Sunday, January 30, 2011

काले धन पर परदा


लेखक विदेशी बैंकों में जमा काले धन पर अंतरराष्ट्रीय संधि से बंधे होने को सरकार का बहाना बता रहे हैं...
भ्रष्टाचार के साथ-साथ काले धन पर भी सरकार कठघरे में खड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने काले धन को देश की लूट बताया है। काले धन के लुटेरे न केवल देश के शत्रु हैं, बल्कि आर्थिक आतंकवादी भी हैं। देश में धन की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग कुपोशन के शिकार होकर और इलाज के अभाव में मारे जा रहे हैं अथवा आत्महत्या को विवश हो रहे हैं। अफसोस की बात है कि सरकार इन लुटेरों के साथ खड़ी है और सुप्रीम कोर्ट की बार-बार लताड़ खाने के बाद भी इनके नाम जाहिर नहीं कर रही है। ये आर्थिक आतंकवादी सत्ता के ऊंचे पायदान तक पहंुच रखते हैं इसलिए इनके कारनामों अथवा नामों पर भी कोई शोर नहीं मचता। कभी हमारी संसद में भी इस विषय पर बहस करना मुनासिब नहीं समझा गया। 2009 के आम चुनाव में काले धन की समस्या बड़े मुद्दे के रूप में उभरी। तब जनता से वायदा किया गया था कि चुनाव खत्म होने के बाद गोपनीय स्विस खातों समेत दूसरे बैंकों में जमा काला धन देश में वापस लाया जाएगा, लेकिन नेताओं के तमाम दावों और वायदों के बावजूद आज भी स्थिति जस की तस है। इतना ही नहीं, न तो सरकार की तरफ से यह बताया जा रहा है कि देश का कुल कितना धन विदेशों में जमा है और न ही यह कि इस धन को वापस पाने के लिए सरकार कौन से कदम उठाने जा रही है? इसके उलट सरकार खातेदारों के नाम जनता के सामने न आने देने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि से बंधे होने का गलत बहाना बना रही है। इस संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन खाताधारकों के नाम सरकार को मिले हैं, वे सीधे तौर पर किसी बैंक या सरकार से नहीं, बल्कि एक हैकर के माध्यम से जर्मनी सरकार को और जर्मनी सरकार से भारत और दूसरे कई देशों तक पहुंचे हैं। दरअसल, जर्मनी सरकार ने लिचटेंस्टीन के एलजीटी बैंक में काम करने वाले एक व्यक्ति को 70 लाख डॉलर देकर इस बैंक की सूचनाएं हासिल कीं। उस हैकर ने बैंक में विभिन्न देशों के जमाकर्ताओं के खातों की जानकारी चुरा ली और इसे जर्मनी और बाकी देशों को बेच दिया। बाद में जर्मनी सरकार ने भारत समेत विभिन्न देशों की सरकारों को यह जानकारी मुहैया कराने की पहल की। अन्य संबंधित देशों द्वारा यह जानकारी लेने के बावजूद भारत सरकार ने इन्हें हासिल करने से साफ मना कर दिया। जब यह खबर मीडिया में उछली तो मनमोहन सरकार पर पूरे देश की जनता का दबाव पड़ा, जिस कारण सरकार इन सूचनाओं को लेने के लिए विवश हुई। परंतु सरकार ने एक बार फिर देशवासियों को अंधेरे में रखते हुए और अनिवार्यता न होने के बावजूद जर्मनी और दूसरे टैक्स स्वर्ग देशों के साथ डीटीएए यानी डबल टैक्सेसन अवॉयडेंस एग्रीमेंट या कहें कि दोहरे कराधान वाले समझौते पर पहले हस्ताक्षर किए और फिर हैकर के माध्यम से जर्मनी को मिली सूचना हासिल की। यहां यह सवाल स्वाभाविक है कि जब इन सूचनाओं को लेने के लिए जर्मनी सरकार ने बिना शर्त सरकार को प्रस्ताव दिया था तो सरकार ने दोहरे कराधान वाले समझौते क्यों किए और यदि ये समझौते कर भी लिए तो किसी प्राइवेट हैकर के माध्यम से खाताधारकों के नामों और उनकी धनराशि के बारे में मिली सूचना को देश के सामने सार्वजनिक करना किस तरह गलत हो सकता है। साफ है कि मनमोहन सिंह सरकार की मंशा शुरुआत से ही संदिग्ध नजर आ रही है और अब अंतरराष्ट्रीय संधि का हवाला देकर एक बार फिर देश और अदालत को गुमराह करने का काम किया जा रहा है। यह वास्तविकता को छिपाने और तथ्यों से देश को भरमाने का मामला है। सवाल यह है कि जर्मनी के माध्यम से मिली इस जानकारी के आधार पर जब अन्य देश अपने यहां कार्रवाई कर सकते हैं तो हमारी सरकार इस बारे में कोई ठोस कार्रवाई के बजाय बहाने क्यों बना रही है? हालांकि सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दखल और दबाव के बाद खाताधारकों के नाम बंद लिफाफे में अदालत को सौंप दिए हैं, जिन्हें फिलहाल आम जनता के सामने नहीं लाया जा सकता, लेकिन पूरे मामले की बहस के बाद यदि अदालत संतुष्ट होती है तो वह आम जनता को इसकी जानकारी बाद में स्वत: दे सकती है। लेकिन तब तक शायद काफी देर हो चुकी होगी और सरकार से जनता का विश्वास उठ चुका होगा। ग्लोबल फाइनेंसियल इंटीग्रिटी की रिपोर्ट और मैंने अपने अध्ययन में यह पाया है कि प्राइवेट स्विस बैंक और 76 टैक्स स्वर्ग देशों में भारत के करीब 300 लाख करोड़ रुपये जमा हैं, जिनमें स्विस बैंकों की विभिन्न शाखाओं में जमा करीब 70 लाख करोड़ रुपये शामिल हैं। इसके अलावा प्रतिवर्ष हमारे देश से 20 से 30 लाख करोड़ रुपये हवाला आदि के जरिये बाहर जा रहे हैं, जिसे तत्काल रोके जाने की आवश्यकता है। आज काले धन की समस्या पर समग्रता में विचार करने की आवश्यकता है। इस पर अंकुश लगाने के लिए हमें दीर्घकालिक और अल्पकालिक कदम उठाने होंगे। इन कदमों में खातेदारों के नाम जनता के सामने लाना, उन पर कानूनी कार्रवाई करना तथा काला धन पैदा न होने देने के लिए कानूनी प्रावधान कड़े करने जैसे उपाय अपनाने होंगे। इसके अलावा हवाला जैसे चैनलों पर भी लगाम कसनी होगी। इस दिशा में सरकार ने फेरा कानून की जगह फेमा कानून बनाया है, लेकिन वास्तविकता यही है कि फेमा कानून काफी कमजोर है और फेरा कानून को ही थोड़ा बदलकर लागू किए जाने की आवश्यकता है। नए कानून फेमा के प्रावधान फेरा जितने कड़े नहीं हैं। जिस कारण इसका गलत इस्तेमाल कर अपराधी बच निकल रहे हैं। काले धन की एक बड़ी वजह कैश ट्रांजेक्शन प्रणाली है। यदि हम प्लास्टिक मनी यानी क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड आदि के प्रयोग को बढ़ावा दें और एक हजार व पांच सौ के नोटों का प्रचलन कम कर सकें तो इससे काले धन पर अंकुश लगाने में काफी मदद मिल सकती है। इसी तरह हमें टैक्स सुधार पर भी ध्यान देना होगा, क्योंकि सोने जैसे महंगी धातुओं पर टैक्स एक प्रतिशत है जबकि आवश्यक वस्तुओं पर इससे कई गुना अधिक वैट वसूला जाता है। इसी तरह और भी अनेक विसंगतियां हैं। सरकार में जनहित से जुड़े मुद्दों पर सक्रियता दिखाने की इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है। यदि ऐसा नहीं होता तो आज काले धन को लेकर इतना हायतौबा मचने के बावजूद सरकार सोती नहीं रहती और इन आर्थिक आतंकवादियों की धरपकड़ अथवा रोकथाम करती। (लेखक सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेशक हैं)



काले धन की जानकारी को करना होगा इंतजार


बैंक खातों का स्वर्ग माने जाने वाले स्विट्जरलैंड से वहां जमा काले धन से संबंधित जानकारी जनता तक आने में अभी और वक्त लगेगा। स्विस बैंक के खातों की जानकारी पाने के लिए सरकार इस देश के साथ जो कानूनी व्यवस्था कायम कर रही है उसे अंजाम तक पहुंचने में अभी कम से कम आठ-नौ महीने लगेंगे। हालांकि इसके बाद भी इस देश से सिर्फ कर चोरी से संबंधित मामलों की जानकारी ही प्राप्त हो सकेगी। अन्य देशों की तरह स्विस बैंकों से भी सरकार कर संबंधी सूचना के आदान-प्रदान के जरिए ही जानकारी पाने की व्यवस्था कर रही है। चूंकि अभी स्विट्जरलैंड के साथ दोहरे कर से बचने वाली संधि तो है, लेकिन उसके तहत स्विट्जरलैंड से बैंकिंग सूचनाओं से संबंधित जानकारी पाने का कोई जरिया नहीं है। यही वजह है कि सरकार अब स्विट्जरलैंड के साथ भी कर सूचना के आदान-प्रदान संबंधी समझौते की बातचीत कर रही है। स्विट्जरलैंड से यह समझौता इस साल सितंबर तक होने की संभावना है। सूत्रों के मुताबिक वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने अपने मंत्रालय से संबंधित स्थायी समिति को बताया है कि स्विट्जरलैंड के साथ बातचीत चल रही है और सात-आठ महीने में इस समझौते की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। वैसे सरकार ने करीब 65 देशों के साथ इस तरह की व्यवस्था कायम करने की कवायद शुरू की है, लेकिन अभी तक कर संबंधी सूचना के आदान-प्रदान को लेकर सिर्फ 10 देशों के साथ ही बातचीत को अंतिम रूप दिया जा सका है। विदेशों में जमा काले धन के मामले में सुप्रीमकोर्ट की फटकार के बाद सरकार के प्रयासों में और तेजी आई है। जिन देशों के साथ दोहरे कर से बचने की संधि है उनमें से ही 10 देशों के साथ कर सूचनाओं के आदान-प्रदान का समझौता हुआ है। इन समझौतों में इस बात का खास ध्यान रखा गया है कि अन्य देशों के साथ बैंकिंग सूचनाओं का आदान-प्रदान तो हो ही, साथ ही जो करदाता दोहरे कर से बचाव की संधि के दायरे में नहीं आते उनके बारे में भी जानकारी एकत्रित की जा सके। अभी तक के प्रयासों से वित्त मंत्रालय विदेशों में 48,784 करोड़ रुपये की आमदनी का पता लगा चुका है जिस पर टैक्स वसूली की प्रक्रिया जारी है। हालांकि सरकार के पास अभी विदेशों में जमा काले धन के सही आंकड़े का कोई अनुमान नहीं है, लेकिन वित्त मंत्रालय के मुताबिक हाल में हुए अध्ययन में करीब 462 अरब डॉलर की ऐसी राशि का अनुमान सामने आया है। जबकि भाजपा के एक कार्यदल ने 500 से 1400 अरब डॉलर के काले धन का अनुमान लगाया था।


सीजीएफ के सामने सरकार भी बेबस, जांच पड़ी अधूरी


भ्रष्टमंडल खेलों में विदेशी हाथों की जांच कॉमनवेलथ खेल संघ (सीजीएफ) के दरवाजे पर आकर ठिठक रही है। जांच एजेंसियों के हाथ लगे दस्तावेज बताते हैं कि बीमा, प्रसारण अधिकारों की बिक्री और मार्केटिंग सहित कई बड़े अनुबंध विदेशी सलाहकारों को देने के फैसले सीजीएफ अधिकारियों की सिफारिश या असर से हुए थे। विदेशी कंसल्टेंट नियुक्त करने के कई मामलों में गहरी अनियमितता पाई गई, लेकिन सीजीएफ के अधिकारी जांच में मदद से किनारा कर रहे हैं। सीईओ माइक हूपर ने जांच एजेसियों के पत्रों का कोई जवाब नहीं दिया है। सीजीएफ के असहयोग का मामला सरकार के लिए नई सांसत बन सकता है। राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार की जांच कई मामलों में टीम कलमाड़ी और टीम फेनेल की मिलीभगत की तरफ इशारा कर रही है। जांच व ऑडिट एजेंसियों ने कलमाड़ी व उनकी टीम को अपने शिकंजे में ले लिया है, लेकिन एक्जीक्यूटिव बोर्ड में सीजीएफ के नुमाइंदे सूचनाएं देने से भी बच रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक दस्तावेज और बैठकों के कार्यवाही के ब्योरे बताते हैं कि सीजीएफ के अधिकारियों ने कई बड़े फैसलों को प्रभावित किया था। इस जानकारी के आधार पर ऑडिट एजेंसियों ने सीजीएफ के सीईओ माइक हूपर से दो बार पत्र लिखकर सूचनाएं मांगी हैं, लेकिन हूपर की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। मामला कैबिनेट सचिवालय और विदेश मंत्रालय के सामने रखा जाने वाला है। संभव है कि जांच एजेंसियां हूपर के असहयोग को दर्ज करते हुए अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दें क्यों कि सीजीएफ और इसके अधिकारी भारतीय कानूनों के दायरे से बाहर हैं। बताते चलें कि जुलाई अगस्त 2009 में माइक फेनेल तैयारियों में देरी पर भड़के थे और विदेशी सलाहकारों को तैनात करने का दबाव बनाया था। सूत्र बताते हैं कि आयोजन समिति ने फेनेल की यह बात मानकर उन्हें मना लिया और बाद में सीजीएफ व टीम कलमाड़ी के बीच रिश्ते पूरी तरह सामान्य हो गए। दैनिक जागरण के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि फेनेल व हूपर ने विदेशी कंसल्टेंट के चुनाव को प्रभावित किया और विदेशी कंसल्टेंट के चयन नियम तोड़ कर हुए। पहला मामला खेलों के अंतरराष्ट्रीय प्रसारण अधिकारों की बिक्री का था। इसके लिए लंदन की फास्ट ट्रैक सेल्स का चयन किया गया था। सीएजी ने एक साल पहले सरकार को भेजी अपनी अंतरिम रिपोर्ट में यह दर्ज किया था कि फास्ट ट्रैक का चुनाव सीजीएफ के मुखिया माइक फेनेल और सीईओ माइक हूपर की सिफारिश पर किया गया। यह चयन बगैर किसी तकनीकी मूल्यांकन के हुआ। इसे प्रतिस्पर्धी कंपनी से ज्यादा दर पर कमीशन दिया गया और यह कंपनी प्रसारण अधिकारों की बिक्री से अपेक्षित राजस्व लाने में असफल रही। इस फैसले से 24.60 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हुआ। लगभग ऐसा ही किस्सा विवादित मार्केटिंग कंपनी स्मैम के चुनाव का है जिस पर प्रायोजक जुटाने की जिम्मेदारी थी। इसे भी सीजीएफ की सिफारिश पर चुना गया और पूरी प्रक्रिया बुरी तरह अपारदर्शी थी। सबसे ऊंची दर पर कमीशन लेने वाली यह कंपनी प्रायोजक जुटाने में असफल रही और अंतत: खेलों से ठीक पहले आयोजकों ने इससे नाता तोड़ लिया। तीसरा मामला बीमा एजेंट मार्श का है, जो सीजीएफ कंसल्टेंट थी। सीजीएफ के ही दबाव सरकार ने आयेाजन के लिए बीमा कवरेज बढ़ाया था। क्वींस बेटर रिले की इवेंट मैनेजर जैक मॉर्टन का चयन में भी सीजीएफ की भूमिका के संकेत हैं। इस कंपनी को दिया गया काम तो घटा दिया गया लेकिन फीस बढ़ गई। एजेंसियां विदेशी कंसल्टेंट चुनने के और मामलों में सीजीएफ की भूमिका तलाश रही हैं।



भ्रष्ट व्यवस्था की भेंट चढ़ रही ईमानदारी


दिसंबर 1994 को मुजफ्फरपुर में गोपालगंज के जिलाधिकारी जी कृष्णैया की पत्थर मार कर नृशंस हत्या की खबर आने के बाद बिहार और वहां की कानून व्यवस्था पर सवालिया निशान लग गए थे। मुजफ्फरपुर में कृष्णैया और नासिक के मनमाड में यशवंत सोनवाने की हत्या की घटना में एक समानता है कि दोनों जिम्मेदार अधिकारी थे। लेकिन एक की हत्या पगलाई भीड़ ने की थी, जबकि दूसरे को जिंदा जलाने वाले तेल माफिया थे। कृष्णैया की हत्या ने यह सोचने के लिए बाध्य कर दिया था कि जिस राज्य में देश की सर्वोच्च और प्रतिष्ठित सेवा का अधिकारी सुरक्षित नहीं है, वहां आम जनता कितनी सुरक्षित होगी। लेकिन ठीक गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हुई इस लोमहर्षक घटना के लिए महाराष्ट्र की कानून-व्यवस्था पर सवाल नहीं उठ रहा है। वहां इसे महज एक आपराधिक घटना के तौर पर देखा जा रहा है। महाराष्ट्र की इस दुस्साहसिक घटना की जांच के बाद निश्चित रूप से यह पता चलेगा कि आला प्रशासनिक अधिकारी को जिंदा जलाने वाले कोई सामान्य अपराधी नहीं हैं, बल्कि उनके पीछे कोई रसूखदार राजनीतिक ताकत जरूर है। 19 नवंबर 2005 में कुछ ऐसे ही घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर जिले में इंडियन ऑयल कारपोरेशन के मार्केटिंग अधिकारी एस मंजूनाथ की हत्या कर दी गई थी। यशवंत सोनावाणे की तरह मंजूनाथ का भी कसूर यही था कि वे तेल में मिलावटखोरों के खिलाफ अभियान चला रहे थे। उनके रहते मिलावटखोर और कालाबाजारी करने वाले बेईमान पेट्रोल पंप मालिकों की काली कमाई में रुकावट हो रही थी। लिहाजा उन्होंने अपनी काली कमाई जारी रखने के लिए अधिकारी को ही राह से हटाने का फैसला ले लिया। मंजूनाथ की हत्या की जांच में भी पता चला कि इसके पीछे रसूखदार राजनीतिक वरदहस्त वाले लोगों का भी हाथ था। पेट्रोल पंपों के कारोबार से जुड़े होने के चलते हत्यारे और उन्हें प्रश्रय देने वाले मालदार तो खैर थे ही। चाहे मंजूनाथ हों या फिर यशवंत सोनवाने, राजनीति की दुनिया में व्याप्त भ्रष्टाचार उन्हें अपनी राह का रोड़ा मानने लगती है। अपने सेवाकाल के शुरुआती दौर में ज्यादातर अधिकारी समाज बदलने का ही माद्दा लेकर आते हैं, लेकिन जैसे-जैसे भ्रष्ट व्यवस्था से उनका पाला पड़ता है, शुरुआती हिचक पर वे काबू पाने की कोशिश में जुट जाते हैं। रही-सही कसर पूरी कर देती है भ्रष्ट व्यवस्था। व्यवस्था ही उन्हें बदलने की कोशिश करने लगती है। पहले ही दिन से उन्हें खरीदने की कोशिश की जाती है। इस कोशिश के सामने अधिकांश टूट जाते हैं और जो नहीं टूटते, उन्हें या तो मंजूनाथ बना दिया जाता है या फिर सत्येंद्र दुबे। राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में काम कर रहे इंजीनियर सत्येंद्र दुबे को भी खरीदने की कम कोशिश नहीं की गई थी, लेकिन बिहार के सीवान जिले का रहने वाला वह युवा इंजीनियर अपनी असल जिम्मेदारी निभाने के लिए जुटा रहा। इतना ही नहीं, उन्होंने अपने ही विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार का खुलासा करने की भी ठान ली। ऐसे में भ्रष्ट अधिकारियों, ठेकेदारों और इंजीनियरों की तिकड़ी ने उन्हें रास्ते से ही हटाने की ठान ली। 27 नवंबर, 2003 को गया में तैनात यह इंजीनियर जब अपने घर लौट रहा था, तभी उसे गोली मार दी गई। सत्येंद्र दुबे हत्याकांड का मामला इतना तूल पकड़ा कि नीतीश सरकार को उसकी सीबीआई जांच कराने का आदेश देना पड़ा। दुबे हत्याकांड के अधिकारी पकड़ तो लिए गए हैं, लेकिन हकीकत यह है कि वे महज हत्यारे हैं। उनकी हत्या की साजिश रचने वाले राजनेता और अधिकारी अब भी सींखचों से बाहर हैं। हाल के दिनों में एक और हत्या ने राजनीति और भ्रष्टाचारियों के कॉकटेल व उसके जरिए होने वाले अपराधों की कलई खोलने के लिए चर्चित रहा। 24 दिसंबर, 2008 को उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में तैनात पीडब्ल्यूडी इंजीनियर मनोज गुप्ता की भी हत्या कर दी गई। उनका कसूर सिर्फ इतना ही था कि उन्होंने सत्ताधारी बहुजन समाज पार्टी के स्थानीय विधायक शेखर तिवारी को चंदा देने से मना कर दिया था। दिलचस्प बात यह है कि यह चंदा पार्टी के ही नाम पर मांगा गया था। इस हत्याकांड से भ्रष्टाचार के मसले पर राजनेताओं और अधिकारियों की मिलीभगत पर बहस-मुबाहिसों का दौर ही शुरू हो गया था। बिहार में तो हालात भले ही बदलते नजर आ रहे हैं। नीतीश शासन में जिस तरह अधिकारियों को अभयदान मिला हुआ है, उससे सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड और भाजपा नेताओं में असंतोष है। विधानसभा चुनावों के पहले हुई जदयू की एक बैठक में इस मसले को पार्टी नेताओं ने जिस तरह तूल दिया, उससे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी झुंझला गए थे, लेकिन नीतीश कुमार ने जिस तरह अधिकारियों को स्वायत्तता दी है, उससे अब बिहार में काम करने को लेकर अधिकारियों में कोई हीनताबोध या किसी भय का भाव नहीं है, लेकिन जी कृष्णैया की हत्या के बाद नब्बे के दशक के मध्य में अधिकारी बिहार में तैनाती को लेकर हिचक दिखाने लगे थे। कृष्णैया आंध्र प्रदेश के निवासी थे। उनकी हत्या के बाद उनके माता-पिता ने कहा था कि वे किसी भी व्यक्ति को यह सलाह नहीं देंगे कि वे अपने बच्चे को बिहार में काम करने के लिए जाने दे। निश्चित तौर पर सोनवाने की हत्या के बाद किसी अधिकारी के परिजन अपने किसी जानकार के महाराष्ट्र में काम करने के लिए आगाह नहीं करेंगे, लेकिन कृष्णैया की हत्या दरअसल छोटन शुक्ला नाम के एक स्थानीय नेता की मौत से गु्स्साई जनता ने की थी। बिहार पीपुल्स पार्टी के नेता छोटन शुक्ला की हत्या को लेकर लोग मान रहे थे कि हत्यारों को सत्ता प्रतिष्ठान का समर्थन हासिल है। हत्यारों की भीड़ में लवली आनंद और आनंद मोहन जैसे नेता भी थे। आनंद मोहन पर हत्या से ज्यादा भीड़ को उकसाने का आरोप है और इसके चलते वे जेल में बंद भी हैं। सोनवाने की हत्या निश्चित तौर पर अपराधियों का कृत्य है, लेकिन यह तय है कि उन अपराधियों के पीछे कोई राजनीतिक ताकत जरूर है। सत्येंद्र दुबे और मंजूनाथ भी अधिकारी थे, लेकिन वे प्रशासनिक अधिकारी नहीं थे। जिन पर कानून और व्यवस्था की भी जिम्मेदारी होती है। वैसे तो हत्या, हत्या ही होती है। लेकिन यशवंत सोनवाने की हत्या निश्चित तौर पर बाकी अधिकारियों की हत्या से अलग है, क्योंकि वे मामूली अधिकारी नहीं थे। वे प्रशासनिक अधिकारी थे। उन पर कानून और व्यवस्था की जिम्मेदारी भी थी। फिर भी उनकी हत्या के लिए भ्रष्ट तंत्र और उसके अपराधियों को कोई भय या हिचक का बोध नहीं हुआ। इसके भी अपने कारण हैं। अंग्रेजी राज्य से लेकर सन् 1971-72 तक प्रशासनिक अधिकारियों का अपना जलवा रहता था, लेकिन सत्तर के दशक के शुरुआती दिनों में शुरू हुए प्रशासनिक सुधारों के बाद प्रशासनिक अधिकारियों की ताकत कम हुई है, इसके साथ ही उनका रसूख कम हुआ है। इन सुधारों से प्रशासनिक अधिकारियों के अधिकारों में कटौती हुई और जिले में तैनात पुलिस अधीक्षकों को भी ताकत दी गई। जबकि उसके पहले तक वे जिला प्रशासनिक अधिकारियों के सहायक की भूमिका में होते थे। 1985-86 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व के दौरान पुलिस अधिकारियों ने प्रशासनिक अधिकारियों की पकड़ को कम करने की मांग रखी थी। उन्हें अपनी गोपनीयता रिपोर्ट किसी आईएएस अधिकारी के हाथों लिखे जाने पर भी ऐतराज था। लिहाजा, सरकार ने उनकी मांगे मान ली। अधिकारों के विकेंद्रीकरण के नाम पर ये तो हुआ, लेकिन जिला और स्थानीय स्तर पर सक्रिय अपराधियों और माफियाओं ने उनकी परवाह करनी कम कर दी। उन्हें पता है कि प्रशासनिक अधिकारियों के हाथ में पहले जैसा चाबुक नहीं रहा। इसका ही फायदा उठाकर सत्तर और अस्सी के दशक में धनबाद में माफियाओं का उभार सामने आया था, जिसमें सूरजदेव सिंह तेजी से उभरे थे। खुलेआम हथियार लेकर चलना और प्रशासनिक अमले को हड़का देना उनके लिए बायें हाथ का खेल था। हालांकि बाद में एक दमदार अधिकारी मदनमोहन झा ने उन पर काबू पाने की सफल कोशिश की थी। वैसे अधिकारियों का भी एक बड़ा तबका राजनेताओं और ठेकेदारों के भ्रष्टाचार के हाथों में खेलने में ही अपनी भलाई देखता है। ऐसे में उनकी भी वकत कम हुई है। यशवंत सोनवाने की हत्या की घटना ने इस मकड़जाल को एक बार फिर उजागर किया है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)


फेनेल व हूपर के चहेतों ने भी खूब काटी मलाई


राष्ट्रमंडल खेलों को दागदार बनाने वाले हाथ केवल देशी ही नहीं थे। कॉमनवेल्थ खेल संघ (सीजीएफ) के अध्यक्ष माइक फेनेल और सीईओ माइक हूपर कई मामलों में तो सरकार पर भी भारी पड़े। सीजीएफ के दबाव में सरकार ने केवल एक माह के भीतर ही अपना फैसला बदल कर आयोजन के बीमा कवरेज को पांच गुना बढ़ा दिया। नतीजतन प्रीमियम भुगतान भी बढ़ गया। नियम टूटने की हद तो तब हुई जब बीमा करने का अनुबंध सीजीएफ की कंसल्टेंट और आयोजन समिति के तत्कालीन बीमा ब्रोकर को दे दिया गया। फैसले का फायदा उठाने वाली कंपनी ने बीमा भी किया और मोटा कमीशन भी हजम किया। राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन देशी- विदेशी खेल अधिकारियों और कंपनियों की मनमानी का एक नायाब नमूना बन कर उभर रहा है। जांच एजेंसियों के हाथ इस बात के पुख्ता सबूत लगे हैं कि टीम कलमाड़ी को बात-बात पर नसीहत देने वाले फेनेल व हूपर ने कई बड़े फैसलों को प्रभावित किया था। दैनिक जागरण के पास उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि खेल मंत्रालय की नुमाइंदगी वाले आयोजन समिति एक्जीक्यूटिव बोर्ड ने पूरे आयोजन के लिए केवल 20 मिलियन डॉलर (लगभग 100 करोड़ रुपये) का बीमा मंजूर किया था, लेकिन 2009 अक्टूबर के अंत में हूपर के दबाव में इसे बढ़ाकर 100 मिलियन डॉलर (लगभग 500 करोड़ रुपये) कर दिया। यही वह दौर था जब फेनेल व कलमाड़ी के बीच तनातनी हुई थी और बाद में लंदन में दोनों के बीच गिले-शिकवे दूर किए गए। आयोजन का बीमा किया मे. मार्श ने, जो आयोजकों को अपनी सेवाएं पहले से दे रही थी। बीमा कवरेज का आकार और प्रीमियम बढ़ने का फायदा परोक्ष रूप से इसी कंपनी को मिला है। बीमा करने वाली कंपनी का पहले से कंसल्टेंट व ब्रोकर होना सरकार के गले में फंस रहा है क्योंकि यह नियमों के पूरी तरह खिलाफ है। दस्तावेज बताते हैं कि एक्जीक्यूटिव बोर्ड ने तय किया था कि बीमा देने वाली एजेंसी को कोई कमीशन नहीं दिया जाएगा, लेकिन अंतत: जब आयोजन समिति की ब्रोकर ने ही बीमा करने के लिए चुनी गई तो उसने 15 फीसदी कमीशन भी ले लिया। बीमा के पूरे फैसले पर हूपर किस कदर भारी थे इसकी नजीर यह है कि मई और इसके बाद सितंबर 2009 में दो बार आयोजन समिति के एक्जीक्यूटिव बोर्ड ने बीमा कवरेज केवल 20 मिलियन डॉलर रखने का निर्णय किया था, लेकिन अक्टूबर में अचानक फैसला बदल गया। जांच एजेंसियों ने मे. मार्श के चुनने के फैसले में भी अपारदर्शिता पाई है। तकनीकी मूल्यांकन पूरी तरह साफ सुथरा नहीं था और कंपनी को चुनने वाली बैठक के एक ही तारीख में दो अलग-अलग कार्य विवरण तैयार किए गए।



Saturday, January 29, 2011

जवाबदेह लोकपाल की दरकार


सरकार ने जो मसौदा तैयार किया है, उसके मुताबिक, भ्रष्टाचार के खिलाफलोकपाल की कोई भूमिका ही नहीं है। ऐसे में नागरिक समाज ने वैकल्पिक मसौदा तैयार किया है।

ऐसा क्यों है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ पर्याप्त सुबूत होने के बावजूद कोई जेल क्यों नहीं जाता? इसका कारण है कि हमारे यहां ऐसे भ्रष्टाचार निरोधक कानून एवं एजेंसियां हैं, जो अपने से काम नहीं कर सकतीं। मसलन, केंद्र में केंद्रीय सतर्कता आयोग जैसी स्वतंत्र संस्था है, मगर उसकी भूमिका सलाहकार जैसी है। एक पूर्व केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के अनुसार, उनके कार्यकाल में उन्हें जब भी लगा कि किसी अधिकारी को जेल जाना चाहिए, उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया गया। कहने को सीबीआई भी स्वतंत्र है, मगर वह भी पूरी तरह सरकार के अधीन काम करती है। राज्य स्तर पर भ्रष्टाचार विरोधी मशीनरी का भी यही हाल है।
इसी तरह हमारे भ्रष्टाचार विरोधी कानून बेहद अपर्याप्त हैं। अगर कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार का दोषी पाया जाता है, तब उसने सरकारी खजाने को जो नुकसान पहुंचाया, उसकी भरपाई का कोई प्रावधान ही नहीं है। इसलिए अगर हम भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के प्रति गंभीर हैं, तो हमें अपनी भ्रष्टाचार विरोधी मशीनरी में व्यापक बदलाव की जरूरत है।
आज हमारे भारत में जितना भ्रष्टाचार है, 1970 के दशक में उससे भी ज्यादा भ्रष्टाचार हांगकांग में था। नतीजतन वहां की सरकार को भ्रष्टाचार के खिलाफ एक स्वतंत्र आयोग (आईसीएसी) की स्थापना के लिए मजबूर होना पड़ा था। पहले चरण में ही इस आयोग ने 180 में से 119 पुलिस अधिकारियों को नौकरी से निकाल दिया। आज हांगकांग उन देशों में शुमार है, जहां की सरकारी मशीनरी ईमानदार है।
वास्तव में जनता की भारी नाराजगी किसी गंभीर सरकार को क्रांतिकारी सुधार के लिए प्रेरित करने का अवसर हो सकती है। मगर सार्वजनिक आलोचना का मनमोहन सिंह सरकार पर बहुत कम असर पड़ता दिख रहा है। उलटे सरकार ने लोकपाल बिल का जो मसौदा तैयार किया है, वह देश का ही अपमान है।
सरकार के लोकपाल को किसी मामले में स्वस्फूर्त जांच शुरू करने का तो अधिकार होगा और ही वह जनता से आई शिकायतों को स्वीकार कर सकेगा। यदि किसी को शिकायत करनी ही है, तो वह लोकसभा अध्यक्ष से कर सकता है। अध्यक्ष द्वारा अग्रेसित शिकायतों पर ही लोकपाल विचार कर सकेगा। चूंकि अध्यक्ष सत्तारूढ़ दल का होता है, इसलिए स्वाभाविक रूप से केवल वही शिकायतें लोकपाल को जांच के लिए भेजी जाएंगी, जो विरोधी दल के सांसदों के खिलाफ होंगी। जांच के बाद लोकपाल को किसी तरह की कार्रवाई करने की शक्ति नहीं होगी। वह अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष और प्रधानमंत्री को भेजेगा। यदि शिकायत किसी मंत्री के खिलाफ है, तब प्रधानमंत्री तय करेंगे कि लोकपाल की रिपोर्ट के आधार पर उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाए।
मगर गठबंधन के दौर में क्या किसी प्रधानमंत्री में इतना राजनीतिक साहस होगा कि वह अपने किसी मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करे? इस आलोक में सरकार का यह विधेयक बेतुका लगता है। इसके विपरीत नागरिक समाज ने एक वैकल्पिक लोकपाल विधेयक तैयार किया है। इसका पहला मसौदा प्रशांत भूषण, न्यायमूर्ति संतोष हेगड़े और मैंने मिलकर तैयार किया था।
इसके अधिकार क्षेत्र में नौकरशाह, राजनेता और न्यायाधीश होंगे। इसमें लोकपाल को बिना किसी एजेंसी की अनुमति लिए जांच शुरू करने और मुकदमा चलाने का अधिकार होगा। यदि किसी को दोषी ठहराया जाता है तब उसके गलत कृत्यों की वजह से सरकारी खजाने को हुए नुकसान की भरपाई उन सभी लोगों से होगी, जिन्हें दोषी ठहराया गया है। राज्यों के लिए भी ऐसे स्वतंत्र निकाय, जिसे लोकायुक्त कहा गया है, का सुझाव दिया गया है। कुछ राज्यों में अभी लोकायुक्त हैं, जो अप्रभावी साबित हुए हैं। नागरिक समाज ने लोकपाल विधेयक का जो मसौदा तैयार किया है, उसकी प्रति दो महीने पहले सरकार को भेज दी गई है।
हांगकांग सरकार आईसीएसी विधेयक इसलिए लागू कर सकी थी, क्योंकि लाखों लोग सड़कों पर उतर आए थे। भारत में भी इस जज्बे की दरकार है, जिसकी शुरुआत 30 जनवरी को हो सकती है, जब प्रभावी और मजबूत लोकपाल की मांग को लेकर राजधानी सहित देश के 20 शहरों में हजारों लोग जुटने वाले हैं।