दुनिया में करचोरी और भ्रष्ट आचरण से कमाया धन सुरक्षित रखने की पहली पसंद स्विस बैंक रहे हैं। क्योंकि यहां खाताधारकों के नाम गोपनीय रखने संबंधी कानून का पालन कड़ाई से होता है। बैंकों के खाते में खाताधारी का केवल नंबर रहता है। नाम की जानकारी कुछ ही अधिकारियों को रहती है। ऐसे ही स्विस बैंक से सेवा निवृत एक अधिकारी रूडोल्फ ऐल्मर ने दो हजार भारतीय खाताधारकों की सूची विकीलीक्स को सौंपी है। तय है, अंसाजे देर-सबेर इसे इंटरनेट पर डाल देंगे। फ्रांस सरकार ने भी हर्व फेल्सियानी से मिली एचएसबीसी बैंक की सीडी ग्लोबल फाइनेंशल इंस्टीट्यूट को हासिल कराई है, जिसमें अनेक भारतीयों के नाम दर्ज हैं। स्विस बैंक एसोसिएशन की तीन साल पहले जारी रिपोर्ट के हवाले से स्विस बैंकों में कुल जमा भारतीय धन 66 हजार अरब रुपए है। स्विस और जर्मनी के अलावा दुनिया में ऐसे 69 ठिकाने और हैं जहां काला धन जमा करने की आसान सुविधा हासिल है। भारत मामले को कर चोरी और दोहरी कराधान संधियों का हवाला दे टाल रहा है। तर्क है कि खाताधारियों के नाम सार्वजनिक करने के लिए चल रहे करारों को बदलना होगा। बहरहाल सरकार का रुख काले धन की वापसी के लिए साफ नहीं है। यह इससे जाहिर होता है कि कुछ समय पहले भारत और स्विट्जरलैंड के बीच दोहरे कराधान संशोधन के लिए संशोधित प्रोटोकॉल संपादित हुआ था। लेकिन इस पर दस्तखत करते वक्त भारत ने कोई ऐसी शर्त नहीं रखी जिससे काले धन की वापसी का रास्ता प्रशस्त होता। दुनिया में 77.6 प्रतिशत काली कमाई ट्रांसफर प्राइसिंग (संबद्ध पक्षों के बीच सौदों में मूल्य अंतरण) के जरिए पैदा हो रही है। भारत में संबद्ध फर्मों के बीच इस तरह के मूल्य अंतरण में हेराफेरी रोकने का प्रयास 2000 के आसपास वजूद में आने लगा था। सरकार इसे और कड़ा कर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की सोच रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्तराष्ट्र ने एक संकल्प पारित किया है, जिसका मकसद है गैरकानूनी तरीके से विदेशों में जमा काला धन वापस लाया जा सके। इस पर भारत समेत 140 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं और 126 देशों ने तो इसे लागू कर काला धन वसूलना शुरू भी कर दिया है। यह संकल्प 2003 में पारित हुआ था, लेकिन भारत सरकार इसे टालती रही। आखिरकार 2005 में उसे हस्ताक्षर करने पड़े लेकिन इसके सत्यापन में अब भी टालबराई हो रही है। स्विट्जरलैंड के कानून के अनुसार कोई भी देश संकल्प को सत्यापित किए बिना विदेशों में जमा धन की वापसी की कार्रवाई नहीं कर पाएगा। हालांकि स्विट्जरलैंड सरकार की संसदीय समिति ने इस मामले में भारत सरकार के प्रति उदारता बरतते हुए दोनों देशों के बीच हुए समझौते को मंजूरी दे दी है। मतलब स्विट्जरलैंड भारत के सहयोग को तैयार है लेकिन भारत ही कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते पीछे हट रहा है। पश्चिमी देशों को मंदी की मार ने यह समझ दी कि काला धन उस आधुनिक पूंजीवाद की देन है जो विश्वव्यापी आर्थिक संकट का कारण बना। 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका की आंखें खुलीं कि दुनिया के नेता, नौकरशाह, कारोबारी और दलालों का गठजोड़ ही नहीं आतंकवाद का पर्याय ओसामा बिन लादेन भी अपना धन इन बैंकों में जमा कर दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। नतीजतन पहले जर्मनी ने ‘वित्तीय गोपनीय कानून’ शिथिल कर काला धन जमा करने वालों के नाम उजागर करने के लिए स्विट्जरलैंड पर दबाव बनाया और फिर इस मकसद पूर्ति के लिए इटली, फ्रांस, अमेरिका एवं ब्रिटेन आगे आए। अमेरिका ने स्विट्जरलैंड पर इतना दबाव बनाया कि वहां के यूबीए बैंक ने कालाधन जमा करने वाले 17 हजार अमेरिकियों की सूची तो दी ही, काले धन की एक राशि भी वापिसी भी कर दी। मुद्रा के नकदीकरण से जूझ रही पूरी दुनिया में बैंकों की गोपनीयता समाप्त करने का वातावरण बनना शुरू हो चुका है। इसी दबाव के चलते स्विट्जरलैंड सरकार ने कालाधन जमा करने वाले देशों की सूची जारी की है। इसमें दो हजार भारतीय खाताधारियों के भी नाम बताए जा रहे हैं। इस अंतरराष्ट्रीय काले कानून को खत्म करने के दृष्टिगत अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बन रहा है। स्विस बैंकों में काला धन जमा करने का सिलसिला दो शताब्दियों से चल है। लेकिन कभी किसी देश ने आपत्ति नहीं की। आर्थिक मंदी का सामना करने पर पश्चिमी देश चेते और कड़ाई से पेश आए। 2008 में जर्मनी की सरकार ने लिश्टेंस्टीन बैंक के कर्मचारी हर्व फेल्सियानी को धर दबोचा जिसके पास कर चोरी करने वाले जमाखोरों की सूची की सीडी थी। इसमें जर्मनी के अलावा कई देशों के लोगों के खातों का ब्यौरा था। लिहाजा जर्मनी ने उन सभी देशों को सीडी देने का प्रस्ताव रखा जिनके नागरिकों के सीडी में नाम थे। अमेरिका, ब्रिटेन और इटली ने तत्परता से सीडी की प्रतिलिपि हासिल कर धन वसूलने की कार्रवाई भी शुरू कर दी। फ्रांस के हाथ भी एक ऐसी सीडी लगी। फ्रांस ने अमेरिका, इंग्लैंड, स्पेन और इटली के साथ खाताधारकों की जानकारी बांटकर सहयोग किया। दूसरी तरफ ऑर्गनाइजेशन फॉर इकॉनोमिक कापरेरेशन एंड डवलपमेंट इंस्टीट्यूट ने स्विट्जरलैंड समेत उन 40 देशों के बीच कर सूचना आदान-प्रदान संबंधी 500 से अधिक संधियां कीं। शुरूआती दौर में स्विट्जरलैंड और लिश्टेंस्टीन जैसे देशों ने आनाकानी की, लेकिन अंतत: अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे उन्होंने घुटने टेक दिए। अन्य देशों ने भी ऐसी संधियों का अनुसरण किया, लेकिन भारत ने अब तक एक भी देश से संधि नहीं की है।
Thursday, February 17, 2011
कालेधन का छीजता सुरक्षा कवच
दुनिया में करचोरी और भ्रष्ट आचरण से कमाया धन सुरक्षित रखने की पहली पसंद स्विस बैंक रहे हैं। क्योंकि यहां खाताधारकों के नाम गोपनीय रखने संबंधी कानून का पालन कड़ाई से होता है। बैंकों के खाते में खाताधारी का केवल नंबर रहता है। नाम की जानकारी कुछ ही अधिकारियों को रहती है। ऐसे ही स्विस बैंक से सेवा निवृत एक अधिकारी रूडोल्फ ऐल्मर ने दो हजार भारतीय खाताधारकों की सूची विकीलीक्स को सौंपी है। तय है, अंसाजे देर-सबेर इसे इंटरनेट पर डाल देंगे। फ्रांस सरकार ने भी हर्व फेल्सियानी से मिली एचएसबीसी बैंक की सीडी ग्लोबल फाइनेंशल इंस्टीट्यूट को हासिल कराई है, जिसमें अनेक भारतीयों के नाम दर्ज हैं। स्विस बैंक एसोसिएशन की तीन साल पहले जारी रिपोर्ट के हवाले से स्विस बैंकों में कुल जमा भारतीय धन 66 हजार अरब रुपए है। स्विस और जर्मनी के अलावा दुनिया में ऐसे 69 ठिकाने और हैं जहां काला धन जमा करने की आसान सुविधा हासिल है। भारत मामले को कर चोरी और दोहरी कराधान संधियों का हवाला दे टाल रहा है। तर्क है कि खाताधारियों के नाम सार्वजनिक करने के लिए चल रहे करारों को बदलना होगा। बहरहाल सरकार का रुख काले धन की वापसी के लिए साफ नहीं है। यह इससे जाहिर होता है कि कुछ समय पहले भारत और स्विट्जरलैंड के बीच दोहरे कराधान संशोधन के लिए संशोधित प्रोटोकॉल संपादित हुआ था। लेकिन इस पर दस्तखत करते वक्त भारत ने कोई ऐसी शर्त नहीं रखी जिससे काले धन की वापसी का रास्ता प्रशस्त होता। दुनिया में 77.6 प्रतिशत काली कमाई ट्रांसफर प्राइसिंग (संबद्ध पक्षों के बीच सौदों में मूल्य अंतरण) के जरिए पैदा हो रही है। भारत में संबद्ध फर्मों के बीच इस तरह के मूल्य अंतरण में हेराफेरी रोकने का प्रयास 2000 के आसपास वजूद में आने लगा था। सरकार इसे और कड़ा कर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाने की सोच रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्तराष्ट्र ने एक संकल्प पारित किया है, जिसका मकसद है गैरकानूनी तरीके से विदेशों में जमा काला धन वापस लाया जा सके। इस पर भारत समेत 140 देशों ने हस्ताक्षर किए हैं और 126 देशों ने तो इसे लागू कर काला धन वसूलना शुरू भी कर दिया है। यह संकल्प 2003 में पारित हुआ था, लेकिन भारत सरकार इसे टालती रही। आखिरकार 2005 में उसे हस्ताक्षर करने पड़े लेकिन इसके सत्यापन में अब भी टालबराई हो रही है। स्विट्जरलैंड के कानून के अनुसार कोई भी देश संकल्प को सत्यापित किए बिना विदेशों में जमा धन की वापसी की कार्रवाई नहीं कर पाएगा। हालांकि स्विट्जरलैंड सरकार की संसदीय समिति ने इस मामले में भारत सरकार के प्रति उदारता बरतते हुए दोनों देशों के बीच हुए समझौते को मंजूरी दे दी है। मतलब स्विट्जरलैंड भारत के सहयोग को तैयार है लेकिन भारत ही कमजोर राजनीतिक इच्छाशक्ति के चलते पीछे हट रहा है। पश्चिमी देशों को मंदी की मार ने यह समझ दी कि काला धन उस आधुनिक पूंजीवाद की देन है जो विश्वव्यापी आर्थिक संकट का कारण बना। 9/11 के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका की आंखें खुलीं कि दुनिया के नेता, नौकरशाह, कारोबारी और दलालों का गठजोड़ ही नहीं आतंकवाद का पर्याय ओसामा बिन लादेन भी अपना धन इन बैंकों में जमा कर दुनिया के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। नतीजतन पहले जर्मनी ने ‘वित्तीय गोपनीय कानून’ शिथिल कर काला धन जमा करने वालों के नाम उजागर करने के लिए स्विट्जरलैंड पर दबाव बनाया और फिर इस मकसद पूर्ति के लिए इटली, फ्रांस, अमेरिका एवं ब्रिटेन आगे आए। अमेरिका ने स्विट्जरलैंड पर इतना दबाव बनाया कि वहां के यूबीए बैंक ने कालाधन जमा करने वाले 17 हजार अमेरिकियों की सूची तो दी ही, काले धन की एक राशि भी वापिसी भी कर दी। मुद्रा के नकदीकरण से जूझ रही पूरी दुनिया में बैंकों की गोपनीयता समाप्त करने का वातावरण बनना शुरू हो चुका है। इसी दबाव के चलते स्विट्जरलैंड सरकार ने कालाधन जमा करने वाले देशों की सूची जारी की है। इसमें दो हजार भारतीय खाताधारियों के भी नाम बताए जा रहे हैं। इस अंतरराष्ट्रीय काले कानून को खत्म करने के दृष्टिगत अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बन रहा है। स्विस बैंकों में काला धन जमा करने का सिलसिला दो शताब्दियों से चल है। लेकिन कभी किसी देश ने आपत्ति नहीं की। आर्थिक मंदी का सामना करने पर पश्चिमी देश चेते और कड़ाई से पेश आए। 2008 में जर्मनी की सरकार ने लिश्टेंस्टीन बैंक के कर्मचारी हर्व फेल्सियानी को धर दबोचा जिसके पास कर चोरी करने वाले जमाखोरों की सूची की सीडी थी। इसमें जर्मनी के अलावा कई देशों के लोगों के खातों का ब्यौरा था। लिहाजा जर्मनी ने उन सभी देशों को सीडी देने का प्रस्ताव रखा जिनके नागरिकों के सीडी में नाम थे। अमेरिका, ब्रिटेन और इटली ने तत्परता से सीडी की प्रतिलिपि हासिल कर धन वसूलने की कार्रवाई भी शुरू कर दी। फ्रांस के हाथ भी एक ऐसी सीडी लगी। फ्रांस ने अमेरिका, इंग्लैंड, स्पेन और इटली के साथ खाताधारकों की जानकारी बांटकर सहयोग किया। दूसरी तरफ ऑर्गनाइजेशन फॉर इकॉनोमिक कापरेरेशन एंड डवलपमेंट इंस्टीट्यूट ने स्विट्जरलैंड समेत उन 40 देशों के बीच कर सूचना आदान-प्रदान संबंधी 500 से अधिक संधियां कीं। शुरूआती दौर में स्विट्जरलैंड और लिश्टेंस्टीन जैसे देशों ने आनाकानी की, लेकिन अंतत: अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे उन्होंने घुटने टेक दिए। अन्य देशों ने भी ऐसी संधियों का अनुसरण किया, लेकिन भारत ने अब तक एक भी देश से संधि नहीं की है।
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