Tuesday, February 15, 2011

हाथ से फिसलते हालात


यदि आने वाले दिनों में केंद्र सरकार से जुड़ा कोई और घपला-घोटाला सामने आ जाए तो आश्चर्य नहीं, क्योंकि अब यह साबित हो गया है कि खुद प्रधानमंत्री कार्यालय भी उन्हें रोकने में समर्थ नहीं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो की वाणिज्यिक शाखा एंट्रिक्स कारपोरेशन और निजी कंपनी देवास मल्टीमीडिया के बीच अब हुए संदिग्ध करार ने इस धारणा पर मुहर लगा दी है कि प्रधानमंत्री यह भी नहीं देख पा रहे हैं कि उनकी नाक के नीचे क्या हो रहा है? यह करार ठीक उसी तरह प्रधानमंत्री कार्यालय के गले की हड्डी बन गया है जैसे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री की ओर से नियुक्त किए गए केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस। केंद्र सरकार के पास जिस तरह थॉमस को हटाने का कोई आसान उपाय नहीं है उसी तरह एंट्रिक्स कारपोरेशन और देवास मल्टीमीडिया के बीच हुए करार को भी एक झटके में रद्द करने का भी कोई रास्ता नहीं है। पहले यह कहा गया था कि कैबिनेट की अगली बैठक में इस करार को रद्द कर दिया जाएगा, लेकिन बाद में उसकी जांच के लिए न केवल एक समिति गठित कर दी गई, बल्कि मामले को कैबिनेट की सुरक्षा संबंधी मामलों की समिति के हवाले करने का फैसला लिया गया। केंद्र सरकार के लिए इससे बुरा और क्या हो सकता है कि वह एक अनुचित करार को रद्द करने का उचित तरीका नहीं तलाश पा रही है? आम जनता के लिए यह समझना कठिन हो सकता है कि एंट्रिक्स कारपोरेशन और देवास मल्टीमीडिया में हुए करार में अनुचित क्या है, लेकिन उसके पास यह संदेश जा चुका है कि यह भी 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन जैसा एक घोटाला है। दरअसल अब आम जनता के लिए केंद्र सरकार के घोटाले गिनना मुश्किल हो रहा है। घपला-घोटाला करने वाले तत्वों को रोकने में प्रधानमंत्री की अक्षमता उजागर हो जाने के कारण आम जनता इसके लिए मानसिक रूप से तैयार है कि कुछ और घोटाले सामने आ सकते हैं। इस मानसिकता का निर्माण किया है केंद्र सरकार के नाकारापन ने। चूंकि नाकारापन का प्रदर्शन शीर्ष स्तर पर हुआ है इसलिए आम जनता को यह उम्मीद भी नहीं कि भविष्य में कुछ बेहतर और भला हो सकेगा। अब यह एक तथ्य है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समर्थक-प्रशंसक तेजी से घटते जा रहे हैं। जो खुशवंत सिंह कुछ दिन पहले उन्हें नेहरू के बाद सबसे योग्य प्रधानमंत्री बता रहे थे उन्होंने भी केंद्रीय मंत्रिमंडल के हालिया फेरबदल पर निराशा जताई। अभी तक मनमोहन सिंह कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत थे। अब यह ताकत कमजोरी में तब्दील हो चुकी है। प्रधानमंत्री से न केवल त्यागपत्र मांगा जा रहा है, बल्कि उनसे उन्हें, उनकी सरकार और कांग्रेस को असहज करने वाले सवाल पूछे जा रहे हैं। ये सामान्य से सवाल हैं जैसे प्रधानमंत्री ने ए. राजा का बचाव क्यों किया था, सीवीसी के रूप में थॉमस को ही सबसे उपयुक्त क्यों पाया गया, एंट्रिक्स-देवास करार पर कानून मंत्रालय की राय की अनदेखी क्यों की गई? समस्या यह है कि ऐसे सवालों की सूची दिन प्रतिदिन लंबी होती जा रही है और इनमें से कुछ विपक्ष पूछ रहा है तो कुछ न्यायपालिका। नि:संदेह सबसे ज्यादा सवाल मीडिया पूछ रहा है, लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता ऐसे सवालों का सामना करने से कन्नी काट रहे हैं। वे टीवी चैनलों के कैमरों का सामना करने के लिए तैयार नहीं। जब कभी वे सरकार का बचाव करने के लिए आगे आते भी हैं तो उनके पास कुतर्को के अलावा और कुछ नहीं होता। वे एक लाख 76 हजार करोड़ रुपये के स्पेक्ट्रम घोटाले के जवाब में जब पूर्व भाजपा अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण की ओर से ली गई एक लाख रुपये की घूस को याद करते हैं तो बहुत से लोग खीझकर चैनल बदल देते हैं। यह लगभग तय है कि कांग्रेस और केंद्र सरकार को कुछ और तीखे सवालों का सामना संसद के बजट सत्र में करना होगा। संकेत हैं कि सरकार स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए संयुक्त संसदीय समिति के गठन को राजी हो गई है। यदि वास्तव में ऐसा है तो उसकी गति उस शेखचिल्ली जैसी होने जा रही है जो प्याज भी खाता है और कोड़े भी। कांग्रेस को यह आभास होना चाहिए कि केंद्र सरकार जनता की नजरों से गिर नहीं रही जैसा कि कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री ने माना था, बल्कि उसकी नजरों से उतर चुकी है। नि:संदेह केंद्र सरकार के भविष्य को लेकर प्रधानमंत्री को भी चिंतित होना चाहिए, लेकिन उनसे ज्यादा सोनिया गांधी को और उनसे भी अधिक राहुल गांधी को होना चाहिए, जो कांग्रेस के जनाधार को बढ़ाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं। यह समझने के लिए किसी को राजनीतिशास्त्री होने की जरूरत नहीं कि राहुल गांधी की कोशिशों पर सबसे ज्यादा पानी इसलिए फिर रहा है, क्योंकि केंद्र सरकार की छवि गिरती चली जा रही है। यदि कांग्रेस के नीति-नियंताओं को यह साधारण सी बात समझ नहीं आ रही कि घपलों-घोटालों के कारण कुचर्चित केंद्रीय सत्ता के सहारे पार्टी का जनाधार नहीं बढ़ाया जा सकता तो इसका मतलब है कि वे राहुल गांधी के हाथों में कोई जादू की छड़ी देख रहे हैं। (लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडीटर हैं)

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