Thursday, February 10, 2011

दागी कौन है


थॉमस के तर्कों से एक बड़ा सांविधानिक सवाल उठ खड़ा हुआ है
आरोपों से घिरे केंद्रीय सतर्कता आयुक्त पीजे थॉमस ने अपने बचाव में जो तर्क पेश किए हैं, वे कितने विधिसम्मत हैं, इस पर निर्णय तो सर्वोच्च न्यायालय ही करेगा, लेकिन यह प्रश्न अपनी जगह बना ही रहेगा कि वे कौन-कौन से पद हैं, जिनके संबंध में सर्वोच्च न्यायालय को विचार करने की पात्रता नहीं है। साथ ही इस सवाल का जवाब देना पड़ेगा कि आरोपित, दोषी, दागी और दोषसिद्ध आरोपी क्या समानार्थी हैं।
एक ओर तो ऐसे लोग हैं, जिनके खिलाफ एक नहीं, कई मुकदमे लंबित हैं और न्यायालयों में उनसे संबंधित आरोप पत्रों पर विचार भी हो रहा है। ये लोग मंत्रिपरिषद का सदस्य होने के साथ सरकार में अपनी निर्णायक भूमिका भी निभा सकते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ऐसे मामले में कोई दखल इसलिए नहीं दे सकता, क्योंकि मंत्रियों का चयन मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के परामर्श के अनुसार राज्यपाल अथवा राष्ट्रपति को करना है। इसकी पात्रता के लिए अलग से कोई आचार संहिता नहीं बनी है।
एक बार संसद को चुनाव आयोग ने जनप्रतिनिधित्व कानून में परिवर्तन की अपेक्षा के साथ सुझाव दिया था कि अपराधियों की संख्या कम करने के लिए यह आवश्यक है कि जनप्रतिनिधित्व कानून की अपात्रताओं में यह भी जोड़ दिया जाए कि ऐसे उम्मीदवार चुनाव लड़ने के पात्र नहीं होंगे, जिनके खिलाफ किसी न्यायालय में किसी आपराधिक प्रकरण में आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है। तब सभी राजनीतिक दल मतभेदों के बावजूद इस पर एकमत हो गए थे कि जब तक न्यायालय से किसी व्यक्ति को दोषी न ठहरा दिया जाए, तब तक केवल आरोप पत्र या अभियोग के नाते उसे चुनाव लड़ने के अयोग्य नहीं मानना चाहिए। उनका तर्क था कि यदि ऐसा होगा, तो झूठे मुकदमे गढ़कर भी अपने विरोधियों को निर्वाचन प्रक्रिया से बाहर करने की कोशिश शुरू हो जाएगी। सो जनप्रतिनिधित्व कानून का यह प्रावधान उचित है कि ऐसा कोई व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता, जिसे किसी न्यायालय से सजा मिली हो या वह दो वर्ष तक जेल में बंद रहकर छूटा हो।
राष्ट्रपति और राज्यपाल प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री के परामर्श पर मंत्रिपरिषद के सदस्यों की जो नियुक्तियां करते हैं, उसके लिए कोई मानक निर्धारित नहीं है। इसलिए इस मुद्दे को संविधान का उल्लंघन मानकर न्यायालय में घसीटा भी नहीं जा सकता। वैसे इस देश में प्रधानमंत्री से लेकर कुछ मुख्यमंत्रियों को भी भ्रष्टाचार के आरोप में सजा मिल चुकी है, लेकिन उनके द्वारा किए गए कार्य अवैध नहीं माने गए। सरकारी अधिकारियों की प्रोन्नति के लिए जो नियमावली है, उसमें यह अवश्य देखा जाता है कि जिस पर विचार किया जा रहा है, उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला तो विचाराधीन नहीं है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश में एक मुख्य सचिव को रिटायरमेंट के बाद विधि विरुद्ध कार्य करने तथा भ्रष्टाचार के आरोप में सजा मिल चुकी है। एक अन्य मुख्य सचिव को भी, जिनका कार्यकाल सरकार ने बढ़ा दिया था, इसलिए इस्तीफा देना पड़ा, क्योंकि उस सेवा विस्तार को सर्वोच्च न्यायालय में दी गई चुनौती का कोई उचित जवाब राज्य सरकार के पास नहीं था।
जहां तक मुख्य सतर्कता आयुक्त जैसे महत्वपूर्ण पद पर चयन का संबंध है, उस पर कोई काला धब्बा नहीं दिखना चाहिए, क्योंकि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता एक गुण मानी गई है। पर यह पारदर्शिता कौन तय करेगा? उसकी सर्वमान्यता के लिए प्रधानमंत्री तथा उनके द्वारा नामित एक व्यक्ति के साथ लोकसभा में विपक्ष के नेता को भी शामिल किया गया है। पर जब किसी विधि या नियम के अनुसार इस पद की पात्रताएं निर्धारित नहीं होंगी, तो विपक्ष का नेता यदि असहमत भी हो, तो मान्य लोकतांत्रिक पद्धति के अनुसार बहुमत से निर्णय हो जाएगा। इस प्रकार चयनित व्यक्ति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में तर्क देना, कि यह तो अदालत की विचार परिधि से बाहर है, क्योंकि जो कुछ हुआ वह किसी नियम का उल्लंघन नहीं है, सवाल तो है ही, प्रश्न यह भी है कि क्या निर्णायक सांविधानिक पदों पर दोहरा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए? चूंकि मंत्रिपरिषद के सदस्य सरकार के अंग होते हैं, लिहाजा मंत्री यदि भ्रष्ट भी हो, तो उनके निर्णय मंत्रिपरिषद के मान लिए जाते हैं। जब इसे चुनौती देने की स्थिति नहीं है, तो राष्ट्रपति द्वारा गठित समिति किसी व्यक्ति की नियुक्ति कर देती है, तो उसे किस कानून के तहत चुनौती दी जाएगी?
मुख्य सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति का मामला जब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आया और उस संबंध में सरकार द्वारा जो सफाई दी गई, वह लोगों के गले नहीं उतरी। इन राजनीतिक नेताओं की तरह अब एक नौकरशाह भी सीना तानकर खड़ा हो गया है कि उसका परीक्षण भी समता के सिद्धांत के अनुसार हो। यह दायित्व तो संसद का है, जिसे संविधान सहित अन्य कानूनों में भी परिवर्तन का अधिकार है। दोषी, दागी एवं आरोपी के बीच के अंतर तथा उससे भविष्य में होने वाले परिणामों को देखना भी संविधान निर्माताओं के ही अधिकार क्षेत्र में आता है।
संविधान में सदस्यों की अर्हताओं के लिए जैसी व्यवस्था की गई है, वही व्यवस्था अन्य सांविधानिक पदों पर कार्य करने वाले लोगों के लिए भी होनी चाहिए। पर नियुक्ति के अधिकार राष्ट्रपति में ही समाहित हैं, जो मंत्रिपरिषद के परामर्श के अनुसार कार्य करता है। इसलिए यह विचारणीय प्रश्न है कि क्या राष्ट्रपति को मंत्रिपरिषद की राय के अनुसार कार्य करने के बजाय इसके लिए कोई आचार संहिता बनानी चाहिए। लेकिन स्वस्थ समाज की रचना का दायित्व तो सांविधानिक रचना के अनुसार ही होगा, इसलिए इसका निर्वहन संसद को ही करना होगा।
जब भ्रष्ट मंत्री सरकार में बना रह सकता है, तो दागी नौकरशाह को किस आधार पर चुनौती दी जा सकती है

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