्ग उन्होंने ही प्रशस्त किया। 

डीपीआरओ ने नान अम्बेडकर गांवों में 17 हजार 127 शौचालय 2200 की दर से उपलब्ध कराने का अनुमोदन डीएम से प्राप्त किया और बाद में इस अनुमोदन को बदल डाला और डीएम को धता बताते हुए मनमाने ढंग से शौचालय सीटें खरीदने के आदेश जारी कर दिए। जिन सेटों को बछरावां केंद्र 200 रुपए प्रति सेट आपूर्ति कर रहा था उसे डीपीआरओ ने 345 रुपए प्रति सेट खरीदा। इस संबंध में केंद्र व राज्य के स्पष्ट निर्देश हैं कि जिला स्वच्छता मिशन का गठन किया जाएगा जो योजना में क्रय की जाने वाली सामग्री एवं कार्य संचालन के दिशा निर्देश हेतु उत्तरदाई होगी लेकिन डीपीआरओ ने शासन और सरकार के नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए जिला स्तर पर बिना टेंडर कोटेशन के बजारू दर से दो तीन गुना महंगे दामों पर सामग्री क्रय की। सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान में जिला स्तर पर खोले गए खातों के संचालन में डीपीआरओ के साथ सीडीओ को सह खातेदार नामित किया गया सीडीओ के द्वारा बार बार आपत्ति करने और कूटरचित पत्रावलियों का निस्तारण करने से मना करने के कारण डीपीआरओ ने अपने आका प्रमुख सचिव को डीएम से एक पत्र लिखाया और उसके आधार पर सीडीओ को नामित सह खातेदार से हटाकर डीएम को नामित कर दिया गया। 

यह कैबिनेट द्वारा अनुमोदित आदेशों का खुला उल्लंघन है फिर भी प्रमुख सचिव स्तर की मनमानी होने के कारण पर उंगली भी नहीं उठी। उल्लेखनीय यह भी है कि डीपीआरओ को दस करोड़ 23 लाख रुपए सम्पूर्ण स्वच्छता अभियान के लिए मिले जिसमें 102 लाख 29 हजार प्रचार-प्रसार पर खर्च होना था लेकिन इस बेइमान अधिकारी ने 6 करोड़ से अधिक खर्च कर डाले। उल्लेखनीय यही है कि 10 करोड़ के अभियान में 6 करोड़ यानि आधे से अधिक सिर्फ प्रचार पर खर्च करना बदनियती का स्पष्ट परिचायक है। कहा जा रहा है क्रय किए गए सामान की घटिया गुणवत्ता अधिक कीमत आदि गबन की श्रेणी में आता है इस लिहाज से भ्रष्ट डीपीआरओ और तत्कालीन डीएम चरनजीत सिंह बख्शी के विरुद्ध पुलिस में एफआईआर दर्ज होनी चाहिए ताकि इन दोनों बेइमानों को सबक मिल सके। उल्लेखनीय यह भी है कि डीपीआरओ के इस दस करोड़ के घोटाले की पोल किसी और ने नहीं बल्कि विभाग के ही सहायक डीपीआरओ ने खोली है जो प्रमुख सचिव और डीपीआरओ के अनुचित गठजोड़ से प्रभावित होकर मुख्यालय से सम्बद्ध है। उल्लेखनीय यह भी है कि भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के अवर सचिव ने यह मामला प्रदेश के प्रमुख सचिव पंचायती राज के पास घोटाले की विजिलेंस-सीबीआई जांच कराने के सम्बंध में संस्तुति हेतु भेजा लेकिन प्रमुख सचिव मामले को दबाए रहे। उनके तबादले के बाद शासन कुछ हरकत में आया तो डीपीआरओ का तबादला भी हुआ लेकिन उसके द्वारा किए गए घोटाले की जांच के आदेश अब तक नहीं हुए हैं। इस मामले में भी माया सरकार की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है.

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