योग गुरु बाबा रामदेव ने रामलीला मैदान में जबरदस्त रैली आयोजित कर दिखा दिया कि भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम में जनता उनके साथ है। भीड़ और मंच पर पहुंचे तमाम नामी लोगों की उपस्थिति से गद्गद स्वामी रामदेव ने भ्रष्टाचार पर कांग्रेस सरकार को जमकर कोसा। यह केवल ट्रेलर है, उनकी इस मुहिम में 5 अपै्रल को जंतर-मंतर पर अन्ना हजारे के नेतृत्व में अनशन होगा। इसी तरह पूरे देश में अनशन होंगे जिसमें एक करोड़ लोग शामिल होंगे। बाबा बोले, हमारी लड़ाई किसी व्यक्ति या पार्टी के खिलाफ नहीं है। हमारी लड़ाई भ्रष्टाचार के खिलाफ है जो जारी रहेगी। जनता हमारे साथ है और हम किसी से डरने वाले नहीं हैं। मेरा विरोध किसी व्यक्ति, पार्टी या सरकार से नहीं बल्कि भ्रष्टाचार से है। मुझे ब्लडी इंडियन और डॉग तक कहा गया। इन लोगों की सोच पर मुझे तरस आता है। ऐसे लोगों के दिमागी इलाज की जरूरत है। सरकार से जब पूछा गया तो उन्होंने ऐसी टिप्पणी करने वाले नेता से पल्ला झाड़ लिया। यहां तक कि उन्हें प्रधानमंत्री से मुलाकात का भी समय नहीं मिला। राजनीतिक दल 55 वर्षो से सरकार चला रहा है। ऐसे में भ्रष्टाचार के प्रति उनकी जवाबदेही बनती है। रिजर्व बैंक की गाइड लाइन के आधार पर उन्होंने 400 करोड़ लाख रुपये के काले धन का ब्योरा जुटाया है। अगर यह धन वहां से लाकर देश की गरीब जनता में बांट दिया जाए, तो कोई भी गरीब नहीं रहेगा और देश ऋण मुक्त हो जाएगा। सरकार को किसी प्रकार का टैक्स लगाने की जरूरत नहीं पडे़गी। स्विस बैंक खातों में जमा कालाधन गरीब बच्चों की पढ़ाई, इलाज, निर्धन लोगों के भोजन, देश की सुरक्षा, बिजली, पानी व सड़क आदि विकास योजनाओं पर खर्च होना चाहिए। अगर सरकार अब भी इस पर अंकुश नहीं लगाती तो देश की जनता उनसे जवाब मांगेगी। उनकी तैयारी 23 मार्च को एक करोड़ समर्थकों के साथ दिल्ली में उतरने की थी, जिसे अभी रोक दिया गया है। हजारों समर्थकों के साथ रामलीला मैदान से रैली जंतर-मंतर पहुंची। जहां बाबा रामदेव ने राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के नाम ज्ञापन सौंपा। रामलीला मैदान में सभा को पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री रामजेठमलानी, सुप्रसिद्ध समाज सेवी अन्ना हजारे, के अध्यक्ष सुब्रहमण्यम स्वामी, आरटीआई एक्टीविस्ट अरविंद केजरीवाल, पूर्व आईपीएस अधिकारी किरण बेदी, पूर्व भाजपा नेता गोविंदाचार्य के अलावा संत और मौलानाओं ने भी संबोधित किया|
Monday, February 28, 2011
राष्ट्रपति बाला को पद से हटाएं : जस्टिस वर्मा
देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा ने सगे-संबंधियों के भ्रष्टाचार को लेकर विवादों में घिरे राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के अध्यक्ष के.जी. बालाकृष्णन से इस्तीफे की मांग की है। वर्मा ने कहा, भ्रष्टाचार मानवाधिकार उल्लंघन का सबसे खराब रूप है। बाला को एनएचआरसी प्रमुख के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए और अगर वह त्यागपत्र नहीं देते हैं तो राष्ट्रपति को उन्हें पद से हटाने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए। वर्मा ने आयकर विभाग द्वारा लगाए गए आरोपों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, भ्रष्टाचार मानवाधिकार उल्लंघन का सबसे खराब रूप है। मानवाधिकार के गंभीर उल्लंघन का आरोपी अगर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की अध्यक्षता करता है तो यह अपने आप में न्याय का बड़ा मजाक है। मेरा मानना है कि उन्हें (बाला) इस्तीफा दे देना चाहिए और अगर उनके अनुसार, आरोप सही नहीं हैं तो यह उनका दायित्व है कि वह उन्हें गलत साबित करें। अगर उन्होंने मौन रहने का विकल्प चुना है और खुद को बेदाग नहीं साबित किया है तो हटाने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। यह पूछे जाने पर कि अगर वह इस्तीफा देने से इंकार करते हैं तो वर्मा ने कहा, उस स्थिति में राष्ट्रपति को कार्रवाई करने के लिए बढ़ना चाहिए। आखिरकार मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष को पद से हटाने के लिए प्रावधान है। उन्होंने कहा, वह(बालकृष्णन) एनएचआरसी अध्यक्ष बने हुए हैं। उनकी बातों का कोई भरोसा नहीं है। सुप्रीमकोर्ट के पूर्व जज कृष्णा अय्यर पहले ही बाला पर गंभीर आरोप लगा चुके हैं। उल्लेखनीय है कि आयकर विभाग के महानिदेशक (जांच) ई टी लुकोसे ने शनिवार को कोच्चि में पत्रकारों से कहा था कि बालाकृष्णन के परिजनों के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के मामले की जांच में उनके तीन रिश्तेदारों के पास काला धन पाया गया। लुकोसे ने कहा था कि बालकृष्णन के बारे में वह कुछ नहीं कह सकते, लेकिन उनके दो दामादों वी श्रीनिजन और एम जे बेन्नी (दोनों अधिवक्ता)और भाई केजी भास्करन का सवाल है तो हमने उनके पास काला धन पाया है|
Wednesday, February 23, 2011
अंकुश का झूठा खेल
विदेशी खातों की बात कह असल मुद्दे से ध्यान भटकाया जा रहा है
विदेशों में जमा देश के काले धन को राजनेताओं, स्वामियों तथा बाबाओं के स्तर पर देश का ज्वलंत मुद्दा बना देना अनेक गंभीर सवाल पैदा करता है। अरबों-खरबों रुपयों का जखीरा कुछ लोग विदेशों में रखें और हमारी आर्थिक-वित्तीय नीतियां निवेश की दर बढ़ाने के लिए हाथ-पैर मारती रहें, यह एक अस्वाभाविक और असहनीय स्थिति है। हमारी बचत का रंग श्वेत-श्याम जो भी हो, लेकिन हमारे विकास अभियान के लिए वह उपलब्ध न रहे और अन्य देशों, खासकर विकसित मुल्कों, के काम आए, यह सचमुच एक त्रासद विसंगति है। खासकर इसलिए कि हम विदेशी निवेश को लुभाने के लिए बहुत रियायतें देने को मजबूर होते हैं। इस तरह देखा जाए, तो हम ‘अपनी’ पूंजी को ही दूसरों के नाम से मंगाने के लिए अब तक भारी लागत का बोझा उठाते रहे हैं।
विदेशों में छिपी काली पूंजी का मूल उद्गम दरअसल देश के अंदर ही होता है। काली अर्थव्यवस्था कितनी विशाल और हर क्षेत्र में व्याप्त हो चुकी है, इसे देश के बाहर जमा राशियों से प्रमाणित किया जा सकता है। महज एक व्यक्ति की भगोड़ी पूंजी का आंकड़ा लगभग आठ अरब डॉलर बताया जा रहा है और उसकी बकाया कर देनदारी इससे 40 हजार करोड़ रुपये आंकी गई है। स्पष्ट है, अन्य बड़े व्यवसायियों, राजनेताओं और नौकरशाहों की ऐसी कुल कलुषित संपत्ति और सालाना सक्रिय तथा प्रवाहरत काली राशियां कुल मिलाकर देश की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख अंग बन चुकी हैं। इस स्थिति के कुछ निहितार्थों पर गौर करके ही विदेशों में जमा राशियों पर चल रहे व्यापक अभियानों के असली चरित्र को पहचाना जा सकता है। इनके आधार पर जो निष्कर्ष बनते हैं, वे इस तरह हैं : देश में असमानताएं किसी भी आधिकारिक आकलन से कई गुना ज्यादा हैं, क्योंकि उनमें इस छद्म अघोषित काले धन या संपत्ति को शामिल नहीं किया जाता है। विदेशों में ऐसे खाते केवल बड़े मगरमच्छ ही खोल सकते हैं। इसी तरह, बाहर जमा राशि किसी भी ऐसे गैर कानूनी जमाकर्ता की कुल आय और संपत्ति का मुख्य हिस्सा शायद ही कुछ मामलों में हो। ऐसी जमा राशियां निष्क्रिय या सुप्त खातों में कतई नहीं पड़ी रहतीं, बल्कि उनका उपयोग, निवेश आदि लगातार होता रहता है और उनमें बढ़ोतरी के बाहरी स्रोत भी हैं। काले धन को बाहर जमा करने के बाद ऐसी आय और संपत्ति का निर्माण देश के भीतर रुक नहीं जाता, बल्कि वह और तीव्र गति से चलता रहता है। यह भी कि देश के भीतर और बाहर की गतिविधियों द्वारा मिले-जुले रूप में संचालित काली अर्थव्यवस्था का यह सुदृढ़ तंत्र बिना सरकार यानी नेताओं और अफसरशाही की मिली-भगत के चल ही नहीं सकता।
राजनीति, व्यवसाय, प्रशासन, कानूनी-आर्थिक गतिविधियां तथा इन सबमें रची-बसी विशुद्ध आपराधिक गतिविधियां आपस में मिश्रित हो गई हैं, फलत: उनकी कार्यवाही और कार्यवाहकों की अलग-अलग पहचान ऐसे अपवाद होंगे, जो इस कथन की सत्यता को रेखांकित करेंगे। कोई इस बात का दावा नहीं कर सकता कि वह पाक-साफ है और काली अर्थव्यवस्था के रोगाणुओं से मुक्त है। यही बात राजनीति और प्रशासन के लिए भी सही है। कोई भी बड़ा या महत्वपूर्ण राजनीतिक पदाधिकारी काली अर्थव्यवस्था के साये में आने से बच गया हो, यह मानना मुश्किल है। काले धन से जुड़ी सचाई से हर कोई वाकिफ है और इसके खिलाफ कार्रवाई का कोई ठोस संकेत नहीं मिल रहा। अत: सरकार और प्रशासन का सीधे तौर पर ऐसे काले गोरखधंधों में लिप्त नहीं होना, उन्हें उनकी आपराधिक जिम्मेदारी से बरी नहीं कर सकता। इसे सत्ता की मजबूरी मानना भी, चाहे वह गठबंधन के चलते हो या अगले चुनाव के लिए धन जुटाने के लिए, निर्दोषिता का आधार नहीं बन सकता। खास तौर पर इन कामों का लोकतंत्र-विरोधी रूप तब और ज्यादा मुखर व स्पष्ट हो जाता है, जब व्यवसाय की तरह ही राजनीति पर भी पारिवारिक आधिपत्य जमाए रखना घोषित-अघोषित लक्ष्य बना लिया जाता है।
काले धन का इस्तेमाल अकसर लौकिक यश और सामाजिक ‘प्रतिष्ठा’ के लिए भी किया जाता है। यह मकसद सीधे धार्मिक-आध्यात्मिक कहे जाने वाले कामों से जुड़ जाता है। राष्ट्रीय तथा वैश्विक स्तर पर धार्मिक स्वामियों की भरमार तथा उनके व्यवसाय, राजनीति और प्रशासन से जुड़ते तारों के कारण आश्रम, संत, धार्मिक स्थल और अनुष्ठानों का इस काली अर्थव्यवस्थाओं से जुड़ाव दिनोंदिन जगजाहिर होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में विदेशी बैंकों में छिपाकर रखे गए काले धन के सवाल को सामने लाना इस अर्थ में तो उचित है ही कि यह कई मायनों में खतरनाक स्थिति का खुलासा है। लेकिन यह साफ लगता है कि काले धन की देशी और आंतरिक जड़ों से नजरें चुरा ली गई हैं। देश के भीतर व्याप्त काले धन पर प्रहार करने और उसे रोकने की कोई चर्चा तक नहीं हो रही है। यह ऐसा ही है, जैसे बुराई की जड़ों को यथावत छोड़कर मात्र कुछ डालियों को काटकर बुराई से मुक्ति पाने की बात कही जा रही है। देश के अंदर व्याप्त और चलनरत काले धन पर आक्रमण और उसका खुलासा बाहर जमा धन पर प्रहार से बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण और उससे कम मुश्किल काम है। लेकिन इसे छोड़कर अति दुरूह काम पर ध्यान केंद्रित करवाने से राजनीति और तथाकथित सामाजिक, आर्थिक तबकों की प्रतिबद्धता पर ही सवालिया निशान लग जाते हैं। इस तरह से गोपनीय स्विस बैंकों में कुछ भारतीय खातेदारों के नाम भले सामने आएं, काले धन की अर्थव्यवस्था पर निर्णायक प्रहार कतई संभव नहीं है।
काले धन पर अगर सचमुच अंकुश लगाना है, तो देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के विशाल तंत्र
को निश्चय ही तोड़ना होगा।
भ्रष्टाचार से लड़ता बिहार
भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए केंद्र सरकार को बिहार से सबक लेने की सलाह दे रहे हैं लेखक
उम्मीद थी कि संपादकों के साथ मुलाकात में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के कुछ उपायों की घोषणा करेंगे, लेकिन इसके बजाए एक तरह से वह भ्रष्टाचार पर अपनी सफाई देने की मुद्रा में नजर आए। ऐसे में मगध साम्राज्य के बिखरने के बाद अब एक बार फिर से लगने लगा है कि हिंदुस्तान की एक नई राजनीतिक संस्कृति का नेतृत्व करने के लिए बिहार खुद को तैयार कर रहा है और यह तैयारी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में हो रही है। पिछले दस सालों में भारत की चुनावी रणनीति के आधार ने तेजी से करवट बदली है। जाति, धर्म और धन के आधारों को किनारे ठेलकर अब विकास का तत्व डटकर सामने आ खड़ा हुआ है, जिसकी शुरुआत नरेंद्र मोदी ने गुजरात में की थी। इसे नीतीश कुमार ने समझा और लागू करके भारी बहुमत के साथ दूसरी बार सत्तारूढ़ हुए। जिस बिहार को लालू यादव ने राजनीतिक स्वांग में बदल दिया था, उसे अब देश भविष्य के एक सशक्त राज्य के रूप में देखने लगा है। पिछले तीन-चार महीनों से देश में हो रही गतिविधियों को केंद्र में रखकर यदि लोगों से पूछा जाए कि अभी देश के नेताओं से उनकी सर्वोपरि अपेक्षा क्या है, तो उन्हें यह उत्तर देने में एक सेकेंड भी नहीं लगेगा-भ्रष्टाचार के रावण का अंत। तो क्या इस अंत की शुरुआत के लिए भी हम बिहार की ओर देख सकते हैं, उस बिहार की ओर, जो स्वयं कभी इसका गढ़ रह चुका है। मुख्यमंत्री बनते ही नीतीश कुमार ने जो कदम उठाए हैं, उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ उठाए गए कदमों का नवाचार कहा जा सकता है। कल्पना कीजिए, यदि ये कदम उस वर्ग के विरुद्ध हों, जिस पर पूरी राजनीति और पूरे प्रशासन का दारोमदार हो, तो आप ऐसे कदमों को किस श्रेणी में रखेंगे? दोबारा मुख्यमंत्री बने हुए कुछ ही दिन हुए थे कि नीतीश कुमार ने अपनी संपत्ति का खुलासा कर दिया। उनकी देखादेखी उनके मंत्रियों को भी यही करना पड़ा। अब वह चाहते हैं कि उनके विधायक भी ऐसा करें। ऐसा करके उन्होंने अन्य राज्यों और यहां तक कि केंद्रीय मंत्रियों तक पर नैतिक दबाव डाल दिया है कि वे भी इस दिशा में सोचें। ऐसा नहीं है कि इंजीनियर रहे नीतीश कुमार यह नहीं जानते कि इससे भ्रष्टाचार खत्म नहीं होगा, लेकिन इतना तो है ही कि आखिर पहल कहीं न कहीं से तो करनी ही थी। दूसरी पहल के रूप में बिहार के इस सक्रिय मुख्यमंत्री ने अपने राज्य के सभी आइएएस अफसरों से कहा है कि वे अपनी व अपने परिजनों की संपत्तियों का ब्यौरा सार्वजनिक करें। इस बात का खात्मा यहीं नहीं कर दिया गया है। राज्य ने भ्रष्टाचारियों पर शिकंजा कसने के लिए एक नया कानून बना दिया है। इस संदर्भ में विशेष न्यायालय कानून लागू किया गया ताकि अधिकारियों द्वारा ज्ञात श्चोत से अधिक धन रखने वाले मामलों की सुनवाई जल्द हो सके। मुझे तो भ्रष्टाचार का कोई ऐसा बड़ा मामला याद नहीं आ रहा, जिसमें किसी को सजा हुई हो। फिर चाहे मामला नौकरशाहों से जुड़ा हो या राजनेताओं से। यदि आप लोगों से पूछेंगे कि ए. राजा, सुरेश कलमाड़ी और टीनू जोशी दंपत्ति का अब क्या होगा, तो यही सुनने को मिलेगा कि कुछ नहीं होगा। उनके इस उत्तर में अतीत का उनका निराशाजनक अनुभव और कुछ भी न कर पाने की बेचारगी, दोनों शामिल हैं। शायद बिहार के विशेष न्यायालय का यह प्रावधान लोगों को हताशा के गर्त से थोड़ा ऊपर खींच सके। इसका असर देखिए। यह घटना अविश्वसनीय सी है। मधेपुरा में मदनपुर के एक पंचायत सेवक ने 58 हजार रुपये की वह राशि अंचलाधिकारी को लौटा दी, जो बाढ़ पडि़तों को देने की बजाय उसने खुद रख ली थी। हुआ यों कि बिहार सरकार ने भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू की। इस कार्रवाई में औरंगाबाद के मोटरवाहन निरीक्षक रघुवंश कुंवर चपेट में आ गए और उनकी संपत्ति की जब्ती के तत्काल आदेश दे दिए गए। इस आदेश ने लड्डू शर्मा नाम के इस पंचायत सेवक की नींद उड़ा दी। भयभीत होकर उसने हड़पा हुआ धन वापस कर दिया। सच यही है कि यदि किसी की सजा में नसीहत बनकर भविष्य में होने वाले अपराधों पर नियंत्रण रख पाने की ताकत नहीं है, तो वह सजा कम, प्रतिशोध अधिक है। इसी तरह, बिहार के स्पेशल कोर्ट एक्ट 2009 के तहत विजिलेंस की विशेष अदालत ने आय से अधिक संपत्ति रखने के दोषी पाए गए सरकारी कर्मचारी रघुवंशी कुंवर की संपत्ति को जिलाधिकारी के हवाले करने के आदेश दिए। अब शासन की घोषणा के तहत रघुवंशी के घर में स्कूल खोला जाएगा। जाहिर है कि अब वहां की जनता इस सत्य को खुलेआम देखेगी कि भ्रष्टाचार का नतीजा क्या निकलता है। बिहार के मुख्यमंत्री के पास ऐतिहासिक मौका है कि भ्रष्टाचार की नाक में नकेल डालने की जो पहल उन्होंने की है, उसे अंतिम परिणति तक पहुंचा कर देश के राजनीतिक इतिहास में अपना नाम सुनहरे अक्षरों में दर्ज करा लें। हालांकि उन्होंने शुरुआत तो कर दी है, लेकिन इसकी गति को बनाए रखना उतना आसान नहीं है, जितना फिलहाल दिखाई दे रहा है। इसका कारण है सत्ता में राजनेताओं और नौकरशाहों का गठजोड़। पिछले साल बिहार में हुए चुनाव में विधायकों की जो पृष्ठभूमि उभरकर सामने आई है, वह इस आशंका को पुख्ता करने के लिए पर्याप्त है। इस बार के बिहार विधानसभा के चुनाव परिणाम बता रहे हैं कि दागी छवि वाले सदस्यों की संख्या पिछली बार की तुलना में काफी बढ़ोतरी हुई है। करोड़पति सदस्यों की संख्या भी खासी बढ़ी है। यह बात गौर करने की है कि इस बार विधानसभा के 59 प्रतिशत सदस्यों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं। ऐसे सदस्यों की कुल संख्या 141 है। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि इन 141 सदस्यों में से 85 ऐसे हैं, जिन पर हत्या और हत्या के प्रयास जैसे गंभीर आपराधिक माामले लंबित हैं। ये सदस्य किसी पार्टी विशेष से संबद्ध नहीं हैं। जनता दल (यू) और भारतीय जनता पार्टी में भी ऐसे सदस्यों की भरमार है। जहां तक करोड़पति सदस्यों की संख्या का सवाल है, वर्तमान विधानसभा में लगभग छह सौ प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। पिछली बार इनकी संख्या केवल आठ थी, जो इस बार बढ़कर 47 हो गई है। सवाल यह है कि नीतीश कुमार ऐसे सदस्यों से निपटेंगे कैसे? निश्चित रूप से चाहे वह आपराधिक गठजोड़ों की बात हो या पूंजीवादी दबावों की, इनसे निपटना मुख्यमंत्री के लिए आसान नहीं होगा। (लेखक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी हैं)
Tuesday, February 22, 2011
जरूरत ’दाग‘ मिटाने वाले डिटरजेंट की
जब एक दागी दूसरे दागी का नाम लेकर खुद को पाक-साफ बताने का दावा कर रहा है तो ऐसे में दाग साफ किया जाएगा या दागी को। राजनीतिज्ञ हों या फिर लोक सेवक जिन पर दाग होगा, उन्हें कैसे साफ किया जाएगा? केवल दाग साफ किए जाएंगे या फिर उन्हें धुंधला करने की जुगत की जाएगी। या फिर दाग लगे व्यक्ति चाहे जो भी हों, जहां भी हों, जैसे भी हों, उन्हें साफ किया जाएगा
कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारियों के समय भ्रष्टाचार के कुछ मामले जब उछले तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री सहित देश ने कहा कि इस आयोजन से अभी देश की प्रतिष्ठा जुड़ी है। पहले खेल हों, बाद में पीछे के खेल का पता लगाया जाए। अभी कामनवेल्थ गेम्स के आयोजन में कथित भ्रष्टाचार का मामला पूरा-पूरा सामने नहीं आया था कि इसी बीच 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार की बात सामने आई। दोनों ही मामलों में हुए भ्रष्टाचार की छानबीन आज भी जारी है। सीबीआई सहित देश की प्रमुख एजेंसियां इस काम में लगी हुई हैं। 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन में भ्रष्टाचार को लेकर तत्कालीन संचार मंत्री ए राजा, टेलीकाम सेक्रेटरी सिद्धार्थ बेहुरा के साथ-साथ कई लोग इन दिनों तिहाड़ में हैं। इसी बीच एस बैंड की डील में भ्रष्टाचार का मामला सामने आया। इसकी आंच प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंची। थोड़ी माथा-पच्ची हुई, बाद में जैसे-तैसे इस डील को रद्द कर दिया गया। प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर सरकार के विभिन्न मंत्रालयों पर भ्रष्टाचार से संबंधित उठ रहे लगातार सवालों के चलते, खासतौर पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर भारी दबाव था। दबाव सरकार और प्रधानमंत्री कार्यालय की भूमिका को स्पष्ट करने का। प्रधानमंत्री ने अपनी स्थिति स्पष्ट करने की खातिर देश के चुनिंदा टीवी न्यूज चैनलों के संपादकों को अपने आवास पर बुलाया। अपनी कही, संपादकों की सुनी और उठ रहे सवालों का जवाब देने की कोशिश की। संपादकों के साथ प्रधानमंत्री की इस बातचीत का प्रसारण दूरदर्शन के साथ-साथ ज्यादातर टीवी न्यूज चैनलों ने किया। भ्रष्टाचार पर उठ रहे सवालों पर प्रधानमंत्री का स्पष्टीकरण कितना कारगर रहा, इसका आकलन सत्ता और विपक्ष दोनों करने में जुटे हैं। बजट सत्र के पहले दिन संसद के दोनों सदनों को संयुक्त रूप से संबोधित करते हुए अपने अभिभाषण में राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने जनता की आकांक्षाओं और सरकार की तैयारियों के बारे में बताया। राष्ट्रपति ने कहा कि ‘हमारी जनता सुशासन की हकदार है। यह उसका अधिकार और हमारा दायित्व।’ उन्होंने कहा कि ‘हमारी सरकार शासन की गुणवत्ता में सुधार लाने तथा सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता, ईमानदारी और सत्यनिष्ठा लाने के लिए प्रतिबद्ध है। मंत्रियों का एक समूह भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने और पारदर्शिता बढ़ाने के लिए वैधानिक, प्रशासनिक तथा अन्य सभी उपायों पर विचार कर रहा है। यह समूह सार्वजनिक क्रय नीति तैयार करने, सार्वजनिक क्रय मानक निर्धारित करने, मंत्रियों को प्रदत्त विवेकाधिकारों की समीक्षा कर उन्हें समाप्त करने, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिए खुली और प्रतिस्पर्धात्मक व्यवस्था प्रारंभ करने, भ्रष्टाचार के आरोपी लोकसेवकों के विरुद्ध तीव्र गति से अभियोजन चलाने और उनके विरुद्ध द्रुत कार्रवाई करने के लिए कानूनों में यथोचित संशोधन करने संबंधी मामलों पर विचार करेगा। उक्त समूह चुनाव पर होने वाले खर्च के लिए सरकार द्वारा वित्तीय सहायता दिए जाने के संबंध में भी विचार करेगा।’प्रधानमंत्री ने पिछले बुधवार को सहारा न्यूज नेटवर्क के एडिटर एवं न्यूज डायरेक्टर के सवाल के जवाब में कहा था कि मंत्रियों के विवेकाधिकारों की समीक्षा के लिए प्रणव मुखर्जी की अगुवाई में मंत्री समूह गठित है। साठ दिन के भीतर आने वाली इस रिपोर्ट का हमें भी इंतजार है। राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में मंत्री समूह के कामकाज और भ्रष्टाचार रोकने के संभावित तौर-तरीकों पर विस्तृत काम करने जिक्र किया है। राष्ट्रपति के अभिभाषण ने भ्रष्टाचार के खिलाफ सरकार की तैयारियों को विस्तार से बताया है। लेकिन बात भ्रष्टाचार को नियंत्रित करने की हो रही है, रोकने की क्यों नहीं। राष्ट्रपति को तो इसे जड़ से मिटाने पर जोर देना चाहिए था। चलिए, सरकार ने राष्ट्रपति के जरिए देश से अपनी मंशा तो जाहिर की। भ्रष्टाचार से लड़ाई के लिए सरकार की चाहे जितनी भी बड़ी तैयारी हो पर इसे सेंट्रल हाल में मौजूद सांसदों ने उस उत्साह से नहीं लिया, जिसकी जरूरत थी। मतलब यह कि न तो किसी ने मेज थपथपाई और न ही बजी ताली। सरकारी पक्ष के सांसदों ने जब नहीं सराहा तो कम से कम विपक्ष को ही सराहना चाहिए। खैर, सभी मौन थे, शांत थे, गंभीर थे। राष्ट्रपति बोल रही थीं शायद इसलिए या फिर भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के प्रति कठोर कार्रवाई का सरकार का दृढ़ इरादा देखकर। प्रधानमंत्री ने बड़े भरोसे के साथ कहा था कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। पहले प्रधानमंत्री ने जो कुछ कहा था, उस पर राष्ट्रपति ने आज अपनी मुहर लगा दी। राष्ट्रपति ने एक कदम आगे बढ़कर यहां तक कह दिया कि मेरी सरकार ने संयुक्त राष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक कन्वेंशन का अनुमोदन करने का भी फैसला किया है। दरअसल भ्रष्टाचार के खिलाफ यूएन कन्वेंशन को 14 दिसम्बर, 2005 को अपनाया गया था। इस मसौदे को अब तक करीब 140 देशों ने स्वीकार किया है, जबकि भारत ने अब मन बनाया है। यूएन कन्वेंशन के अनुच्छेद 5 की मंशा ऐसे ‘कोड’ से देशों को बांधना है, जो भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में कारगर साबित हो। इस कोड के मुताबिक चुनाव प्रचार में होने वाले खर्च का सही हिसाब रखना जरूरी है। साथ ही यह भी कहा गया है कि पब्लिक सव्रेट के लिए उसकी आय का समय-समय पर खुलासा जरूरी है। अनुच्छेद 51 के मुताबिक जिस देश से गबन होकर संपत्ति किसी दूसरे देश में पहुंचा दी गई है, उसे तत्काल वापस किया जाए। साथ ही अनुच्छेद 43 के मुताबिक गबन की जांच में एक देश को दूसरे देश की जांच एजेंसी के साथ पूरा सहयोग करना होगा। सरकार की तैयारी से साफ है कि भ्रष्टाचार पर उसकी लड़ाई धीरे-धीरे तेज होने वाली है। पिछले काफी समय से इशारों में भाजपा, खासतौर पर लालकृष्ण आडवाणी यूपीए चेयरपर्सन पर काले धन के खेल में शामिल होने का बार-बार आरोप लगाते रहे हैं। कुछ दिन पहले ही सोनिया गांधी के पत्र के जवाब में आडवाणी ने अपनी गलती मानी, खेद भी जताया। फिर भी विवाद ज्यों का त्यों है। राम जेठमलानी ने आज कह दिया कि सोनिया गांधी के पास काला धन है। कहां है, कितना है यह तो जेठमलानी ही जाने। जेठमलानी के इस आरोप का जवाब कैसा होगा, यह देखना काफी रोचक होगा। ऐसे ही अरुणांचल प्रदेश में एक शिविर के दौरान कांग्रेस सांसद नीनोंग एरिन ने स्वामी रामदेव पर अभद्र टिप्पणी की। टिप्पणी के पीछे काला धन और भ्रष्टाचार से जुड़ा सवाल था। बदले में स्वामी जी ने भी जो कहना था, कहा। राज्य के शिक्षा मंत्री ने माफी मांगी। स्वामी पर हुई टिप्पणी को किसी ने सराहा तो बहुतों ने नकारा। आग में घी का काम कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने कर दिया। कह डाला कि रामदेव के पास भी काला धन है। रामदेव की संपत्ति की जांच होनी चाहिए, और भी कुछ कहा। बस क्या था, स्वामीजी आपा खो बैठे। फिर क्या पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर सोनिया गांधी तक सभी पर बरस पड़े। सुब्रह्मण्यम स्वामी अलग तरीके से भ्रष्टाचार से जुड़े मामले लगातार उठाते रहे हैं। प्रधानमंत्री से दोस्ती और सोनिया गांधी पर आरोप लगाने को लेकर कांग्रेसी खेमे में भी तरह-तरह के सवाल उठते रहते हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रही लड़ाई के चलते आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। बहती गंगा में सभी डुबकी लगा लेना चाहते हैं। कोई किसी को फंसाने में तो कोई बचाने की तरकीब तलाश रहा है। यही वजह है कि राष्ट्रपति ने आज काले धन के संबंध में चल रही र्चचाओं पर चिन्ता जाहिर की। ईमानदारी से की गई कमाई पर देने वाले कर की चोरी से जमा किया गया धन हो या फिर गैर कानूनी तरीके से कमाया गया। सरकार की नजर अब छोटी-बड़ी सभी मछलियों पर है। सरकार की भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई तेज करने की मंशा पर सवाल लोकपाल विधेयक को लेकर भी है। काफी समय से लंबित इस विधेयक को जितनी जल्दी हो सके, सामने लाने की जरूरत है। सरकार ने ‘व्हिसल ब्लोअर’ विधेयक संसद में पेश किया है। ‘पोल खोल’ वाले इस विधेयक से किसकी कितनी पोल खुलेगी, यह तो इसके अमल में आने के बाद पता चलेगा। इस विधेयक में इस बात का प्रावधान है कि जनहित में खुलासा करने वाले लोगों को सुरक्षा प्रदान की जाएगी। न तो कोई गलत शिकायत कर सकेगा और न ही जो गलत होगा वह बच सकेगा। पर इसमें भी नौकरशाहों पर शिकायती जांच का फैसला सीवीसी को करना होगा। सीवीसी को और अधिकार मिलेंगे। न्यायिक अधिकार भी हासिल होगा। पहला सवाल तो यह है कि सूचना देने वाले किसी भी व्यक्ति का नाम गोपनीय रखा जाएगा। यह गोपनीयता कौन बनाकर रखेगा, अगर नाम बाहर आया तो जवाबदेही कैसे तय होगी? दूसरी बात जब एक दागी दूसरे दागी का नाम लेकर खुद को पाक-साफ बताने का दावा कर रहा है तो ऐसे में दाग साफ किया जाएगा या दागी को। राजनीतिज्ञ हों या फिर लोक सेवक जिन पर दाग होगा, उन्हें कैसे साफ किया जाएगा? केवल दाग साफ किए जाएंगे या फिर उन्हें धुंधला करने की जुगत की जाएगी। या फिर दाग लगे व्यक्ति चाहे जो भी हों, जहां भी हों, जैसे भी हों, उन्हें साफ किया जाएगा। सरकार, खासतौर पर प्रधानमंत्री की नीयत पर किसी को संदेह नहीं है। परंतु दाग साफ करने के लिए जिस ‘डिटरजेंट’ की जरूरत देश को है, वह कहां मिलेगा? मिलेगा तो उसकी खरीद-फरोख्त में क्या कोई दूसरा दागी तो नहीं तैयार हो जाएगा? अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो दाग मिटाया कैसे जाएगा यानी कितने पानी में कितना डिटरजेंट घोला जाएगा? दाग की मजबूती और डिटरजेंट की गुणवत्ता निर्धारित करेगी कि दाग साफ होगा या डिटरजेंट मैला। जिस तैयारी में प्रधानमंत्री दिखते हैं, उससे अच्छे परिणाम निश्चित रूप से सामने आएंगे। दाग साफ भी न हुए तो कम दागी ही दिखेंगे।
Monday, February 21, 2011
रामदेव का रास्ता
भ्रष्टाचार के खिलाफ चल रहा है एक और अभियान
भ्रष्टाचार और काले धन के पीछे आजकल बाबा रामदेव लाठी लेकर पड़े हैं, जिससे उनके अनुयायियों में भी बहुत उत्साह है। मीडिया का एक हिस्सा भी योगगुरु के इस नए अवतार से खुश है। हालांकि राजनीतिक चिंतक, विश्लेषक और मुख्यधारा का मीडिया बाबा को गंभीरता से नहीं ले रहा। वैसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध देशव्यापी आंदोलन के कई दौर आ चुके हैं। सबसे पहला दौर जयप्रकाश नारायण का था, जो 1974 में शुरू हुआ। केवल उत्तर भारत में उसका असर रहा और आपातकाल के रास्ते जनता दल के गठन तक उसकी परिणति हो गई। भ्रष्टाचार जस का तस रहा।
दूसरा दौर विश्वनाथ प्रताप सिंह का था, जो 1987 में शुरू हुआ। वर्ष 1989 में राजीव गांधी को हटाकर वीपी सिंह प्रधानमंत्री बने। पर 1990 में उनका भी बंटाधार हो गया। तीसरा दौर 1993 में शुरू हुआ, जब मैंने 115 ताकतवर नेताओं और अफसरों के खिलाफ जैन हवाला कांड को लेकर संघर्ष शुरू किया और 1996 में इन सबके खिलाफ आरोपपत्र दाखिल करवाकर दम लिया। आजादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ। उसके बाद दर्जनों दल मिलकर सरकार बनाते रहे और हवाला आरोपी फिर से निकल भागे। अब यह चौथा दौर शुरू हुआ है। अगर बाबा रामदेव और उनके अनुयायी अपने उद्देश्य में सफल होते हैं, तो यह देश का सौभाग्य होगा।
मानना पड़ेगा कि बाबा रामदेव ने बड़ी सूझ-बूझ, दूरदृष्टि और व्यावसायिक प्रबंधन के साथ अपना तंत्र खड़ा किया है, जिसके सहारे अब वह राजनीतिक परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं। दरअसल यश और धन प्राप्त होने के बाद व्यक्ति की राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग उठती है। अगर यही बात बाबा रामदेव पर लागू है, तो उनके प्रयास बहुत दूर तक सफल नहीं हो पाएंगे। लेकिन अगर उनका मनोरथ देश का सुधार करना है, तो यह सौभाग्य की बात है।
शास्त्रों में एक उक्ति है, फलेन परिचयेत यानी फल से परिचय मिलता है। जिस लगन, समर्पण और उत्साह से बाबा रामदेव ‘भारत स्वाभिमान ट्रस्ट’ के लिए जनजागरण करने निकले हैं, उससे दिख भी रहा है कि वह वास्तव में अपने आदर्शों के लिए जी-जान से जुटे हैं। जिस तरह उन्होंने योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और भारतीय संस्कृति के पुनरोद्धार का बीड़ा उठाया है, उससे देश के करोड़ों लोगों को लाभ पहुंचा है। सफल व्यक्तित्व के निंदक भी पैदा हो ही जाते हैं, जिसकी उन्हें परवाह नहीं। संत समाज में ही मेंढकों की-सी प्रवृत्ति होती है, जो आगे बढ़ने के बजाय टांग खींचने में विश्वास रखते हैं।
बाबा रामदेव के राजनीतिक अभियान को लेकर पहले बहुतेरे लोग सशंकित थे, लेकिन अब ऐसा लगता है कि उनकी भावना काफी प्रबल है। पर राजनीतिक धरातल की सचाइयां भावना के क्षेत्र से बहुत तालमेल नहीं रखतीं। उसके लिए एक दूसरे किस्म के कौशल की आवश्यकता होती है। वैसे भी हमारी सनातन परंपरा में चार प्रकार की सत्ताओं का महत्व बताया गया है, धर्म सत्ता, राजसत्ता, समाज सत्ता और परिवार सत्ता। इस दृष्टि से अगर देखें, तो समाज को खोए हुए जीवन मूल्यों की ओर लौटाने का बाबा रामदेव का अथक प्रयास और जीवट अनुकरणीय है।
पर यह ऐतिहासिक तथ्य है कि चारों में से किसी एक सत्ता ने जब दूसरी सत्ता के क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयास किया, तो समाज का संतुलन बिगड़ गया। बाबा रामदेव और उनके अनुयायी अन्यथा न लेकर इसे सही परिप्रेक्ष्य में देखें, तो उन्हें लाभ ही होगा। आज उनके पास साधन, पहचान और विचार, तीनों हैं, पर इतने नहीं कि सैकड़ों वर्षों की भारतीय व्यवस्थाओं को रातोंरात बदला जा सके।
इस देश में राजनीतिक चिंतन करने वाले ऐसे तमाम लोग हैं, जिनकी बुद्धि, विचार, आचरण और अनुभव इस अभियान के लिए बहुमूल्य हैं। साधनों के अभाव में वे अलग-थलग पड़े हैं। ऐसे लोगों को साथ जोड़कर व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई का अगुवा उन्हें बनाना चाहिए। इससे समाज का विश्वास बढ़ेगा। कोई व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो, उसे परिवर्तन का अगुवा बनाने में समाज को तब तक संकोच होता है, जब तक उसके कृतित्व सामने न आ जाएं। अपने चैनल पर लगातार खुद छाए रहकर और अपने ही सहायकों को बार-बार बैठाकर जो प्रस्तुति बाबा रामदेव करते हैं, वह उनके अनुयायियों को भले बहुत अच्छी लगती हो, पर बहुसंख्यक समाज को वह रटी-रटाई, उबाऊ और रसहीन प्रतीत होती है। ऐसे में बाबा रामदेव को चाहिए कि वह अपने टीवी चैनल को व्यक्ति केंद्रित न रखकर राष्ट्र केंद्रित करें।
इसके अलावा उन्हें मध्यवर्गीय समाज और मीडिया के प्रचार तंत्र के शिकंजे से बाहर निकलकर सही लोगों को ढूंढने और अपने साथ जोड़ने का प्रयास करना होगा। क्योंकि मीडिया और मध्यवर्गीय समाज के लोग प्राय: जिन्हें धर्मयोद्धा बनाकर पेश करते हैं, वे असल में कागज के शेर होते हैं। जाहिर है, असली शेरों को लाकर वे अपने अस्तित्व के लिए खतरा पैदा नहीं करना चाहते। इसीलिए उनके हर प्रयास चर्चा में तो खूब रहते हैं, पर परिणाम तक नहीं ले जा पाते। परिणाम तक ले जाने का न तो उनका इरादा होता है और न ही जीवट। इसलिए वे लोग लड़ाई में कूदते नहीं, उसकी चर्चा भर करते हैं। शायद बाबा रामदेव इस तथ्य से परिचित नहीं। इसलिए प्राय: उनके मंचों पर वही चर्चित चेहरे दिखाई पड़ते हैं, जो टीवी चैनलों की बहसों में दिखते हैं। इन चेहरों का पेशा ही चर्चा में बने रहना है। किसी मुद्दे के प्रति समर्पण नहीं, पर हर मुद्दे पर राय देने को तैयार। बाबा रामदेव अगर धर्मसत्ता के ही दायरे में सीमित रहें और राजसत्ता, परिवार सत्ता और समाज सत्ता को मजबूत करने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाएं, तो इस युग के इतिहास पुरुष बन सकते हैं।
बेहतर हो कि वह धर्मसत्ता के दायरे में रहकर ही राजसत्ता को मजबूत करने में उत्प्रेरक की
भूमिका निभाएं।
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